#नालंदा_के_खँडहर_पर_भटकती_हुई_सरस्वती
जिस प्रकार विश्व मानव समाज के ऐतिहासिक आलेखों में आर्यावर्त के सर्वप्राचीन सनातनधर्म और हिंदू संस्कृति का उल्लेख स्वर्णाक्षरों में है ठीक वैसे ही क्षिक्षण एवं अध्यापन के इतिहास में दुनिया की दो सर्व प्रथम विश्व विद्या मंदिर नालंदा एवं विक्रमशिला सूबे बिहार के गौरवशाली ज्ञान परंपरा को गर्व देती है जिसे हम अज्ञानता वश नहीं जानकर भ्रष्टाचार के महासमुंदर में डूबे टपोरी टॉपर घोटाले की परिचर्चा और व्यंग बाण पर सभ्य समाज के समक्ष निरूत्तर हो जाते हैं।
आज की परिचर्चा नालंदा खण्डहरों और अवशेषों में दफ्न विद्यार्जन की विश्व राजधानी नालंदा विश्वविद्यालय पर केंद्रित है।सन् ४५३ ईस्वी में गुप्त वंश के चक्रवर्ती सम्राट कुमार गुप्त प्रथम ने विश्व के प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय के रूप में इसकी स्थापना की जिसके विकास और संरक्षण में हेमंत गुप्त और भारतवर्ष के अंतिम प्रसिद्ध हिंदू राजा हर्षवर्धन और उनके पश्चात पाल राजवंश के समस्त सम्राटों को है।
पुरातत्व वेत्ता श्री राहुल बाबू द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध एवं सनातनी विश्वविद्यालय के भग्नावशेष बिहार के प्राचीन शैक्षणिक वैभव का एहसास करा देते हैं।
अनेक पुराभिलेखों और सातवीं शताब्दी में दरबे के इतिहास को पढ़ने आया था के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है।
अध्यापन पद्धति
शिक्षण के तीर्थ नालंदा विश्वविद्यालय में बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की, यूरोप, रूस और एशिया के लगभग सभी धर्मों के लिए गहन शिक्षण की व्यवस्था थी। करीबन १०,००० छात्रों को पढ़ाने के लिए २,००० शिक्षक और १,५१९ आचार्य थे। प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिन होती थी और उसके कारण प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते थे। उन्हें तीन कठिन परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था। समस्त विश्वविद्यालय का प्रबंध कुलपति या प्रमुख आचार्य करते थे जो भिक्षुओं द्वारा निर्वाचित होते थे। कुलपति दो परामर्शदात्री समितियों के परामर्श से सारा प्रबंध करते थे। प्रथम समिति शिक्षा तथा पाठ्यक्रम संबंधी कार्य देखती थी और द्वितीय समिति सारे विश्वविद्यालय की आर्थिक व्यवस्था तथा प्रशासन की देख-भाल करती थी। विश्वविद्यालय को दान में मिले दो सौ गाँवों से प्राप्त उपज और आय की देख-रेख यही समिति करती थी। इसी से सहस्त्रों विद्यार्थियों के भोजन, कपड़े तथा आवास का प्रबंध होता था। इस विश्वविद्यालय में तीन श्रेणियों के आचार्य थे जो अपनी योग्यतानुसार प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी में आते थे। नालंदा के प्रसिद्ध आचार्यों में शीलभद्र, धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणमति और स्थिरमति प्रमुख थे। ७ वीं सदी में ह्वेनसांग के समय इस विश्व विद्यालय के प्रमुख शीलभद्र थे जो एक महान आचार्य, शिक्षक और विद्वान थे।नालंदा विश्वविद्यालय में आचार्य छात्रों को मौखिक व्याख्यान द्वारा शिक्षा देते थे। इसके अतिरिक्त पुस्तकों की व्याख्या भी होती थी। शास्त्रार्थ होता रहता था। दिन के हर पहर में अध्ययन तथा शंका समाधान चलता रहता था।अध्ययन क्षेत्रसंपादित करेंयहाँ महायान के प्रवर्तक नागार्जुन, वसुबन्धु, असंग तथा धर्मकीर्ति की रचनाओं का सविस्तार अध्ययन होता था। वेद, वेदांत और सांख्य भी पढ़ाये जाते थे। व्याकरण, दर्शन, शल्यविद्या, ज्योतिष, योगशास्त्र तथा चिकित्साशास्त्र भी पाठ्यक्रम के अन्तर्गत थे। नालंदा की खुदाई में मिली अनेक काँसे की मूर्तियो के आधार पर कुछ विद्वानों का मत है कि कदाचित् धातु की मूर्तियाँ बनाने के विज्ञान का भी अध्ययन होता था। यहाँ खगोलशास्त्र अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था।