"हम सनातनियों का दिनचर्या विश्व परिप्रेक्ष्य में कौतूहल का विषय बना है। "
न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है कि भारत में अभी तक कोरोनावायरस के 125 ही मामले मिले हैं (यह लेख तीन दिन पहले लिखा गया था) और यह सबके लिए एक रहस्य बन गया है कि 1.3 अरब लोगों का यह देश अभी तक इस महामारी से लगभग अछूता कैसे रह पाया है, जबकि उसके पूरब और पश्चिम में लाशें बिछ गई हैं!
इस लेख पर आए कमेंट्स पढ़ने जैसे हैं। सोशल मीडिया का मूल चरित्र उपहास का है और लोकप्रिय फ़ेसबुक पेजेस, ट्विटर हैंडल्स और यूट्यूब चैनल्स पर रोचक कंटेंट के साथ ही उस पर आई टिप्पणियां भी कम दिलचस्प नहीं होतीं।
न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख के प्रत्युत्तर में तुलसी, हल्दी, आंवला और गिलोय-वटी जैसे शब्दों से आकाश भर गया। भारतवंशियों ने अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता का सगर्व गुणगान किया। एक अमरीकी ने ठहरकर कहा- "हो न हो, ये लोग अपने भोजन में कुछ ऐसी औषधियों का उपयोग करते हैं, जो इनकी इम्युनिटी को बढ़ाती हैं। शायद हमें उनसे कुछ सीखने की ज़रूरत है।"
मदर ऑफ़ सरकाज़्म करके एक लोकप्रिय लतीफ़ेबाज़ पेज है। उसने ठहाकों की गूंज के बीच लिखा- "हिंदू लोग हज़ारों सालों से हाथ मिलाने के बजाय नमस्ते कर रहे हैं, पशुओं की पूजा कर रहे हैं, शाकाहारी भोजन कर रहे हैं, और वो घर में प्रवेश करने के बाद नियमित हाथ-पैर धोते हैं। शायद, वे हमेशा से सही थे!"
यह बात भी विनोद में कही गई थी किंतु सोशल मीडिया का एक और गुण यह भी है कि यहां पर एक बार चीज़ें प्रकाश में आने के बाद सार्वजनिक परिप्रेक्ष्य का विषय बन जाती हैं, एक संदर्भ की तरह उन्हें बरता जाता है, और भले ही किसी बात को हलके-फुलके ढंग से कहा गया हो, अगर उससे कोई तर्कसिद्धि होती है तो उसे याद रखा जाता है।
तो क्या सच में ही भारत की रक्षा उसकी प्रतिरोधक क्षमता कर रही है और इसका मूल उसकी जीवन-शैली में है? और क्या यह वही जीवन-शैली है, जिसे अस्वच्छ मानकर पश्चिम एक अरसे से उसकी खिल्ली उड़ाता रहा है? जैसा कि ट्विटर पर एक भारतवंशी ने कहा, "हम भोजन में भरपूर हलदी लेने वाले लोग हैं, हम इतनी जल्दी बीमार नहीं पड़ते।" तिस पर एक विद्वेषी ने तंज़ कसते हुए कहा, "या शायद यह दूषित जल में निःशंक डुबकियां लगाने से मिली सिद्धि है!"
किंतु पूरी दुनिया दम साधे बैठी है, और लगभग प्रतीक्षा कर रही है कि भारत में कम्युनिटीज़ के बीच इस विषाणु का विस्फोट कब होगा। वह अभी तक देखे गए विनाश के नज़ारों में से सबसे भव्य होगा, यह तो सभी के मन में निश्चित है। घड़ी टिक-टिक कर रही है और आज या कल में यह होने ही वाला है, वैसी घोषणाएं भी आज-कल की सीमाओं को लांघ रही हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के मन में उपजा रहस्य अपनी जगह पर क़ायम है। भारत के लोग अकसर बिना किसी ग्लानि या लज्जा के कहते हैं कि यह देश तो भगवान भरोसे चल रहा है- "जेहि विधि राखे राम!" उनका आशय यह होता है कि प्रकृति की स्वयं की जो चैतन्य-मेधा है, भारत की गति-मति उसके अनुरूप है, ऊपर से भले यह आकाश-वृत्ति मालूम हो। किंतु दूसरी तरफ़ यही देश अपने कार्य-व्यवहार में अत्यंत अराजक भी है और चौरस्ते पर लालबत्ती फांदने में एक क़िस्म के गौरव का महसूस करता है।
आज मैं एक सरकारी अस्पताल में गया और वहां सर्वव्यापी निश्चिंतता को देखकर चकित हुआ। महामारी के प्रति सर्वाधिक चैतन्य वहां कदाचित् मैं ही था। यह निश्चिंतता एक नितांत भारतीय गुण है। चिंतातुर तो यहां लोक के उपहास का पात्र बन जावैगा। यह जाने कौन-सी रीति है, इसे बूझना दुष्कर है।
आने वाले छह-सात दिन समस्त परिप्रेक्ष्यों को उजला कर देंगे। ये परीक्षा के दिन हैं। अलबत्ता 22 की शाम पाँच बजे घर के छज्जों से किसी समारोह की तरह शंखनाद और करतलध्वनि की तैयारी करता भारत इसे परीक्षा की घड़ी देखता नहीं है। विफल होने की भी उसे जैसे परवाह नहीं। अकाल और महामारी इस देश की सामूहिक-स्मृति के लिए नई बात नहीं। दुर्दैव ने ही इसे पाला है! "काल भी उसका क्या करे... "
किंतु सोशल मीडिया के लतीफ़ो से यह वस्तुसत्य तो उभरकर सामने आ ही गया कि भोजन और भजन का जीवन में बड़ा महात्म्य है। जो तामसी और विषाक्त भोजन न करेगा, आहार में औषध के तत्वों का सम्यक निर्वाह करेगा और जीवन के उपादानों, देवताओं और मातृकाओं के प्रति परम्परा से ही धन्यभाव रखेगा, वह प्राकृत-चेतना के प्रकोप का भाजन नहीं बनेगा। और अगर सर्वनाश में सच्चरित्र का भी अवसान होता है तो कम से कम वह अपने साथ प्रारब्ध की गठरी लेकर नहीं जाएगा। कौन जाने, भारत की इस चकित कर देने वाली निश्चिंतता के मूल में परम्परा से संचित कर्म और संस्कार का चिंतन भी कहीं छुपा हो।
वैश्विक संकट संसार की सभ्यताओं के परीक्षण का एक प्रयोजन भी होता है!
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