द्विज का अर्थ प्रायः ब्राह्मण लगाया जाता है । यह एक तरह की भ्रांति है । व्याकरण में द्विज का अर्थ है दो बार जन्म लेने वाला । इस व्याख्या के अनुसार तमाम अंडज , जैसे -साँप और परिंदे भी द्विज कहलाते हैं ।
माँ के गर्भ से जन्म लेने को पहला जन्म और धर्म -शिक्षा प्राप्त करने के बाद दूसरा जन्म मानकर द्विज शब्द को ब्राह्मण का पर्याय बताया जाना बकवास से ज्यादा कुछ नहीं है , क्योंकि इसतरह के जन्म तो मुसलमान , क्रिश्चियन आदि भी प्राप्त करते हैं । वस्तुतः हर समुदाय में बच्चे अज्ञानी ही होते हैं , पर ज्यों -ज्यों बड़े होते हैं उनका ज्ञान बढ़ता जाता है ।
व्याकरण के अनुसार व्युत्पत्ति के अनुसार शब्दों के अर्थ बदलते रहते हैं , जैसे -वृषभानुजा को वृषभ +अनुजा मानेंगे , तो इसका अर्थ गाय होगा लेकिन जब इसे वृषभानु +जा मानेंगे , तब इसका अर्थ राधा होगा ।
द्विज को यदि द्वि +ज मानेंगे तो इसका अर्थ अंडज होगा , लेकिन जब इसे द्वि +ज्या का अपभ्रंश मानेंगे तो इसका अर्थ भूमिहार हो जाएगा । द्वि और ज्या के योग से द्विज्य शब्द बना , ठीक उसी प्रकार जैसे द्वि और त्रिज्या मिलकर द्वित्रिज्य शब्द बनता है ॥ द्विज्य शब्द आगे चलकर द्विज बन गया । यह सम्भव है कि सर्पों से उपमित किये जाने के कारण ब्राह्मणों को द्विज कहा गया हो । साँप को दो जिह्वा होती है और जिह्वा ही वाणी का जनक है ।सम्भवतः ' बेटी न बेटा ' जैसे द्वयर्थक वाक्यों का इस्तेमाल करने के कारण ब्राह्मणों को साँप कहा जाता था । उनके द्वारा प्रयुक्त द्वयर्थक वाक्य शाप (मूलतः सर्प ) वाक्य कहलाते थे । शाप (सर्प) वाक्य पर विश्वास करने वाले व्यक्ति विनाश को प्राप्त होते हैं -ऐसी धारणा थी ।
द्विज्य के द्वि खण्ड का अर्थ दो और ज्या का अर्थ भूखण्ड है । जिसतरह द्वित्रिज्य का अर्थ है ' दो त्रिज्याओं से घिरा क्षेत्र , उसीतरह द्विज्य का अर्थ है ' वह समुदाय जिसके दो भूखंडों में क्रमशः शीतकालीन और ग्रीष्मकालीन निवास क्षेत्र हों ' ।
द्वि के वि , ब , बा ,बय रूपांतर भी मिलते हैं , जैसे - विवाद (मूल शब्द द्वि +वार्ता =दो व्यक्तियों के बीच चलने वाली वार्ता ) ,बत्तीस (मूल शब्द द्वि +तिस्र ) ,बासठ (मूल शब्द द्वि +षष्टि ) , बयासी(मूल शब्द द्वि +अशीति ) आदि ।
द्वि के वि और ज्य के जय रूपांतर के कारण द्विज्य शब्द विजय में बदल गया था । इसतरह मेरी व्याख्या के अनुसार हरिहर राय द्वारा स्थापित साम्राज्य विजयनगर साम्राज्य कहलाया था क्योंकि यह द्विज्य यानि भूमिहार साम्राज्य था ।
भूमिहार शब्द चाहे जितना भी प्राचीन या अर्वाचीन रहा हो , पर यह द्वि मही वार का अपभ्रंश है और द्विज्य के पर्याय के रूप में विकसित किया गया था । इसी का पर्याय विजयनगर का विजय शब्द है ।
बाभन शब्द जो अशोक -स्तम्भ में भी ब्राह्मण से अलग प्रयुक्त हुआ है , भूमिहार और द्विज्य का पर्याय है । यह शब्द मूलतः द्वि भू वान् या द्वि भू अयन है जो द्वि के बा और भू अयन के भन रूपांतर से विकसित हुआ है । यह शब्द भूमिहार से ज्यादा लोकप्रिय रहा है ।
मिथिलांचल में भूमिहार के दो पर्याय दुगमिया और पश्चिमा लोकप्रिय हैं । दुगमिया शब्द द्विग्राम्यः का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है दो ग्राम (यानि निवास -क्षेत्र ) वाला और स्पष्टतः भूमिहार का पर्याय है । भूमिहारों से अलग मैथिल ब्राह्मणों का वर्ग भूमिहारों के विभाजन का परिणाम है । मिथिलांचल में बौद्ध धर्म के प्रचार के प्रमाण मिलते हैं । मण्डन मिश्र , जिनसे शंकराचार्य का शास्त्रार्थ हुआ था , बौद्ध ही था । बौद्ध धर्म ग्रहण करने वाले भूमिहार ही मैथिल ब्राह्मण के नाम से लोकप्रिय हुए थे । इस धर्म -परीवर्त्तन के बाद शादी -ब्याह सम्बन्ध क्रमशः घटते चले गए थे ।
