शिव धनुष "पिनाक" और विष्णु धनुष "शारंग"
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भगवान् विश्वकर्मा ने दो विशेष धनुष तैयार किये थे एक का नाम था "पिनाक" और दूसरे का नाम था "शारंग". उन्होंने पिनाक भगवान् शिव को दिया और शारंग भगवान् विष्णु को. यह दोनों अत्यंत शक्तिशाली धनुष थे. इन धनुषों की टंकार मात्र से बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे. ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो.
भगवान शंकर ने अपने इस धनुष "पिनाक" से त्रिपुरासुर को मारा था और इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था. राजा दक्ष के यज्ञ में मातासती के भष्म हो जाने के बाद भी शिव ने यह धनुष उठा लिया था. तब धरती पर प्रलय आने की आशंका से घबराकर देवताओं ने उनकी प्रार्थना कर उनका क्रोध शांत किया.
तब वे अपने पिनाक धनुष को देवताओं को सौंप कर चले गए थे. देवताओं ने इस धनुष को महाराज जनक के पूर्वज राजा देवरथ के पास रखवा दिया था. यह कई पीढ़ियों से राजा जनक के यहाँ था. वे इसकी नियमित पूजा करते थे. इस धनुष को कोई साथारण मनुष्य या देवता हिला भी नहीं सकते थे. एक बार खेल खेल में सीता माता इस धनुष को उठा लिया था.
तब उनके पिता ने सोंच लिया कि - सीता कोई साधारण कन्या नहीं है अतः उसको उसके योग्य वर मिलना चाहिए. राजा जनक ने सीता का स्वयंवर किया और शर्त रखी कि - जो कोई भी इस धनुष पर प्रत्यन्चा चढ़ा देगा उसके साथ सीता का विवाह किया जाएगा. कोई भी इस धनुष को हिला नहीं सका तब श्रीरांम ने इसे उठाया, प्रत्यन्चा चढ़ाते समय टूट गया.
तब विष्णु के आवेश अवतार महृषि परशुराम अत्यंत क्रोधित हुए. बाद में उन्हें लगा कि - श्रीराम शायद विष्णु के ही पूर्ण अवतार है. तब परशुराम ने श्रीराम को "शारंग" धनुष देकर उसपर पर प्रत्यन्चा चढ़ाने को दिया. श्रीराम द्वारा उसपर प्रत्यंचा चढाने से परशुराम को विश्वास हो गया कि - राम विष्णु के अवतार है और वे उन्हें प्रणाम करके चले गए.
भगवान विष्णु ने अपना धनुष "शारंग" ऋषि ऋचिक को रखने को दिया था. ऋषि ऋचिक से यह धनुष भगवान् परशुराम को प्राप्त हुआ था. भगवान् परशुराम ने अपना सन्देह दूर करने के लिए यह धनुष राम को दिया था. अपना उद्देश्य पूरा करने के बाद श्रीराम ने यह धनुष समुद्र के देवता वरुण को सौंप दिया था जिसे वरुण ने द्वापर में श्रीकृष्ण को दिया.
मृत्यु लोक को छोड़ने से पहले भगवान् श्रीकृष्ण ने यह धनुष "शारंग" पुनः समुद्र को सौंप दिया था. ऐसी मान्यता है कि - भगवान् विष्णु कल्कि अवतार के समय फिर से इस धनुष को प्राप्त करेंगे और इसके द्वारा पापियों का नाश करेंगे.
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