"एक मुलाकात नाथूराम गोडसे जी के छोटे भाई गोपाल गोडसे जी के सुपुत्र नारायण गोडसे जी से"
साल 2018 ... मैं शिमला में आफिस कार्य से गया हुआ था ... वहां मेरी मुलाकात नाथूराम गोडसे जी के छोटे भाई गोपाल गोडसे के सुपुत्र ... श्री नारायण गोडसे और उनकी धर्मपत्नी से हुई ... काफी सारी इधर उधर की बातें की ... मैं यह जानना चाहता था ... कि गांधी की हत्या के बाद उनके परिवार पर क्या गुजरा ...
उन्होंने बताया जिस समय महात्मा गांधी की हत्या हुई ... उस समय उनके पिता गोपाल गोडसे इंडियन आर्मी में सेवारत थे ....और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वह ईरान और इराक में भी अंग्रेजी फौज की ओर से युद्ध में भाग लिए थे ...
गांधी की हत्या के तुरंत बाद ... नाथूराम गोडसे और नाना आप्टे को ... घटनास्थल से गिरफ्तार कर लिया गया ... और गोपाल गोडसे को पुणे से गिरफ्तार किया गया ... निसंदेह गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी ... और नाथूराम गोडसे और नाना आप्टे ने घटनास्थल से भागने की कोई कोशिश नहीं की थी ... लेकिन गोपाल गोडसे पुणे में थे ... उनका इस घटना से कोई संबंध नहीं था ... पर उन्हें भी इस हत्याकांड के लिए 18 साल की सजा दी गई ... नाथूराम गोडसे की एक इंश्योरेंस थी ₹5000 की ... जिसमें गोपाल गोडसे की धर्मपत्नी सिंधुताई गोडसे नॉमिनी थी ... क्योंकि नाथूराम गोडसे अविवाहित थे ... तो उन्होंने अपने छोटे भाई की धर्मपत्नी को नॉमिनी बनाया था ... इसी को आधार बनाते हुए कांग्रेस सरकार ने गोपाल गोडसे को 18 साल तक जेल में रखा ...
गांधी वध के तुरंत बाद पुणे और उसके आसपास के इलाकों में चितपावन ब्राह्मणों की सामूहिक हत्याकांड शुरू हो गई ... सिंधुताई गोडसे अपने तीनों छोटे बच्चों को लेकर जान बचाने के लिए इधर उधर भागती रही ... ऐसे वक्त में नाते रिश्तेदारों ने भी उनसे हाथ खींच लिया ... राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गांधी हत्या एक जघन्य अपराध है ... कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया ... उनके घर को जलाकर खाक कर दिया गया ...
जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने सड़क के किनारे लोहार का काम शुरू किया ... स्वर्गीय नारायण गोडसे से अपने हाथ मेरे हाथ में दिया ... और दबाने को कहा ... उनका हाथ पत्थर के माफिक कठोर थे ... उन्होंने कहा 12 साल की उम्र से वह लोहे पीट रहे थे अपनी माता जी के साथ... बहने बड़ी होती जा रही थी ... कहीं भी रिश्ते की बात होने से कांग्रेसी नेता लड़के वाले को भड़का देते थे ... और विवाह नहीं होने देते थे ... उनकी माता जी के साथ में अभद्र व्यवहार सरेआम होता था ... 2 बार तो ऐसा हुआ जब थाने से लड़के वाले को विवाह ना करने को कहा गया ... और विवाह करने की स्थिति में अंजाम भुगतने की धमकी दी गई ... आखिर वीर सावरकर ने अपने छोटे भाई के बेटे से उनकी एक बहन का विवाह करवाया ... जो बाद में हिमानी सावरकर के नाम से अभिनव भारत की प्रेसिडेंट हुई ...
आपको क्या लगता है कितने ब्राह्मणों की हत्या की गई ... मैंने उनसे पूछा ... उनकी आंखों में आंसू आ गए ...और उन्होंने कहा दिन तो किसी तरह गुजर जाता था ... लेकिन रात होते ही चुन-चुन कर चितपावन ब्राह्मणों के घर पर पेट्रोल से हमला होती थी ... और घर और उसमें रहने वाले केा साथ जलाकर राख कर दिया जाता था ... ना कोई मामला दर्ज किया जाता था ... ना पड़ोस के लोग कांग्रेसियों के डर से मदद कर पाते थे ... मदद करने वाले को अंजाम भुगतने की धमकी दी जाती थी ... और कुछ जगह पर तो मदद करने वालों की सार्वजनिक हत्या भी की गई ... ऐसी हालत में उनकी माताजी अपने दोनों छोटे बच्चों को लेकर गांव चले गए ... और एक गांव से दूसरे गांव तक भटकते रहे ... लोगों ने सलाह दिया कि वह अपने को नाथूराम का संबंधी ना बताएं ... अन्यथा जान से मारे जाएंगे ... किसी तरह से दंगा समाप्त हुआ ... लगभग 8000 से अधिक चितपावन ब्राह्मणों की सरेआम हत्या के बाद ... गांधी वध का बदला 8000 निर्दोष ब्राह्मणों की हत्या करके लिया गया ...