मिथिलांचल में भूमिहारों के लिए पश्चिमा शब्द भी लोकप्रिय हुआ था । यह शब्द भूमिहारों के मिथिलांचल से अलग पश्चिमांचल निवास का बोधक है , क्योंकि पश्चिमा शब्द गंगा के लिए भी प्रयुक्त होता था । पश्चिम से आने वाली नदी के अर्थ में गंगा को पश्चिमा कहा जाता था । ध्यातव्य है कि गंगा पश्चिम से पूरब बहती है । भूमिहारों की सघन बस्तियाँ गंगा -तट पर ही स्थित मानी जाती थीं ।
मिथिला के जमींदार दरभंगा महाराज का राज -चिह्न मछली है । इससे मिथिला के मीन -स्थला होने का भ्रम पैदा होता है । लेकिन सच यह नहीं है , क्योंकि गंगा में कम मछलियाँ नहीं मिलतीं ।
वस्तुतः बौद्ध धर्म -गुरु को शाक्य मुनि कहा जाता था । कोशी क्षेत्र के भूमिहारों के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद इस क्षेत्र को ' शाक्य मुनि स्थल ' >' मुनि स्थल ' >मिथिला कहा जाने लगा था । इसतरह मैथिल का शाब्दिक अर्थ बौद्ध ही है ।
शास्त्रों में भूमिहार और बाभन की जगह व्यास शब्द मिलता है । मूल शब्द द्वि वास्य है । द्वि के वि में और वास्य का वास और फिर आस में परिवर्त्तन होने के कारण द्विवास्य शब्द वि +आस =व्यास में बदल गया । द्वि -वास्य का वास्य खण्ड ही वासव के रूप में लोकप्रिय हुआ । यह इन्द्र यानि राजा का वाचक है
व्यास के जन्म के बारे में कहा जाता है कि वे ब्राह्मण पराशर और मछुआरिन मत्स्यगंधा के अवैध शारीरिक सम्बन्ध से पैदा हुए थे । यह सच नहीं है । ऋग्वेद के संकलन -कर्त्ता और अठारह पर्वों वाले जय -काव्य के रचयिता व्यास तो वैदिक धर्म के स्रष्टा थे । विद्वेषी बौद्धों ने द्वेष के वशीभूत होकर व्यास के जन्म की यह कहानी गढ़ी थी ।
व्यास किसी व्यक्ति - विशेष का नहीं एक समुदाय विशेष का नाम था । यह समुदाय -विशेष और कोई नहीं आज का भूमिहार समुदाय है ।
व्यास समुदाय जाड़े में सर्दी से बचने के लिए समुद्र -तट पर चला जाता था । समुद्र को पारावार कहते हैं । इसतरह समुद्र -तटीय आश्रय को पारावार आश्रय कहा जाता था । लिपिकारों ने लिपिबद्ध करते समय पारावार आश्रय को पाराशर बना दिया है और बाद में शास्त्रार्थ के नाम पर इसका अर्थ पाराशर मुनि किया जाने लगा
जाड़ा बीतने के बाद पूरा व्यास समुदाय अपने मूल आवास -क्षेत्र को लौट आते थे । इसे समुद्र -क्षेत्र के विलोम के अर्थ में मृदा -स्कन्ध (मृदा =मिट्टी , स्कन्ध =भू -खण्ड ) कहा जाता था । इसे ही बौद्धों द्वारा तैयार प्रतिलिपियों में मत्स्यगंधा बना दिया गया और बाद में शास्त्रार्थ की परम्परा में इसे मत्स्यगंधा नामक मछुआरिन सिद्ध कर दिया ।
जाड़े के आगमन की सूचना कुहासों से मिलती थी । कुहासों को शरद या कोहरा > कुआर कहा जाता था । शरद का आंग्ल समतुल्य shroud तथा ' कोहरा ' का cover है । ध्यातव्य है कि बिहार में आश्विन मास में कोहरे का घिरना शुरू हो जाता है । इसीलिए आश्विन और कार्त्तिक को शरद या कुआर कहा जाता है । तमिलनाडु , कर्णाटक , गुजरात आदि तटीय प्रदेशों से जुड़ा हुआ नहीं है यह शरद नाम , क्योंकि वहाँ कुहासों के साथ इस बिहारी सर्दी का आगमन नहीं होता है ।
