पालघर में मॉबलिन्चिंग नहीं हुई है...
ये मामला कुछ और है तथा इसके संकेत संदेश बहुत गम्भीर और खतरनाक है. इसलिए महाराष्ट्र के पालघर में दो वृद्ध साधुओं और उनके ड्राईवर की नृशंस हत्या को मॉबलिन्चिंग कह कर उस घटना की गम्भीरता को कम मत करिए तथा उसमें निहित भयानक खतरे को मॉबलिन्चिंग का शोर मचा कर हाशिये पर मत धकेलिए.
पहले तो यह समझ लीजिए कि पालघर में हुआ वो तिहरा हत्याकांड मात्र मॉबलिन्चिंग क्यों नहीं है.?
पालघर के तिहरे हत्याकांड के उस वीडियो को देखिए जो सोशल मीडिया में जमकर वाईरल हो रहा है. उस वीडियो में स्पष्ट दिखाई देता है कि पुलिस वाले उन साधुओं को घायल अवस्था में एक कमरे से लेकर बाहर निकलते हैं और बीच सड़क पर लाकर उस हत्यारी भीड़ के हवाले कर देते हैं. कल से घटना का वह वीडियो देखने सुनने के बाद मैंने अपने स्मृतिकोष को जमकर खंगाला और यह जानने का प्रयास किया कि ऐसी कोई घटना इससे पहले कब हुई थी.? लेकिन ऐसी कोई घटना मुझे अभी तक याद नहीं आई है जिसमें पुलिस ने किसी को हत्यारों के हवाले कर दिया हो.
अतः वह दृश्य देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि उस तिहरे हत्याकांड को पुलिस संरक्षण में पुलिस के सहयोग से ही अंजाम दिया गया है. उस तिहरे हत्याकांड से सम्बन्धित पालघर पुलिस का प्रेसनोट ही यह बता रहा है कि उन साधुओं को अपने संरक्षण में कमरे से निकालने वाले पुलिस दल के पास 9 एम एम पिस्टल सरीखे हथियार थे लेकिन 3 आदमी पुलिसवालों के सुरक्षा घेरे से खींच कर उन्हीं की आंखों के सामने मौत के घाट उतार दिए गए किन्तु उस हत्यारी भीड़ में शामिल हत्यारों में से किसी एक को भी गोली नहीं लगी है, अर्थात् वो हत्यारे पुलिस वालों से केवल कुछ फुट या कुछ मीटर की दूरी पर तीन लोगों को पीट पीटकर मौत के घाट उतारते रहे लेकिन पुलिस ने गोली नहीं चलाई और वो तीन लोग मौत के घाट उतार दिए गए.
किसी अनपढ़ गंवार जाहिल से भी पूछिये तो वो आपको बता देगा कि ऐसे अवसरों पर उपयोग करने के लिए ही देश के संविधान और कानून के अनुसार कोई भी राज्य सरकार पुलिसवालों को हथियार देती है. पालघर पुलिस का प्रेसनोट ही यह भी बता रहा है कि उन साधुओं को भीड़ के चंगुल से छुड़ाने की पुलिसवालों की कोशिश के जवाब में उस हत्यारी भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर भी हमला कर दिया जिसमें एक पुलिसकर्मी की वर्दी फट गई है. इसके जवाब में पुलिसकर्मी ने 9 एम एम पिस्टल से दो राउंड फायर किए.
यह कितनी निर्लज्ज नपुंसक हास्यास्पद सफाई है कि जो हत्यारी भीड़ तीन लोगों को सरेआम सड़क पर मौत के घाट उतार रही थी उसी भीड़ द्वारा उसी समय पुलिसकर्मियों पर किए गए हमले में किसी पुलिस वाले को खरोंच तक नहीं आई, केवल एक पुलिसकर्मी की वर्दी थोड़ा फट गई. यह सभी परिस्थितियां गवाही दे रही हैं कि पालघर इलाके में हुआ तिहरा हत्याकांड कोई मॉबलिन्चिंग मात्र नहीं है. बल्कि पुलिस संरक्षण में पुलिस के सहयोग से ही अंजाम दिया गया एक पूर्व नियोजित सुनियोजित हत्याकांड है.
इसमें शामिल हत्यारे और पुलिसकर्मी अपने राजनीतिक आकाओं की केवल कठपुतली मात्र हैं।।
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