उन्होंने एक लंबी सांस लिया ... एक घूंट पानी पिया ... उनकी आंखों में आंसू थे ... और आगे कहना शुरू किया ... जीवन कठिन था ....दो वक्त की भोजन असंभव ... माताजी ने लोहार का काम शुरू किया ... सड़क के किनारे बैठ कर लोहे के छोटे-मोटे औजार बना कर बेचना शुरू किया ... 1962 की युद्ध के दौरान उन्होंने अपनी सेवाएं केंद्र सरकार को देने के लिए पत्र भी लिखा ... जिसका उन्हें कोई जवाब नहीं मिला ... 1965 के युद्ध के दौरान भी उन्होंने अपनी सेवाएं केंद्र सरकार को देने के लिए पत्र लिखा जिसका कोई जवाब नहीं मिला ...
स्वर्गीय नाथूराम गोडसे के फांसी के बाद उनके परिवार ने उनका मृत शरीर की मांग की थी ... ताकि वे हिंदू रीति रिवाज के अनुसार उनका अंतिम क्रिया कर्म कर सकें ... लेकिन सरकार ने उसकी पत्र का कोई जवाब नहीं दिया ... अंबाला जेल में ही उन दोनों को फांसी देकर ... उनकी लाश भी जला दी गई ...अस्थियां घग्गर नदी में फेंक दी गई ... किसी तरह से उनके परिवार को स्वर्गीय नाथूराम गोडसे और स्वर्गीय नाना आप्टे की अस्थियां मिली ... जिसको उन्होंने अपने घर के एक कमरे में रखा है ... क्योंकि नाथूराम गोडसे की अंतिम इच्छा थी ... उनकी अस्थियां सिंधु नदी में बहाया जाय ... जब सिंधु नदी हिंदुस्तान के झंडे तले बह रहा हो ... चाहे इसके लिए कितना भी समय लग जाए ... कितनी भी पीढ़ियां गुजर जाए ... नाथूराम गोडसे जी का कहना था ... यहूदियों को 16 साल लगा इसराइल को पाने में ... हमें भी 100 - 200 साल लग सकते हैं ... लेकिन हमें इंतजार और संघर्ष करना होगा ... नाथूराम गोडसे ने एक बात कही थी ... बाकी क्रांतिकारियों को और उनके परिवार वाले को ... सम्मान मिलेगा ...धन भी मिलेगी ... और लोग उनसे जुड़ने में गर्व महसूस करेंगे ... वे देशभक्त कहलाए जाएंगे ... लेकिन मेरे परिवार को ना सम्मान मिलेगा ... ना धन मिलेगा ... लोग भी उनसे जुड़ने से परहेज करेंगे ... उन्हें देशद्रोही कहा जाएगा ... अंग्रेजों के समय में तो सिर्फ क्रांतिकारी को फांसी दी जाती थी ... और परिवार वाले सुरक्षित होते थे ... मेरे मरने के 100 साल के बाद ... लोगों को मेरा बलिदान समझ में आएगा ... और गांधी का मुखौटा उतर चुका होगा ... लेकिन 100 साल तक मेरे परिवार को भीषण कष्ट सहने होंगे ...
आजादी के बाद ना सिर्फ नाथूराम गोडसे और नाना आप्टे को फांसी दी गई ... बल्कि उनके पूरे परिवार को तबाह और बर्बाद कर दिया गया ... और साथ में तबाह हुए 8000 निर्दोष परिवार ... गांधी की अहिंसा का बहुत बड़ा कीमत चुकानी पड़ी निर्दोष ब्राह्मणों को ...
उनके साथ भोजन किया और मैं चलने का इजाजत मांगा ... वह मुझे छोड़ने गेट तक आए ... मैं उनके चरण स्पर्श करने के लिए झुका ... लोहे जैसे हाथों से उन्होंने मुझे उठाया ... उनकी आंखों में आंसू थे ... मेरी भी आंखें नम थी ... कहने का कुछ नहीं था ... फिर भी उन्होंने कहा अगली बार पुणे घर पर आना और घर पर ही रुकना ...मैंने भी हां में सिर हिलाया ...
बोझिल मन से
"ठाकुर की कलम से"
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