चंपारण गजेटियर के अनुसार बेतिया के राजा पीढ़ी दर पीढ़ी पूर्णतः स्वतन्त्र रहे थे और उनके खानदान में किसी दूसरे को स्वामी मानकर उसे राजस्व देने की परम्परा कभी नहीं रही थी ।
चंपारण गजेटियर के अनुसार बेतिया के राजा पीढ़ी दर पीढ़ी पूर्णतः स्वतन्त्र रहे थे और उनके खानदान में किसी दूसरे को स्वामी मानकर उसे राजस्व देने की परम्परा कभी नहीं रही थी । सिकंदर लोदी के चंपारण अभियान का वर्णन करते हुए शेख रिजकिला मुश्तकी (Sheikh Rizquilla Mushtaki अपनी पुस्तक Wakiyat -i-Mushtaki में सिकंदर लोदी के चंपारण अभियान के सन्दर्भ में लिखता है ' ' बेतिया का राजा काफी बहादुर था और आजतक किसी नाजिम या सूबेदार की सेना उसके प्रदेश में प्रवेश करने की हिमाकत नहीं कर सकी थी । ' ' गजेटियर लिखता है ''The Bettiya State like many of its contemporary was not a landlordism purchased in a collectorate action with the protection of British Bayonets . " "
ईस्ट इंडिया कम्पनी ने जब 1764 के बक्सर युद्ध के बाद बेतिया राज को अपने सामन्त के रूप में टैक्स देने के लिए बाध्य किया , तब बेतिया ने युद्ध का ऐलान कर दिया । कम्पनी की आधुनिक सेना के सामने बेतिया की सेना नहीं टिक सकी और पराजित हुई । बेतिया महाराज रणछोड़ नीति का पालन करते हुए बुन्देलखण्ड के जंगलों में जा छिपे ।
लेकिन ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बेतिया राज की ताकत का गलत अनुमान लगाया था । बेतिया की पराजय के बाद चंपारण समेत पूरा नेपाल सुलग उठा । छोटे -छोटे अनेक सामन्तों ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी ।
अंततः 1771 ई में सरकार चंपारण के सुपरवायजर Mr Golding ने वायसराय को सलाह भेजी कि यदि उत्तर पूर्वी क्षेत्रों पर आधिपत्य कायम करना है , तो बेतिया राज को पुनर्स्थापित कर उससे मित्रता करनी ही होगी । The Select Committe ने Mr Golding के प्रतिवेदन से सहमति जताते हुए Court of Directors को लिखा -''They looked upon it rather as an article of curious intelligence than mere prospects of advantage to the company " "
इसतरह बेतिया राज पुनर्स्थापित हो गया । उसने नेपाल के विद्रोहियों को दबाने की मुहिम शुरू की । गुरखा गवर्नर लक्ष्मणगीर मारा गया । नेपाल के नव उदित सामन्तों के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध का नेतृत्त्व बेतिया करता रहा । लेकिन अंग्रेज यह भी तो नहीं चाहते थे कि बेतिया का प्रभुत्व नेपाल पर कायम रहे । लेटर नं 26 , दिनांक 12 जून , 1988 में भारत सरकार के सेक्रेटरी Mr H.M. Durand ने लिखा- ''His Excellency wishes to maintain as far as possible an attitude of strict neutrality between the refugees and the party in power ." " रिफ्यूजी और कोई नहीं बेतिया के नेतृत्त्व में लड़ रहे गुरिल्ला योद्धा थे जो नवोदित नेपाली सामन्तों के खिलाफ लड़ रहे थे ।
सच यह है कि पूरा नेपाल बेतिया के अधीन था । अंग्रेजों ने कूटनीति के तहत सुगौली संधि के द्वारा नेपाली सामन्तों को मान्यता प्रदान कर बेतिया के प्रभुत्व को स्थायी रूप से खत्म कर दिया । रामनगर पर भी एक नेपाली को न्यायालय के निर्णय द्वारा स्थापित कर दिया , जबकि मिथक के अनुसार यह बेतिया महाराज द्वारा अपनी एक प्रेमिका को दिया गया था ।
लॉर्ड कनिंघम ने पूरे चंपारण में मौर्य संस्कृति को नजरअंदाज करते हुए बौद्ध संस्कृति के प्रभावी होने का जोरशोर से प्रचार किया । उसी ने गया में श्रीलंका से लाकर गया में बोधि वृक्ष की नींव डाली । आश्चर्यजनक बात यह है कि उसने लिखा कि चंपारण में कनिष्क और हुविष्क की सत्ता थी । बौद्ध आक्रमणों से इनकार नहीं किया जा सकता , पर उनके स्थायी आधिपत्य को स्वीकार करना पूर्णतः असत्य है ।
ऐसा लगता है कि अंग्रेजों को बौद्ध धर्म से प्यार हो गया था । बौद्ध धर्म के अखिल भारतीय प्रसार का जोरशोर से प्रचार किया । ऐसा क्यों किया ?
