*"सीमा वही है जो समझ में आती है।"*

*"सीमा वही है जो समझ में आती है।"*

नक्शे में तो भारत की सीमा पाकिस्तान से जुड़ी हुई है लेकिन भारत के अंदर जितने भी जगह जगह मिनी पाकिस्तान बने हुए हैं उन सब की सीमाएं उनके हिंदुस्तान से भिड़ी हुई हैं। और मजहब की सीख के तहत वे मजहब का दायरा बढ़ाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते हैं ।

आप को यह समझना है कि उनका हिंदुस्तान आप के दरवाजे से शुरू होता है । और अगर आज नहीं है तो कल होना ही है अगर आप आज न चेते तो।

हमें सांप्रदायिक दंगों को "जमीन हड़पने के अवसर" के रूप में देखना आवश्यक है। दंगे एक साथ कई इलाकों में होते हैं, थम भी जाते हैं लेकिन किसी एक इलाके में कुछ पलायन होता है और धीरे धीरे जो बचे हैं वे भी निकल लेते हैं। वह एरिया को जिहादियों की "हरी काई" खा जाती है । अगर हम इस बात को "The Quranic Concept of War" के परिप्रेक्ष्य में समझते हैं तो समझ में आता है बाकी जगह के दंगे इस एक जगह से ध्यान और ऊर्जा बांटने के लिए किए गए हो सकते हैं ।

यहाँ यह भी समझना और स्वीकार करना आवश्यक है कि उनके द्वारा हमारा निरीक्षण होता रहता है। हमारे लिए उनका हर एरिया अभेद्य है क्योंकि हमें निरीक्षण करना सुलभ नहीं है । लेकिन सेवा क्षेत्र के अवसर अपनाकर वे हमारे क्षेत्रों का बेरोकटोक सर्वेक्षण करते रहते हैं। सब्जी का दरवाजे पर आता ठेला, डोर डिलीवरी के लिए आते लड़के, केबल कनैक्शनवाले भाईजान जिनको आप के बेडरूम तक मुक्त संचार है कनैक्शन लगाने के लिए - बाकी आप गिन लीजिये ।

उनको अंदाजा है कि कौनसा एरिया 'सॉफ्ट टार्गेट' है। बाकी महंगे एरिया में भी मेड और घरेलू नौकर बंगलादेशी ही क्यों मिलते हैं यह भी स्वतंत्र विषय है, आप भी ज़रा दिमाग लगाएँ इसपर ।

तो जो एरिया सॉफ्ट टार्गेट है। जहां प्रतिकार की क्षमता नहीं के बराबर है वहीं पर दंगे की तीव्रता पलायन करने को मजबूर करनेवाली होगी। और आप का एरिया वैसा है या नहीं यह आप को नहीं पता, लेकिन उनको बराबर पता होता है।

आक्रामक के लिए सिद्ध नियम यही है कि आक्रमण ऐसे समय करें जब प्रतिकार सब से कम हो। अगर दोपहर का समय हो जब महिलाएं ही घर पर है और वे भी ऐसी महिलाएं जो कुछ आत्मरक्षा की ट्रेनिंग लेने को मूर्खता कह देती हैं, या हंसी उड़ाकर टाल जाती हैं, तो सोचिए आप क्या करेंगे ?

ऐसों का कोई इलाज नहीं हो सकता कहकर बस पल्ला झाड़ने से काम नहीं चलेगा। एक तो जितने ये इंटरनल पाकिस्तानी बढ़ेंगे, उनकी सीमा कल आप के दरवाजे तक आनी ही है। दूसरी बात, जो भागेंगे, आप से सहारा मांगेंगे। यह बात हमेशा समझ लीजिये कि शत्रु, हत्याएँ कम करता है, दहशत ज्यादा फैलाता है। हत्याएँ जो भी करता है, 8:12  की हिदायत के अनुसार क्रूरता से करता है ताकि दहशत फैले । लेकिन संख्या इतनी नहीं होने देगा कि सरकार को सशस्त्र दल उनके एरिया में भेजने का मौका मिले । इसलिए बस पलायन होगा, आप के यहाँ जगह की किल्लत होगी, मौकों की किल्लत होगी । आप अपनों से ही लड़ बैठेंगे, और दुर्बल हो जाएँगे ।

कश्मीरियों के पलायन के बाद, जो अक्षम हैं उनकी जिंदगी बदतर है । अधिक कुछ कहना नहीं चाहता लेकिन अगर आप को उस हालात में नहीं जीना है तो यह न सोचें कि आप सेफ हैं। दोनों पाकिस्तानों से जो हिन्दू बदहवास भाग आए थे उनमें कई रईस हिन्दू भी थे जिनके दोस्त, दोस्त न रहे । आज भी वे उनसे मिलते हैं तो पुरानी यादों में खो जाते हैं लेकिन किसी को यह खयाल नहीं आता कि ये दोस्त उनकी प्रॉपर्टी बचाने नहीं आये, अधिक से अधिक मदद की तो सब छोड़कर भागने में । ये दोस्त उनके लिए रक्षा कवच नहीं बने।

