राज्य सभा सांसद के रूप में रामधारी सिंह दिनकर

पंडित नेहरू ने ही     1952 में राज्य -सभा  के लिए दिनकर का चयन किया था , क्योंकि स्वामी सहजानंद ने न्यायालय  में जाकर सिद्ध कर दिया था कि  भूमिहार ब्राह्मण ही हैं । 
        लेकिन मैथिलीशरण गुप्त को उनका राज्य -सभा पहुँचना नागवार लगा  था ।14 अगस्त , 1953 को  दिनकर ने   सूर्यनारायण व्यास  को एक  पत्र   में अपनी मानसिक पीड़ा को व्यंजित करते हुए लिखा था 

 “…मेरे बारे में प्रचार किया जा रहा है कि  मैं  मंत्री बनने के लोभ से नौकरी छोड़कर  सांसद बनने आया हूँ । इस प्रवाद को फ़ैलाने में सर्वाधिक हाथ पितृवत, परम श्रद्धेय राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण जी का  है l वे संसद में आ गए, यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार था । मैं गरीब क्यों आया, इसका उन्हें क्रोध है l  
             सच कहता हूँ, जन्म भर गुप्त जी पर श्रद्धा सच्चे मन से करता रहा हूँ l हृदय को चीरकर देखता हूँ तब भी यह दिखलाई नहीं पड़ता कि उनका मैंने रंच भर भी अहित किया हो । स्तुति में लेख लिखा, विद्वानों के बीच उनकी ओर से लड़ा, एक कांड को लेकर ब्रजशंकर जैसे निश्छल मित्र से रुष्टता मोल ली, यूनिवर्सिटी में उनकी किताबें कोर्स में लगवाता रहा, अभी-अभी एक किताब कोर्स में लगवा दी l 
              दिल्ली में भी कम सेवा नहीं की मगर फिर भी यह देवता कुपित है और इतना कुपित है कि छिप-छिपकर वह मुझे सभी भले आदमियों की आँख से गिरा रहा है l मेरे एक पत्रकार मित्र का यह कहना है कि प्रबंध-काव्य लिखकर तुम गुप्त जी के मित्र नहीं रह सकते क्योंकि इससे उनके व्यापार पर धक्का आता है l अस्तु.”
              दिनकर व्यथित थे , क्योंकि वे  राष्ट्रकवि होते हुए भी बौद्धों और मुसलमानों की दुरभिसन्धि वाली दिल्ली -संस्कृति से वाकिफ नहीं थे ॥  वह भारत के दर्द की आवाज बनना चाह रहे थे  , उस दर्द की   जो  वास्तव  में बौद्धों और मुसलमानों की  दुरभिसन्धि के कारण  पैदा हुआ था और जिसे सदियों से  भारत की आम जनता झेलती आ रही थी। 
                 मैथिली शरण गुप्त की भारत भारती  को खड़ी बोली हिन्दी की विजय भारती बताया जाता था । लेकिन दिनकर के स्वर  के उन्मुक्त और  उत्तुंग प्रवाह के  कलकल -छलछल के सामने गुप्त जी तुकबन्दी करते दिखायी पड़ते हैं  - 
   क्षुधार्त्त रन्तिदेव ने दिया करस्थ  थाल भी , तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थि -जाल भी । (मैथिलीशरण  गुप्त )
  उसी बात को     दिनकर ने लिखा -
     जिसने स्वयं क्षुधा में जलकर औरों का सम्मान किया था 
    और दान का प्रश्न उठा तो हड्डी तक का दान दिया था  
                       -दिनकर 
   