इसतरह बिहार -वासी भूमिहारों के लिए महत्त्वपूर्ण पारावार आश्रय , मृदा -स्कन्ध और कुहासे की तिकड़ी समुद्र -तटीय प्रदेशों में गढ़ बना चुके बौद्धों को बकवास लगती थी । इसी बकवास ने पाराशर
, मत्स्यगंधा और व्यास के नाम पर विद्वेषपूर्ण मिथक को जन्म दिया था । भूमिहारों को बौद्ध समुदाय आज भी इसी शैली में गाली देते रहते हैं ।
भूमिहारों का ही समुदाय व्यास के नाम से लोकप्रिय हुआ था । यह समुदाय हिमालय पर्वत पर बसे प्रदेश (अद्रि पद >तिब्बत ) के ल्हासा गढ़ होते हुए भारत पहुँचा था । अद्रि पद का ही पर्याय था नगपद जो आज नयपाल >नेपाल में बदल गया है ।
इस क्षेत्र के मूलवासी मंगोल थे । मंगोल पूरे उत्तर भारत में फैले हुए थे । मंगोलों की पहचान उनकी चिपटी नाक और गोल आंखें थीं । गोल आँखों के आधार पर उन्हें अक्षि-चक्र (अक्षि=आँख , चक्र =गोल ) कहा जाता था । महाभारत का एकचक्रा प्रदेश वास्तव में अक्षि-चक्र प्रदेश था जिसका अर्थ था मंगोल प्रदेश ।
भूमिहारों ने मंगोलों द्वारा अधिकृत इस भारतीय प्रदेश को ' व्याघ्र आश्रय ' कहकर पुकारा था । यहाँ व्याघ्र का aआतंक था । प्रतिदिन कोई न कोई व्यक्ति बाघों द्वारा मार दिया जाता था । भूमिहारों ने व्याघ्रों का शिकार कर आतंक से मुक्ति दिलायी थी ।
आज भी इस भूभाग का एक खण्ड बगहा यानि व्याघ्र -गृह के नाम से जाना जाता है । बक्सर नाम भी व्याघ्र आश्रय का ही अपभ्रंश है । चंपारण नाम भी मूलतः पंचानन अरण्य है और पंचानन कहा जाता है बाघ को ।
जय काव्य का बकासुर मूलतः व्याघ्र आश्रय ही है ।अभिधान ' बकासुर वध ' मूलतः व्याघ्राश्रय वेद है । वस्तुतः पाण्डवों ने व्याघ्र जैसे बलवान् पशु की उपस्थिति के ही कारण इस क्षेत्र को वीरभोग्या क्षेत्र कहा था और इसे अपने निवास -क्षेत्र के लिए चुना था । यह क्षेत्र भूमिहारों का प्राचीनतम निवास -क्षेत्र था । बेतिया महाराज ने इस क्षेत्र में कलेक्टर के कार्यालय में नीलामी की बोली लगाकर जमींदारी नहीं हासिल की थी । इस सम्बन्ध में मैं किसी अगले पोस्ट में लिखूंगा ।
पाण्डव बहुत प्राचीन शब्द नहीं है । यह ग्रीकों से सम्पर्क के काफी बाद प्रयुक्त हुआ था । यह मूलतः pavone band है जिसका अर्थ है मयूर दल >मौर्य दल । इसे ही pavone troop कहा जाता था । रूपांतरित नाम है पवन पुत्र । लेकिन यह दल और कोई नहीं भूमिहारों का सैन्य -दल था । इसे द्वि मही सेन (आंग्ल swain ) कहा जाता था जिसको आज महाकाव्य में भीमसेन कहा जा रहा है । इनके सम्राट को कवियों ने ' युग धरित्री ईश ' कहा था । अब यह युधिष्ठिर बन गया है । गौर वर्ण के कारण इन्हें ही अर्जुन कहा गया था । धान की खेती को विकसित करने के कारण इन्हें धान्यज्ञ कहा गया था जो अब धनंजय बन गया है । चीते की तरह फूर्त्तिबाज होने के चलते ये पार्थ (आंग्ल panther ) कहलाते थे ।
द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण से हम सभी परिचित हैं , पर जन -सामान्य इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण और कुरुक्षेत्र युद्ध के सारथी कृष्ण परस्पर भिन्न अस्तित्व हैं । द्वारिकाधीश तो सम्राट हैं , पर सारथी कृष्ण का सम्राट होना कहीं से भी सिद्ध नहीं है ।
द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण जादव हैं यानि ज्या -द्वय हैं यानि द्वि मही वार हैं यानि भूमिहार हैं । ये गोपाल (गो =भू ) यानि भूपाल हैं । ये वासुदेव यानि द्वि वास्य या वास्य द्वि हैं ।
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