इतिहास खुद को दोहराता रहता है
#सिंधिया
बात 1967 की है... जब राजमाता #विजयराजे_सिंधिया मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्रा से मिलने पहुँची थीं तो उनकी बस इतनी सी माँग थी कि उनके 'राज' में हर सीट पर उनकी पसंद के उम्मीदवार हों। विधानसभा चुनाव सिर पर था और एकछत्र शासन करने वाले सीएम मिश्रा को ये बातें रास नहीं आईं। उन्होंने तपाक से पूछ दिया कि कौन सा 'राज'? उन्हें पता था सिंधिया 'ग्वालियर राज' की बात कर रही हैं। डीपी मिश्रा ने कहा दिया कि अब कोई राज-वाज नहीं है, आज़ादी मिल गई है और राजा-महाराजाओं के दिन लद गए हैं। सिंधिया ने इस अपमान से आहत होकर कॉन्ग्रेस छोड़ दी और ग्वालियर की सारी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे।
डीपी मिश्रा ने राजमाता सिंधिया से कहा था कि वो ज़्यादा से ज़्यादा ये कर सकते हैं कि उन्हें उनकी मनपसंद सीट चुनाव लड़ने के लिए दे सकते हैं, बाकी उन्हें और कॉन्ग्रेस को तय करना है, लोकतंत्र है। ख़ैर, चुनाव हुआ, कॉन्ग्रेस पार्टी की फिर से जीत हुई और डीपी मिश्रा ही मुख्यमंत्री बने। लेकिन, ग्वालियर क्षेत्र में कॉन्ग्रेस सारी सीटें हार गई। राजमाता में साबित कर दिया कि 'राज' में अभी भी उनका ही सिक्का चलता है। लेकिन क्या इतने भर से अपमान का बदला निकल सकता था? नहीं।
इसके बाद शुरू हुआ असली खेल। राजमाता सिंधिया ने कॉन्ग्रेस पार्टी तोड़ डाली। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस का कुनबा बिखर गया। 36 विधायक सिंधिया की तरफ आ गए और डीपी मिश्रा भागे-भागे दिल्ली पहुँचे। उन्होंने आलाकमान को सुझाव दिया कि राज्यपाल से कह के विधानसभा भंग कर दी जाए। उनकी एक न सुनी गई। राजमाता सिंधिया जनसंघ के समर्थन वाले 'स्वतंत्र विधायक दल' की नेता चुनी गईं लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री बनने से इनकार कर दिया।
राजमाता विजयराजे सिंधिया ने स्वतंत्रता सेनानी रहे गोविंद नारायण सिंह को CM पद दिया। वो 'विंध्य प्रदेश' के मुख्यमंत्री रहे कप्तान अवधेश प्रताप सिंह के बेटे थे। 1967 में दादी ने जो किया, पोता उसे 2020 में इसे दोहरा रहा है। उस समय तो इंदिरा गाँधी कॉन्ग्रेस की सर्वेसर्वा थीं, अबकी तो नेतृत्व की भी बत्ती गुल है। 'राजमाता' से लेकर 'महाराज' तक, ऐसे हज़ार मौके हैं जब लोकतंत्र को राजतंत्र ने नचाया है।
अब आते हैं ताजातरीन #ज्योतिरादित्य_माधवराव_सिंधिया_प्रकरण पर;
-- कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया...
-- फिर कांग्रेस ने उन्हें मप्र कांग्रेस का अध्यक्ष भी नहीं बनाया...
-- फिर कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा के लायक भी नहीं माना...
-- फिर जो खास बंगला उन्होंने मांगा, वो भी नकुलनाथ को दे दिया..
-- फिर कमलनाथ ने अपने अहंकार में सरेआम अपमान करते हुए ये भी कह डाला कि सिंधिया को सड़क पर उतरना हो तो उतर जाएं...
-- फिर दिग्गी और कमलनाथ ने अपनी अगली पीढ़ी को भी सेट करना शुरू कर दिया..
आखिर किसी भी व्यक्ति द्वारा अपमान और उपेक्षा सहने की एक हद होती है (फिर सिंधिया तो महाराज हैं कोई फालतू आदमी तो नहीं), एक "ब्रेकिंग पॉइंट" ऐसा आता है, जब अपमानित-उपेक्षित व्यक्ति कहता है "भाड़ में जाओ बे, अब देखो मैं तुम्हें निपटाता हूँ"...
इसे गुस्सा नहीं कहेंगे, आत्मसम्मान नाम की भी एक चिड़िया होती है। कोई भी व्यक्ति एक सीमा तक ही अपमान और उपेक्षा सहन कर सकता है, सबका अपना अपना एक ब्रेकिंग पॉइंट होता है, वह टूटने के बाद वह सामने वाले को धराशायी करने के लिए जी-जान लगा देता है।
यही काम मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किया है...।
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