      दिनकर को यदि संसद के ब्राह्मणत्व  का बोध होता , तो वे   अपनी चिट्ठी में  मैथिलीशरण गुप्त की शिकायत नहीं करते । गुप्त जी तो महावीर प्रसाद द्विवेदी के शिष्य थे , अनुगामी थे । उन्होंने साकेत की भूमिका में लिखा है -
करते तुलसीदास  भी कैसे मानस -नाद 
    महावीर का यदि उन्हें मिलता नहीं प्रसाद । 
     यहाँ साकेत को मानस -नाद , महावीर प्रसाद द्विवेदी को महावीर और मैथिलीशरण स्वयं को तुलसीदास मान रहे हैं ।  
               भारतेन्दु युग से शुरू होकर द्विवेदी युग होते हुए छायावाद तक  हिन्दी साहित्य के क्षितिज पर सिर्फ बनिए और ब्राह्मण  ही चाँद  और सूरज की तरह चमकते  रहे थे  और इन दोनों की रोशनी में मलिन पड़ चुका टीक और टीका चकाचौंध पैदा करने लगा था । 
                इसी चकाचौंध ने  भारतेन्दु और मैथिलीशरण के मानस में भूमिहारों  के प्रति अंध विरोध पैदा कर दिया था । कहते हैं कि  साहित्य समाज का दर्पण  होता है । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अन्धेर  नगरी नाटक की  भूमिका में यह लिखकर अपनी नफरत को स्वर दिया था  कि     राजा  जरासन्ध  के यज्ञ में जनेऊ पहनाकर ब्राह्मणों द्वारा शामिल कराए गए गैर -ब्राह्मणों के  दल हैं  भूमिहार । अब आप ही सोचिए कि  किसी नाटक की  भूमिका में भूमिहारों  के जिक्र का क्या तात्पर्य , जबकि इसका कोई पात्र भूमिहार  नहीं है । स्पष्ट है कि भारतेन्दु की  अन्धेर  नगरी काशी थी और उसके  चौपट राजा थे काशी नरेश ।
       काशी नरेश ब्राह्मणों की आँखों के काँटा बन गए थे , क्योंकि उन्होंने  रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदासजी  को प्रश्रय दिया था , अपने नगर का नाम रामनगर रखा  था , काशी को शंकर की नगरी घोषित कर दिया था  और वे रामचंद्र के यशोगान के निमित्त प्रतिवर्ष रामलीला का आयोजन करते थे । लेकिन   ब्राह्मण तो  शंकर और राम के कट्टर विरोधी थे , क्योंकि उनके राजा दशमुख की  हत्या की थी राम और शंकर ने मिलकर । 
         भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के पिता गिरिधर दास ब्राह्मणों का गुणगान करते नहीं थकते । वे लिखते हैं -
 साई बैर न  कीजिए , गुरु पंडित कवि यार 
 बेटा वनिता पौरिया यज्ञ करावनहार 
 यज्ञ करावनहार , राजमंत्री जो  होई 
विप्र पड़ोसी वैद आपका तपै रसोई 
 कह गिरिधर कवि - राय युगन  तें  यह चलि आई 
 इन तेरह से तरह दिए बिनु आवै साई  
  यहाँ गुरु , पंडित , कवि , यज्ञ करावनहार , विप्र , वैद और  रसोइया तो ब्राह्मण ही हैं । 
    
       आप पूछ सकते हैं कि  ब्राह्मण भक्त गुप्त जी ने साकेत के नाम से रामायण की  रचना क्योँ की , यह कि  ब्राह्मण तो रामचंद्र के विरोधी होते हैं । तो सच यह है कि  साकेत रामायण नहीं '  ऊर्मिला  अयन '   है । इसमें कवि का मुख्य उद्देश्य ऊर्मिला के विरह को संवेदित कर  यह दिखाना  है  कि राम और लक्ष्मण स्त्रियों के प्रति अपनी मर्यादा नहीं निभा  पाए थे । हिन्दी साहित्य का  इतिहास बताता है कि  गुप्त जी ने इस विषय का चयन द्विवेदी जी के आदेश -निर्देश से ही किया था । 
       ध्यातव्य है कि  अयोध्या के लिए  साकेत नाम भी बौद्ध ग्रन्थों से ही लिया गया है । गुप्त जी का यशोधरा नामक खण्ड काव्य भी बौद्ध पृष्ठभूमि का ही है । 
    क्या   भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग में कोई विशुद्ध  राम -काव्य रचा  गया था । उत्तर है -नहीं ।  यह उस मानसिकता के प्रभावी होने का सूचक है जो रामचंद्र के विरुद्ध थी ? 
      भारतेन्दु युग को हिन्दी साहित्य का पुनर्जागरण काल कहा जाता है । लेकिन मेरी समझ से यह भाषा के स्तर पर  खड़ी बोली हिन्दी के उद्भव का काल था , वैचारिक सड़ांध  तो पहले जैसी ही थी । भारतेन्दु के सत्य हरिश्चन्द्र नाटक में दिखाया गया है कि  ब्राह्मणों को स्वप्न में भी दिया गया दान   कार्यान्वित किया जाना चाहिए , चाहे इसके लिए घर -बार सब बेचना क्योँ न  पड़ जाए । क्या भारतेन्दु  चाहते थे कि आजाद भारत में इसी तरह का ब्राह्मणानुगामी समुदाय तैयार रहे ? 
      भारतेन्दु युग से द्विवेदी युग तक हिन्दी साहित्य  मूलतः बौद्धों की  जकड़न में रहा था । छायावाद  हिन्दी के स्वाभाविक प्रवाह को अवरुद्ध कर  संस्कृतनिष्ठ बनाने में सफल रहा था  । इस युग में हिन्दी भाषा  संस्कृत की छाया -सी दिखने लगी थी । सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की  ' राम की शक्ति -पूजा  ' हिन्दी से ज्यादा संस्कृत की  कविता प्रतीत होती है  । निराला , पन्त  और प्रसाद की तिकड़ी ने हिन्दी संस्कृति को बाणभट्ट की संस्कृत संस्कृति के नजदीक पहुँचा दिया था । 
        इसी समय हरिवंश राय बच्चन और रामधारी सिंह दिनकर का उदय होता है । बच्चन मन्दिर , मस्जिद , गिरजे को तोड़कर मतवाला बनते दिखायी पड़ते हैं  -
   धर्मग्रन्थ  सब जला चुकी हो जिसके अंतर की ज्वाला 
 मन्दिर , मस्जिद , गिरजे सबको तोड़ चुका जो मतवाला 
 पंडित , मोमिन , पादरियों के फंदे  को जो काट चुका 
  कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला 
           दिनकर तो कृषक बच्चों के दूध के लिए  मन्दिर में पाषाण  के रूप में बैठे भगवान द्वारा रचित स्वर्ग को ध्वस्त कर  उसे लूटने का नारा  दे देते हैं -

