रमेश कुमार की एक फ़ैक्टरी थी, जिसमे वो मास्क, सर्जिकल ग्लोवस के 50,000 पीस का उत्पादन करते थे, उनके बनाए पीस की लागत 20 रूपये आती थी, जिसे वो 25 रुपए मे बेचते थे, और करीब 25 लोगो को रोजगार देते थे! ...
ऐसी ही एक फ़ैक्टरी डेविड की अमेरिका मे थी, जिसमे वो 1 लाख पीस बना लेता था, उसकी लागत 30 रूपये की थी, डेविड अमेरिका मे 10 लोगो को रोजगार देता था! ... ऐसी छोटी छोटी अनेक फ़ैक्टरिया विश्व के अनेक हिस्सो मे थी, जो हजारो लोगो को रोजगारी देती थी!
पर फिर एक दिन "चीन" में, झिंगझांग नाम की एक व्यक्ति ने, चीन की सरकार की मदद से एक विश्व का सबसे बड़ा ऑटोमैटिक प्लांट लगाया, जिनमे 80 मजदूरो के माध्यम से, झिंगझांग एक महीने मे 50 लाख पीसो का उत्पादन करता था! सस्ती बिजली, सस्ते मजदूर, बड़ा प्लांट, सरकारी सब्सिडी की वजह से वह, 10 रुपए पीस मे मास्क बेचने लगा! धीरे धीरे पूरे विश्व मे फ़ैक्टरिया बंद हो गयी! हर कोई झिंगझांग से मास्क और ग्लोव खरीद कर बेचने लगा! ...
अमेरिका मे डेविड ने भी एक तरीका निकाला, वो बेचता तो अभी भी डेविड के नाम से ही था, पर वो उत्पादन झिंगझांग की फ़ैक्टरि से बनवा कर लेने लगा!
भारत भी कैसे अछूता रहता! कुछ ट्रैडर , इंपोर्टर चीन से माल लाने लगे और 15 रुपए मे हजारो मास्क बेचने लगे! 15 रूपय का मास्क 5 रूपय मे लाकर duty बचाते! सख्ती बढ़ी तो Traders ने मंत्रालय मे सेटिंग कर, मास्क और gloves को जरूरी आइटम बता, उस पर आयात शुल्क भी ख़त्म करा लिया!
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रमेश कुमार तीन साल तक इससे लड़ते रहे, उन्होने अनेक चंबर ऑफ कॉमर्स के माध्यम से, एसोशिएशन के माध्यम से अपनी कहानी सरकारी अधिकारियों तक पहुचाई, पर हर जगह लालफीताशाही के चलते, उनकी कुछ नहीं सुनी गयी! .. उनकी यूनिट का कम काम देख, बैंक ने भी ब्याज की दर बढ़ा दी और उन्हे परेशान करने लगे! उधर सब डिपार्टमेंट को लगता था ये तो उधोगपति है, बहुत मोटा माल इसके पास है, थोड़ा हमे मिल जाएगा तो क्या घट जाएगा! ...
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भरपूर संघर्ष के बाद, 3-4 साल मे रमेश जी इस सिस्टम से हार गए! उनका बैंक लोन एनपीए हो गया! बैंक ने उनकी संपत्ति फ़ैक्टरी नीलाम कर दी! लोगो ने आरोप लगाया की रमेश फ़्रौड है, बैंक के पैसे खा गया! उनकी फ़ैक्टरी के मजदूर बेरोजगार हो गए ।
एक्साइज़, इंकम टैक्स , सेल्स टैक्स सबने लाखो के मुकदमे रमेश जी पर डाल दिये! रमेश जी का मकान बिक गया, बुरा समय आने पर रिश्तेदारों ने मुह मोड लिया! वो एक छोटी सी दुकान चलाते हुए, परिवार के साथ, दो कमरो के मकान मे जीवन व्यतीत करने लगे! पर ऑनलाइन विदेशी कंपनियों के चलते दुकान की बिक्री भी नगण्य थी!
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फिर एक दिन पूरी दुनिया मे COVID-19 नाम की महामारी फैली, इसकी शुरुआत चीन से हुई! चीन ने मास्क और ग्लवस के निर्यात पर पाबंदी लगा दी! डेविड की कंपनी हो या भारत के आयातक, सब बिना माल के बैठे थे!
चीन की स्थिति संभली तो उसने घटिया मास्क 100 रूपय पीस मे बेचने शुरू कर दिये! पूरा विश्व मजबूर था, क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं था!
रमेश, एक हाथ मे मुकदमो का नोटिस और दूसरे हाथ मे अखबार मे इस महामारी के बारे मे पढ़ आँसू बहाते रहते थे! आज उनकी छोटी सी फ़ैक्टरी चालू होती तो शायद वो अपने देश का स्वाभिमान न बिकने देते!
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यह एक काल्पनिक कहानी है, जिसका जीवित अथवा मृत किसी व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है! ... पर ध्यान रखे, जब हम कोई आयातित उत्पाद खरीदते है, तो रोज अनेक रमेश को मारते है! संकल्प ले, अब हम किसी रमेश को झुकने नहीं देंगे!
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