पुस्तकालयसंपादित करेंनालंदा में सहस्रों विद्यार्थियों और आचार्यों के अध्ययन के लिए, नौ तल का एक विराट पुस्तकालय था जिसमें ३ लाख से अधिक पुस्तकों का अनुपम संग्रह था। इस पुस्तकालय में सभी विषयों से संबंधित पुस्तकें थी। यह 'रत्नरंजक' 'रत्नोदधि' 'रत्नसागर' नामक तीन विशाल भवनों में स्थित था। 'रत्नोदधि' पुस्तकालय में अनेक अप्राप्य हस्तलिखित पुस्तकें संग्रहीत थी। इनमें से अनेक पुस्तकों की प्रतिलिपियाँ चीनी यात्री अपने साथ ले गये थे।छात्रावाससंपादित करेंयहां छात्रों के रहने के लिए ३०० कक्ष बने थे, जिनमें अकेले या एक से अधिक छात्रों के रहने की व्यवस्था थी। एक या दो भिक्षु छात्र एक कमरे में रहते थे। कमरे छात्रों को प्रत्येक वर्ष उनकी अग्रिमता के आधार पर दिये जाते थे। इसका प्रबंधन स्वयं छात्रों द्वारा छात्र संघ के माध्यम से किया जाता था।छात्र संघसंपादित करेंयहां छात्रों का अपना संघ था। वे स्वयं इसकी व्यवस्था तथा चुनाव करते थे। यह संघ छात्र संबंधित विभिन्न मामलों जैसे छात्रावासों का प्रबंध आदि करता था।आर्थिक आधारसंपादित करेंछात्रों को किसी प्रकार की आर्थिक चिंता न थी। उनके लिए शिक्षा, भोजन, वस्त्र औषधि और उपचार सभी निःशुल्क थे। राज्य की ओर से विश्वविद्यालय को दो सौ गाँव दान में मिले थे, जिनसे प्राप्त आय और अनाज से उसका खर्च चलता था।
प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने ७ वीं शताब्दी में यहाँ जीवन का महत्त्वपूर्ण एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत किया था। प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र' का जन्म यहीं पर हुआ था।सनातन एवं बौद्ध धर्म के केंद्र में उस युग में
अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था। इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार था। उत्तर से दक्षिण की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में बुद्ध भगवान की सुन्दर मूर्तियाँ स्थापित थीं। केन्द्रीय विद्यालय में सात बड़े कक्ष थे और इसके अलावा तीन सौ अन्य कमरे थे। इनमें व्याख्यान हुआ करते थे। अभी तक खुदाई में तेरह मठ मिले हैं। वैसे इससे भी अधिक मठों के होने ही संभावना है। मठ एक से अधिक मंजिल के होते थे। कमरे में सोने के लिए पत्थर की चौकी होती थी। दीपक, पुस्तक इत्यादि रखने के लिए आले बने हुए थे। प्रत्येक मठ के आँगन में एक कुआँ बना था। आठ विशाल भवन, दस मंदिर, अनेक प्रार्थना कक्ष तथा अध्ययन कक्ष के अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे तथा झीलें भी थी।
अवसान:
१३ वीं सदी तक इस विश्वविद्यालय का पूर्णतः अवसान हो गया। मुस्लिम इतिहासकार मिनहाज़ और तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के वृत्तांतों से पता चलता है कि इस विश्वविद्यालय को तुर्कों के आक्रमणों से बड़ी क्षति पहुँची। तारानाथ के अनुसार तीर्थिकों और भिक्षुओं के आपसी झगड़ों से भी इस विश्वविद्यालय की गरिमा को भारी नुकसान पहुँचा।
आक्रमणकारियों के हमले:
इसपर पहला आघात हुण शासक मिहिरकुल द्वारा किया गया ११९९ में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने पहले इसे तोपों से उडा़ने का असफल प्रयास किया और बाद में इसे जला कर पूर्णतः विनष्ट नष्ट कर दिया।
#परिचर्चा_पर_कुछ_ज्वलंत_सवाल
(१). नालंदा विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना हेतु आजादी से अबतक आखिर क्यों कोई प्रयास नहीं किया गया?
