#10_मई_और_महेश्वर_मण्डलेश्वर।
#वीर_क्रांतिकारियो_को_श्रद्धांजलि।
महेश्वर-मण्डलेश्वर पुरातन सम्पदा एवं पौराणिक, ऐतिहासिक घटनाओं और संपदाओं का मूक साक्षी रहा है।
महेश्वर जो नर्मदा नदी के तट पर अवस्थित है जिसे कतिपय पुराणों में प्राचीन काशी की संज्ञा दी गई है।
यही वह नगर है जहां त्रिलोक पति रावण को सहस्त्रबाहु ने छः माह कैद कर के रखा हुआ था।
कभी महेश्वर मण्डलेश्वर दोनो नगर एक हुआ करते थे,कहा यह जाता है कि मण्डलेश्वर महेश्वर का एक उपनगर था जिसे मंडल कहा गया था।
यह वही क्षेत्र है जहां आदिगुरु शंकराचार्य जी का और मंडन मिश्र का शास्त्रार्थ हुआ था।
इसी मण्डलेश्वर नगर का आजादी की लड़ाई में भी अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है।
10 मई विशेष
जी हां इस तारीख का इस स्थान से बहुत गहरा नाता है।
भारतीय इतिहास में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को सिर्फ एक छोटे से विद्रोह का नाम देकर समाप्त कर दिया गया। जबकि शहीद मंगल पांडे द्वारा आजादी का जो आगाज किया गया उसे झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह जैसे कई स्वातंत्रयवीरो ने आगे बढ़ाया। आज ही के दिन 10 मई 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुवात हुई थी।
इसी श्रृंखला में नगर मण्डलेश्वर का योगदान भी प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में रहा।
उस समय निमाड़ के क्रांतिकारी #भीमा_नायक ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था।
#अंग्रेजो ने धोखे से भीमा नायक की माताजी को कैद कर मण्डलेश्वर जेल (तत्कालीन समय मे किला) रखा। भीमा नायक की माताजी का देहांत अंग्रेजो की प्रताड़ना के दौरान हुआ। अपनी माताजी की मौत की खबर लगते के बाद भीमा नायक ने मण्डलेश्वर किले पर आक्रमण किया और यहां पर अपना कब्जा स्थापित किया। कब्जे के बाद 150 सैनिकों को छोड़ कर भीम नायक वापस बड़वानी की तरफ कूच कर गए। अंग्रेजो ने फिर पूरी ताकत से मण्डलेश्वर किले पर हमला किया और 150 सैनिकों को कैद कर लिया। उसके बाद इन्ही 150 सैनिकों को फांसी बेड़ी पर सूली पर चढ़ा दिया। शहीदो के मृत शरीर को मगर डाब में भूखे मगरमच्छो के सामने फेक दिया।
इन्ही 150 सैनिकों के सम्मान में फांसी बेड़ी स्मारक का निर्माण किया गया था।
आज के दिन 150 वीर क्रांतिकारियों को नमन करते हुए हम श्रद्धांजलि देते है।
जिन्होंने इतिहास में मण्डलेश्वर को एक पहचान दी।
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