सम्भवतः अंग्रेजों को इस बात का अहसास हो गया था कि बौद्ध समुदाय को भारत से ज्यादा सत्ता से प्यार है । । बौद्धों और मुसलमानों की दोस्ती का इतिहास उन्हें ज्ञात हो चुका था । भारत का सौभाग्य था कि अंग्रेज यह नहीं समझ पाए कि ब्राह्मण और राजपूत ही बौद्ध समुदाय हैं । उन्होंने उन जातियों को बौद्ध धर्म की तरफ मोड़ना चाहा जिन्हें भारत में निम्न जातियों के रूप में देखा जाता था । डॉ अम्बेदकर अंग्रेजों की कूटनीति के शिकार हो गए । उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर हिन्दुओं और मुसलमानों से समान दूरी कायम करने की सलाह अपनी जाति के लोगों को दी । बहुत सारे चर्मकारों ने तो क्रिश्चियन धर्म ही स्वीकार कर लिया ।
कहा जाता है कि पटना के एक अंग्रेज कलेक्टर ने विभिन्न यादव और कुर्मी जातियों को संगठित कर उन्हें प्राचीन योद्धा जाति बतलाना शुरू किया था और भूमिहारों की तीमारदारी करना उनके जातीय चरित्र के खिलाफ बताया था । इसतरह त्रिवेणी संघ की पृष्ठभूमि तैयार होने लगी थी । डॉ श्रीकृष्ण सिंह के कार्यकाल में ही पूरे बिहार में यादव और भूमिहारों के बीच खूनी दंगा शुरू हो गया ।
इसतरह अंग्रेजों की कूटनीति उनके काम तो नहीं आयी पर बिहार और उत्तर प्रदेश के लिए नासूर बन गयी । भूमिहारों की सत्ता की समाप्ति के साथ बिहार का विकास भी अवरुद्ध हो गया ।
भूमिहारों को यादवों और कुर्मियों से तोड़ने में ब्राह्मणों ने भी अंग्रेजों का साथ दिया था । स्वामी सहजानंद ने मैथिल ब्राह्मणों की प्रेरणा से यह प्रचार किया कि भूमिहार परशुराम की सेना के ब्राह्मण हैं और इन्होंने ही क्षत्रियों का संहार किया था । उधर कुर्मी और कोयरी को क्षत्रिय घोषित करने के लिए उन्हें लव -कुश का वंशज बता दिया और यादवों को तो क्षत्रिय घोषित करने के लिए भागवत पुराण ही रच डाला । अब आप ही बताइए कि क्षत्रियों का संहार करने वाले भूमिहारों को कुर्मी और यादव अपना मित्र कैसे मान सकते हैं ?
यह कैसे कह दूँ कि स्वामी सहजानंद ने साँप की तरह दो जिह्वा की नीति अख्तियार की , लेकिन यह तो कह ही सकता हूँ कि उनकी अज्ञानता का लाभ उठाकर ब्राह्मणों ने अपनी द्विजिह्व नीति चलाने के लिए उनकी कलम का सहारा लिया । परशुराम के सैनिक बनाकर हमारे परम्परागत दोस्तों को भी दुश्मन बना दिया गया था ।
नीचे बेतियाराज की उपलब्ध वंशावली दी जा रही है , जो 1244 से शुरू होती है और जिसमें बेतिया के पूर्वज का नाम गंगेश्वर देव बताया गया है । मेरी समझ से 1244 ई की तिथि से भी पहले का है बेतिया राज । यह मौर्या सत्ता का अमात्य था ।
मौर्यकाल में अलग -अलग मूलों के अलग -अलग सामन्त स्थापित किये गए थे । इसतरह सिरियारों का सिरियार दह > सियालदह , मालवे का मालदह और दुनटिकार का टिकारी स्टेट था । ये सामन्त अमात्य कहलाते थे । अमात्य शब्द अमर्त्य का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है अमर । यह संज्ञा देव की थी । मौर्यकालीन सामन्त अमात्य या देव कहलाते थे । सेनापति को महामात्य या महादेव कहा जाता था ।
अंग्रेजी काल में मात्र एक स्टेट अमाया के नाम से जाना जाता था । यह सिरियार मूल के अमात्य के लिए प्रयुक्त होता रहा था । लेकिन सच यह है कि सारे भूमिहार स्टेट मूलतः अमात्य स्टेट ही थे , जैसे सियालदह अमात्य , मालदह अमात्य , टिकारी अमात्य , जैथरिया अमात्य (चंपारण या केसरिया अमात्य ) आदि ।
बेतिया नामाकरण सियालदह , मालदह , टिकारी की तरह मूल या दह से संबद्ध नहीं है , क्योंकि बेतिया महाराज जैथरिया (काश्यप गोत्र ) थे ।
मेरी समझ से अन्य अमात्य डीह की तरह प्राचीन जैथरिया डीह भी मुस्लिम या बौद्ध आक्रमण के कारण ध्वस्त हो गए थे । आज जिसे हम आज केसरिया कह रहे हैं , सम्भवतः वही प्राचीन जैथरिया दह या गढ़ था । यही बेतिया राज का प्राचीन गढ़ था । केसरिया शब्द चंपारण का पर्याय है । चंपारण शब्द मूलतः पंचानन अरण्य है जहाँ पंचानन का अर्थ बाघ है । इसीतरह केसरिया शब्द केसरी से बना है जो बाघ का पर्याय है । इसतरह केसरिया और चंपारण समानार्थक हैं ।
जैथरिया दह की ही तरह सिरियार दह , मालवेदह , टिकारीदह आदि भी मुस्लिम और बौद्ध आक्रमणों के बाद ध्वस्त हो जाने के बाद प्राचीन स्थलों से भिन्न जगहों पर स्थापित होते रहे थे ।
केसरिया में बौद्धों के अवशेष मिलने से स्पष्ट है कि इसका ध्वंस बौद्ध आक्रमणकारियों द्वारा किया गया था । अतः कनिष्क और हुविष्क के अस्थायी आधिपत्य की बात सही हो सकती है ।
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