कब्र कब्र में अबुध बालकों  की भूखी हड्डी रोती है
दूध दूध की कदम कदम पर सारी रात सदा होती है 
 दूध दूध ओ वत्स मंदिरों में बहरे पाषाण यहाँ हैं 
दूध दूध तारे बोलो इन बच्चों के भगवान् कहाँ  हैं 
हटो  व्योम के मेघ पन्थ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं 
दूध -दूध ओ वत्स तुम्हारा दूध खोजने हम आते हैं । 
    ई । 
    दिनकर  के अंतस् का शंकर भवानी का आह्वान करता है  कि  वह बूढ़े विधाता की  सृष्टि मिटा दे और विधाता यदि पूछेगा तो वह   कह देंगे कि  हाँ , मैंने उसे मिटाया है - 
कहीं कुछ पूछने बूढा विधाता आज आया 
कहेंगे हाँ , तुम्हारी सृष्टि को हमने मिटाया । (दिनकर )
     अब बताइए कि  इस मानसिकता वाले कवि को ब्राह्मण और उसके अनुयायी कैसे बर्दाश्त करते । नेहरू ने ब्राह्मण  समझकर ही दिनकर को राज्यसभा में जगह दी थी । लेकिन दिनकर को नेहरू के ब्राह्मणवाद से नफरत थी। 1962 में चीन से हार के बाद दिनकर ने राज्य -सभा में नेहरू पर व्यंग्य करते हुए यह कविता पढ़ी थी -
देखने में देवता सदृश लगता  है
बन्द कमरे में गलत हुक्म लिखता है 
 जिस पापी को गुण नहीं गोत्र प्यारा है
समझो उसी ने हमें मारा है । 
     इसतरह नेहरूकालीन काँग्रेस संस्कृत काँग्रेस थी , वह काँग्रेस जिसके भगवान् पुरोहितों की  कैद में होते थे , जिनके प्रसाद बनियों के द्वारा तैयार किये जाते थे । दिनकर इस कैदी भगवान् के स्वर्ग को लूट लेना चाहते थे ॥ फिर तालमेल कैसे सम्भव था ? दिनकर भारत के दलित भूपतियों और उसके साथी रहे दलित मजदूरों के दर्दिल  स्वर थे । 
     हमें दिनकर के आह्वान को सुनना चाहिए था । दुर्भाग्यवश स्वामी सहजानंद और डॉ  श्रीकृष्ण सिंह ने संस्कृत की परिधि से बाहर झाँकने  से इनकार  कर दिया था  , अन्यथा दिनकर ने तो आगाह कर ही दिया था -
    सदियों की  ठंढी बुझी राख सुगबुगा उठी 
  मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है 
  दो  राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो
    सिंहासन खाली करो कि  जनता आती है
  
           दलित भूपतियों और उनके दलित मजदूरों के लिए सिंहासन को खाली करना ही होगा । भ्रमित नहीं होना । यह  सिंहासन राज्यों में नहीं दिल्ली की  संसद में सजता है ।सदियों से  बौद्ध और मुसलमान  इस सिंहासन पर कब्जा किये हुए हैं , लेकिन अब उन्हें खाली करना होगा ।

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