हालांकि इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि स्थानीय राजनीति और जातिगत लड़ाईयों के बीच पहले मुगल साम्राज्य फिर बर्तानियां हूकुमत और आजादी के बाद जनप्रतिनिधियों की लापरवाही ही रही।
सूचित करना है कि इन मूर्खतापूर्ण हरकतों के बीच तकरीबन ८२१वर्षों बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नालंदा के नाम पर राजनीति करते हुए एक कागजी शिक्षण संस्थान नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना जरूर की किंतु युनेस्को द्वारा विश्व सांस्कृतिक धरोहर की मान्यता मिल जाने मात्र से नागिन डांस करनेवाले सफेद कौओं ने अबतक इस महान विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना हेतु कोई प्रयास नहीं किया और विश्व के समस्त भू भाग पर निवासरत प्रबुद्ध बिहारियों ने भी शिक्षा के इस सांस्कृतिक धरोहर के जीर्णोद्धार की कोई मांग नहीं की मेरे समक्ष यह यक्ष प्रश्न से कम नहीं है।
(२). शिक्षण के लिए पलायन ही हिंदुस्तानी छात्रों के लिए सर्वश्रेष्ठ विकल्प है करता?
शिक्षण प्राप्ति हेतु कभी आस्ट्रेलिया जाकर नस्लवाद की मौत मरनेवाले अमेरिका और यूरोप में रंगभेद का शिकार होनेवाले भारतीय विद्यार्थी जो संपूर्ण विश्व में क्रांति और सक्रिय राजनीति की परिभाषा बने हुए हैं आखिर कब सरकार से इस महान शिक्षण संस्थान के पुनरुद्धार की पहले जायज़ मांग और फिर आंदोलन करेंगे यह अब भी सबसे बड़ा सवाल है?
जैसा कि आप सबको मालूम है कि कोरोना जैसी महामारी के दुष्प्रभावों की चपेट में भारत की अपेक्षा विश्व के विकसित देश कहीं अधिक हैं ऐसे में क्या हमारे राष्ट्र निर्माताओं को उच्च शिक्षण पर आत्मनिर्भता हेतु नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय जैसी खुबसूरत विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना हेतु एक बार पुनः प्रयास नहीं करना चाहिए?
यूरोप और अमेरिका के शिक्षण संस्थानों और हावर्ड की डिग्री पर इतरानेवाले भारतीय क्या यह जानते हैं कि इन्हीं प्राचीन शिक्षण संस्थानों में अध्ययन करके निकलते थे वर्ल्ड क्लास के आर्किटेक्ट और टेक्नोक्रेट। ये गुरुकुल ब्राह्मण चलाते थे, जिसे समाज के बारहों वर्ण का सहयोग प्राप्त होता था। जहाँ सवर्ण समाज संसाधन और संरक्षण देता था वहीं सर्वहारा समाज के आम लोगों द्वारा सेवा और यथोचित दान मिलता था लेकिन वे शिक्षक और अध्यापक के साथ प्राचार्य किसी राजा के वेतनभोगी नौकर नहीं होते थे।
(३). शिक्षण संस्थानों को आरक्षण से क्यों ना दूर रखा जाये?
जॉर्ज मैकाले के पूर्व भारत के गुरुकुलों के बारे में एकत्रित किये गए डेटा को पंडित धर्मपालजी ने अपनी पुस्तक #TheBeautifulTree में संकलित किया है।
इस पुस्तक के अनुसार प्राचीन आर्यावर्त के समस्त विश्व विद्यालयों में जाति प्रथा नहीं थी।
वहाँ संपूर्ण विश्व के बारहों वर्ण और एक सौ उन्नीस जातियों के छात्र समान रुप से शिक्षा प्राप्त करते थे। इन गुरुकुलों में दलित छात्रों की संख्या द्विज छात्रों से चार गुणी अधिक थी।
यदि इस पुस्तक पर विश्वास नहीं हो तो एक प्रश्न का उत्तर दें-भार्गव परशुराम जी ने अधिरथ एवं राधेय पुत्र कर्ण को शास्त्र एवं शस्त्र का ज्ञान कैसे दिया यह जानकार भी कि वो एक शूद्र पुत्र हैं?
