अध्यात्म_के_साथ_व्यायाम

#अध्यात्म_के_साथ_व्यायाम

कभी स्वामी विवेकानंद ने युवकों से आह्वान किया था कि गीता पढ़ने से बेहतर है कि फुटबॉल खेलो और कई कट्टर झट्टर भड़कीले सनातनी भड़क गये थे और आज भी भड़कते हैं बिना ये समझे कि उनके वक्तव्य के गहरे निहितार्थ क्या थे?

यहाँ दृष्टव्य है कि स्वामी विवेकानंद औसत बंगालियों की शारीरिक दुर्बलता को अक्सर इंगित किया करते थे  व चिंतित रहा करते थे और अब जबकि आम हिंदुस्तानियों की काया थुलथुल और मटकी जैसी तोंदों के रूप में बदल चुकी है, तो उनका कथन और प्रासंगिक हो उठा है। 

हमारे शंकराचार्यों, साधुओं व पुजारियों के #ब्लबर को ही देख लीजिये जो स्वयं को हिंदुओं का पथप्रदर्शक मानते हैं।  लेकिन कुछ  मूर्ख स्वामी विवेकानंद के वक्तव्य के सार को समझे बिना अपनी विद्वता दिखाने लगते हैं उन्हें अध्यात्म में स्वस्थ व कठोर मांसलता वाले शरीर का महत्व पता तक नहीं। 

चूंकि अपने आलसी स्वभाव व परिश्रम से जी चुराने की वृत्ति के कारण ये तोंदिल चरबीगोले साधु, संन्यासी,  महंत आदि व्यायाम व शरीर सौष्ठव से दूर भागते हैं अतः व्यायामादि को ये आध्यात्मिक यात्रा में रुकावट बताते हैं जबकि आर्य ऋषि दिन भर अश्वारोहण करते थकते नहीं थे और गोस्वामी तुलसीदास जी सौ से भी ऊपर की आयु में दंडबैठक लगाते थे। 

गणेशजी को छोड़कर हमारे सभी सर्वोच्च आध्यात्मिक प्रतीकपुरुषों की ओर ही ध्यान देकर देखिये....

महारुद्र शिव, विष्णु, राम, कृष्ण, हनुमान, कार्तिकेय ..

इनमें से कौनसा है जिसकी आध्यात्मिक उपलब्धियों को कोई शंकराचार्य, साधु, संन्यासी नकार दे, बल्कि ये तो उनके आराध्य ही हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व के  दैवीय पक्ष के इतर  दूसरे पक्ष से सभी मुँह मोड़ लेते हैं और वह है स्वस्थ कठोर शरीर। 

श्रीराम सुबह तीन बजकर दस मिनिट पर उठकर, नेत्र स्वच्छ कर  एक घंटा ध्यान करने के बाद निवृत्त हो व्यायामशाला में भाइयों सहित  धावन, सूर्यनमस्कार और खड्ग, धनुर्संचालन, परशु संचालन व गदायुद्ध में तीन घंटे व्यतीत करते थे। 

श्रीकृष्ण भी सुबह तीन बजकर दस मिनिट पर उठकर एक घंटा उठकर ध्यान करते थे और फिर निवृत्त होकर साढ़े चार बजे से साढ़े सात बजे तक  तीन घंटों तक अपने भाइयों, मित्रों व पुत्रों सहित  विभिन्न व्यायामों व आधुनिकतम अस्त्र शस्त्र संचालन का अभ्यास करते थे। 

भीष्म पितामह डेढ़सौ वर्ष से भी अधिक आयु में शर शैया से पूर्व प्रतिदिन तीन घंटे तक कठोर व्यायाम व शस्त्राभ्यास करते थे। 

सम्राट कृष्णदेव राय प्रतिदिन सुबह तीन पाव सरसों का तेल पीकर तबतक  मुगदर घुमाते थे, दंड लगाते थे, शस्त्राभ्यास करते थे और घुड़सवारी करते थे जब तक कि पूरा तेल पचकर स्वेद के साथ बाहर नहीं निकल जाता था। 

भारत के प्रायः सभी प्रतापी सम्राट इसी दिनचर्या का पालन करते थे और इनमें से कुछ महापुरुषों की लिखित दिनचर्याओं के प्रातःकालीन  सत्र का विवरण इसलिये दिया है ताकि आप जान सकें कि महानता के मार्ग का प्रथम द्वार स्वयं के शरीर से ही खुलता है। 

अब तो प्रश्न महानता व आध्यात्मिक विकास का भी नहीं वरन आपके सर्वाइवल का है और जियेगा बचेगा वही जो शरीर हो या मन, दोंनों दृष्टि से श्रेष्ठतम सिद्ध होगा। 

अब चुनाव आपका है. 

सुबह या शाम  जिम या अखाड़ों में बिताओ। 
तीन घंटे न सही एक घंटा व्यायाम करो। 
गुरुद्वारों से कृपाण या खांडा खरीदकर दीवारों को सजाओ। 

अब या तो शारीरिक व  मानसिक रूप से स्वयं को फिट बना लो या कलमा पढने की तैयारी कर लो।

"ठाकुर की कलम से"

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