"चुनाव दर चुनाव युद्ध"
मैं दाद देता हूँ मुस्लिमों को कि पंचायत और वार्ड चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक कोई दुविधा नहीं है। वे जानते हैं कि वे एक युद्ध लड़ रहे हैं और उनका सिर्फ एक लक्ष्य है, भाजपा और संघ की पराजय ताकि कांग्रेसी या गठबंधन की कमजोर सरकारों के बीच अपने "गजवा ए हिंद" के लक्ष्य को पूरा कर सकें।
इधर हम हिंदू दुनियाँ के पहले ऐसे चिरनिंद्रारत्त हैं जो यह सिद्ध करना चाहते हैं एक मोर्चा जीतने के बाद चार छः मोर्चे हारना जरूरी है ताकि सेनापति की अक्ल दुरुस्त रहे।
'उन लोगों' को अच्छे से पता है कि उनका सामना छत्रपति शिवाजी के बाद हिंदुओं के सर्वाधिक तीक्ष्ण मस्तिष्क से है और वह उनकी जड़ों में मट्ठा डाल रहा है।
'वे लोग' जानते हैं कि उसके कुशल नेतृत्व में भारत की सेना ढाई मोर्चे पर लड़ने के लिये तैयार की जा रहीं हैं।
'वे लोग' आंतरिक मोर्चे पर भारत की सेना को चुनौती देने के लिये सशस्त्र और प्रशिक्षित "पॉप्युलर फ्रंट" का गठन कर रहे हैं जिसके प्रतिरोध के लिये देर सवेर मिलीशिया का गठन करना होगा, लेकिन कहाँ से?
क्या दिल्ली के मुफ्तखोर बेशर्मों से जिन्हें मुफ्तखोरी में गरीबी की मजबूरी नजर आती है जिसे जस्टीफाई करने के लिये कभी "रिंकिया के पापा" को तो कभी "एमसीडी के भ्रष्टाचार" को तो कभी भाजपा सांसदों, विधायकों का अहंकार को दोष देते फिरते हैं।
उधर 'उन लोगों' को देखिये।
'वे लोग' तुमसे ज्यादा गरीब हैं लेकिन मजाल है जरा भी विचलित होते हों। उनका वोट हमेशा उसी को जाता है जो भाजपा को हराने की संभावना रखता हो। भले ही उस सीट पर भाजपा का उम्मीदवार मुस्लिम हो और विरोधी पार्टी का उम्मीदवार हिंदू हो।
क्योंकि वे आपकी तरह 'कमजोर चरित्र' के नहीं हैं। वे इस मीमांसा में नहीं पड़ते कि चुनाव पंचायत का है या राज्य का या लोकसभा का।
उनके लिये हर चुनाव 'जिहाद' है और वे इसे उसी जुनून के साथ लड़ रहे हैं।
और इधर कट्टर भाजपा समर्थक बुद्धिवीर भी व्यर्थ का बुद्धिविलास प्रदर्शित करते हुये चुनावी मैनेजमेंट सिखा रहे हैं कि लोकसभा का चुनाव कैसे लड़ा जाता है पार्षदी का कैसे?
मेरे लिये वे हिंदू ही सच्चे हिंदू हैं जो जिहाद के विरुद्ध इस युद्ध में भगवा ध्वज के नीचे अपने सेनापति के पीछे असंदिग्ध भाव से विजय के पूर्ण विश्वास के साथ खड़े हैं।
मुझे कोई लेना देना नहीं कि किस मोर्चे का नायक कौन है और प्रधान सेनापति की रणनीति क्या है। सही गलत उपनायकों की मीमांसा हम बाद में भी कर सकते हैं अभी तो हमारा लक्ष्य सिर्फ जेहादी ताकतें हैं।
दिल्ली की पराजय में भी कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि महाभारत की लड़ाई में भी तो अधर्म के पक्ष में ज्यादा लोग खड़े थे।
दिल्ली में "धर्मायनों और हाहुली रायों" की तो वैसे ही एक लंबी परंपरा रही है।
अगर लोकसभा के चुनावों से भी मुफ्त की बिजली पानी मिलने का विश्वास दिखाई दे तो ये ओवैसी को भी वोट दे दें।
दिल्ली व अन्य प्रांतों के ऐसे विचलित मस्तिष्क वाले मतदाताओं को वर्णशंकर न कहा जाये तो क्या कहा जाये?
"ठाकुर की कलम से"
Comments
Post a Comment