शिक्षा को किसी भी सभ्य समाज के वैभव और सभ्यता संस्कृति का आधार माना जाता है। भारतवर्ष के प्राचीन युग का वो विशाल वैभव और स्नेह एवं संस्कृति का जलता दीप सरनेम या आरक्षण पर नहीं अपितु विक्रमशिला,तक्षशिला, नालंदा और मगध जैसे बिहार की पावन धरा पर अवस्थित उन वैभवशाली गुरुकुलों शिक्षा व्यवस्था के कारण ही थी। यह व्यवस्था जब तक हमारे देश में जीवित थी, किसी भी भारतीय को किसी विदेशी भूमि में जाकर गिरमिटिया मजदूर बनने की आवश्यकता नही पड़ी।
विल डुराण्ट द्वारा पुस्तक #TheCaseForIndia में यह स्पष्ट रुप से उल्लेखनीय है:
"मनुष्य के मस्तिष्क और हाँथ से बननेवाली दुनियां की सबसे बहुमूल्यतम वस्तुएं, जिनका मूल्य या तो उनकी उपयोगिता के कारण है, या फिर उनकी सुंदरता के कारण, वे सब भारत मे हजारों वर्षों से निर्मित होती हुई आयी थीं, जब अंग्रेजो ने भारतवर्ष की धरती पर कदम रखा तब वह नि: संदेह सोने कि चिड़िया थी अपने परंपरागत सूती-खादी-सिल्क-कालीन-हस्त-शिल्प जैसे आधारभूत ग्रामीण उद्योगों के कारण।
यह तो इतिहास की पुस्तकों में हम सबने पढ़ा ही है कि मुगलों के ३३९ वर्षों की गुलामी के बावजूद अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भारत मे दुनिया का विशालतम इंडस्ट्री थी जिस वैभव को गोरों ने विनष्ट किया और बर्तानिया हूकुमत की २५० साल की अराजकता के बाद भी भारत वैभवशाली ही था जिसकी समृद्धि का अंत विगत ७० सालों में राजनेताओं द्वारा हिंदुस्तान की प्राकृतिक संपदाओं को उद्योगपतियों के साथ बन्दर बांट में घपलों और घोटालों से लूटकर बर्बाद कर दिया शायद अफगान और तुर्की दहशतगर्द आक्रमणकारियों ने भी हमारे राष्ट्र को इतना अधिक क्षतिग्रस्त नहीं किया होगा यह तो दावे के साथ कहां जा सकता है।
अभी हाल में हमारे विदेशमंत्री ने अर्न्तराष्ट्रीय मंच पर यह घोषणा कि के मैकाले के पूर्वजो और वंशजो ने भारत से 45 ट्रिलियन डॉलर की लूट की इधर कालाधन पर सख्त कार्रवाई के बाद स्विस नेशनल बैंक (एसएनबी) के सालाना आंकड़ों के अनुसार स्विस बैंक खातों में जमा भारतीय धन 2016 में 45 प्रतिशत घटकर 67.6 करोड़ फ्रैंक ( लगभग 4500 करोड़ रुपये) रह गया. एसएनबी के आंकड़ों के अनुसार भारतीयों द्वारा स्विस बैंक खातों में सीधे तौर पर रखा गया धन 2017 में लगभग 6,891 करोड़ रुपये (99.9 करोड़ फ्रैंक) हो गया है।
अतएव भविष्य में शिक्षा क्षेत्र में अभूतपूर्व सुधार के लिहाज से हर भारतीय को अब प्रचीन शिक्षण संस्थानों के पुनरुत्थान हेतु वैचारिक मतभेद को भूलाकर एक मंच से मांग उठाना चाहिए ताकि भारत का भविष्य उज्जवल हो।
जय परशुराम 🚩
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