आयुर्वेद का लौटता दौड़

रोग प्रतिरोधक क्षमता, आज का मूलमंत्र है, पर क्या आप जानते हैं  #एलोपैथी शब्द का जन्म सन 1810 में हुआ इसे Samuel Hahnemann ने हमे दिया।
मतलब 200 साल पुरानी एक पैथी को हमने अपना जीवन सौप दिया 🤣

#Bloodletting और #GeorgeWashington गूगल करें, यह एलोपैथिक दवाओं का इतिहास है,
उस समय हर बीमारी का इलाज नस काट कर होता था🤣 
आयुर्वेद और सिद्धा पैथी तब इतनी परिष्कृत थी कि हम प्लास्टिक सर्जरी करते थे।
औषधि में केमिकल का उपयोग 100 साल से ज्यादा पुराना नहीं है।
जो अगले 20 साल में खत्म हो जाएगा।
अब फिर समय है आयुर्वेद का।
वर्तमान समय मे आयुर्वेद की सबसे बड़ी समस्या व्यवस्थित अनुसंधान की कमी है।
जो वर्तमान समय मे सरकार सुधारने की कोशिश कर रही है।
सिद्धा थेरैपी या सिद्धा पैथी तो लोगो को मालूम ही नहीं है।
यह इलाज का तरीका आयुर्वेद से भी एडवांस है।
यह वह विज्ञान है जो लक्षण, वात, पित्त जैसी चीजों पर विचार ही नहीं करता यह काम करता है आपके अंतर्मन पर, अंतर्मन काम करता है ब्रेन पर और ब्रेन काम करता है आपके इम्मयून सिस्टम पर और इम्यून सिस्टम बीमारी को जड़ से ठीक करता है।
यह अद्भुत और कठिन विज्ञान है।
सरकार चाहती है इस औषधीय विधा को पुनर्जागृत किया जाए।।
#SchumannResonance जैसी कुछ चीजें हैं जिन्हें समझना अब जरूरी हो गया है।
स्वास्थ्य और चिकिसकीय व्यवस्था, सिरप कैप्सूल और इंजेक्शन से निकलने वाली चीज कभी था ही नहीं, यह हमेशा से भोजन, मन, कर्म और विचार की शुद्धि का परिणाम था, यह मंत्र, ध्वनि तरंगों और आसपास के पर्यावरण पर निर्भर था।
यह हमेशा सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट की अवधारणा पर चलते हुए बेहतरीन जीन के संरक्षण से उत्पन्न व्यवस्था थी।
#ध्यान दीजिए यहां से भी #कोरोना का इलाज निकल सकता है जो पहले शायद दुनिया को अविश्वसनीय लगे 🙏
तरंगों से चिड़िये विलुप्त हो सकती हैं तो क्या एक वायरस नहीं मर सकता?

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