कश्मीरी नेता वापस आने का आवाहन तो करते हैं क्योंकि यह महज़ औपचारिकता निभानी है, उनकी बात में लेषमात्र भी सत्यता नहीं। बस रेकॉर्ड पर दुनिया के सामने भले दिखना है । सभी जानते हैं, तीखा सवाल पूछता कोई नहीं । अधिकतर पत्तलकार तो किरांतिकारी पुण्य प्रशुन बाजपेयी की तरह फारुख अब्दुल्ला को नौटंकी करने के मौके ही मुहैया कर देते हैं ।

इसलिए आप यह सोचें कि आप को करना क्या है । जहां सीमा है वहाँ सेना होनी चाहिए । नहीं है तो सेना का निर्माण होना चाहिए।
क्योंकि, पुलिस पहुँच न पाये ऐसे ही अंदाज से दंगे करवाए जाएँगे। रास्ते अवरुद्ध किए जाएँगे। तब तक लोग बर्बाद और भयभीत हो जाएँगे। पंद्रह मिनट से आधा घंटा पुलिस का मार्ग अवरुद्ध करना बहुत आसान है और उतना समय दहशत के तांडव के लिए बहुत पर्याप्त है अगर आप विवश होकर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना और बाद में सरकार क्या कर रही है चीखना ही सही समझते हैं । बाद में कोसने से घंटानाद ही होनेवाला है यह पक्का जान लीजिये । आप का तीखापन जुबान में नहीं, कृति में लाना अनिवार्य है, अगर शांति से जीना है तो ।

हम आक्रमण नहीं करनेवाले क्योंकि यह आप से होनेवाला नहीं । लेकिन कम से कम प्रतिकार की तो सोचें । एक बात जानिए, हिंसा का प्रतिकार हिंसा से करना अवैध नहीं, यह आत्मरक्षा का अधिकार भी है । वह भी कानून का उल्लंघन किए बिना संसाधन जुटाएँ क्योंकि उससे आप की ही तकलीफ़ें बढ़ेंगी।

हाँ, हिंसा का सबूत रेकॉर्ड करना भी अब आसान है, शादी संगीत में बढ़चढ़कर विडियो लेने का हुनर यहाँ भी काम में लाइये, लेकिन हर कोई उसी में न लगे, कि मेरा वाला विडियो दूसरों से बढ़िया होना चाहिए, हाँ नी तो ! यह काम एक को सर्वानुमत से सौंपा जाये और बाकी प्रतिकार में लग जाये । ईमानदारी से लगिए क्योंकि अगर हर कोई यही सोचेगा या सोचेगी कि बाकी तो प्रतिकार कर ही रहे हैं, मैं तो मेरा वाला अलग से 'हट कर' विडियो उतारूंगी ।

पल्ला झाड़ लोग अर्थियाँ लाएँगे, राहत लाएँगे, और दाँत चियार कर फोटो खींचवाएंगे । आप उनके साथ उनकी सेल्फ़ी में जुड़ सकते हैं, उसे फेसबुक और व्हाट्सएप पर डाल सकते हैं । लेकिन उससे आप का जला हुआ घर वापस नहीं आना है । पल्ला झाड़ लोगों पर और बाकी समाज पर बोझ न बनें, इसके लिए आप के लिए आत्मरक्षा ही बेहतर उपाय है ।

सोचिए, बात करिए, बस हवाई बात न करिए, हल सोचिए । हल है । हिम्मत है तो हल भी है । 

खुद को जानिए, शत्रु को जानिए, अपने रणक्षेत्र को जानिए । जहां जहां रणक्षेत्र हैं वहाँ के रहनेवालों को सावधान कराये । हो सके तो सहायता करें । 

वे ही आप के लिए तिब्बत हैं  जिसे खाकर चीन आप के दरवाजे पर आ गया । आज तिब्बती हमारे ही लिए बोझ बने हैं । दलाई लामा इ दल्ला चीन को ही प्रशस्तिपत्र देता है । न आप तिब्बती बनें और न औरों को आप के लिए तिब्बती बनने दें । हो सके तो दीवार बनने के लिए उनकी सहायता करें । इसे सेक्यूरिटी में निवेश समझिए ।

नेहरू न बनें । और हाँ, हवलदार किशनचंदों को जितना दूर रखें उतना आप के सेहत के लिए लाभकारक रहेगा । ऐसे लोगों के पास हर समाधान के लिए समस्या तैयार रहती है। 

ब्यथित मन से,
"ठाकुर की कलम से"

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