*"दंगाईयों, जेहादियों द्वारा अराजकता, खूनखराबा का अंतिम हल"*
दिल्ली सहित देश भर में चल रही अराजकता को लेकर मेरा दृष्टिकोण बिलकुल अलग है,
मोदी और शाह मंजे हुए राजनीतिज्ञ हैं इन परिस्थितियों से हमारी कल्पनाओं से भी कहीं अच्छे से निपट भी सकते हैं लेकिन नहीं निपट रहे,
उन्हें मालूम है कि अंततः इस विकराल समस्या का अंत सुरक्षा बलों और सेना को ही करना होगा,
हिंदु समाज इतना सुविधाभोगी और आरामतलबी हो चुका है कि भविष्य का संघर्ष उसके बस की बात ही नहीं है...
जब भी ये अंतिम संघर्ष शुरू होगा सामान्य हिन्दू इसे अपनी छत पर चढ़कर देखने के अलावा कुछ नहीं करेगा।
अगर कुछ कर पायेगा तो सिर्फ लोहे के मोटे मोटे दरवाज़े लगाकर अपने परिवार को कुछ समय के लिए सेफ करने के अलावा कुछ नही कर पाएगा।
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मेरा मानना है मोदी और शाह चाहते हैं कि जब अंतिम संघर्ष हो तब आपके मन से भाई चारे का सारा नशा उतर चुका हो। परेशानियां उस चरम बिंदु तक पहुँच जाए, जिसके बाद आपको और हमें सिर्फ और सिर्फ आसन्न मृत्यु ही दिखाई दे।
मानो ना मानो आपमें और उनमें एक मूलभूत अंतर ये है कि जहाँ आपके त्यौहार,सांस्कृतिक, धार्मिक कार्यक्रम उल्लास देने वाले और बोरियत दूर करने वाले होते है वहीं उनका हर त्यौहार भीषण जंग की ट्रेनिंग देता हुआ प्रतीत होता है। चाहे मुख्य त्यौहार पर अपने/छोटे बच्चों के हाथों से बकरा या गाय जिबह करना हो, एक महीने में लगातार बारह घंटे थूक तक ना निगलते हुए सारे काम उसी मुस्तैदी और ताकत से करते जाना हो या अपने हाथों से अपने ऊपर कोड़े बरसाते हुए अपनी खाल तक खींच लेना हो आपको क्या लगता है ये सारे कार्यक्रम किसी कमांडों ट्रेनिंग से कम होते हैं।
नहीं होते उनका एक एक शख्स एक मुजाहिद है एक कमांडों है।
मोदी और शाह चाहते हैं कि आप उनका पूरा प्रचंड रूप ढंग से देख लो उनकी हरकतों से आपके दिल से मानवता,संस्कार और दयाधर्म का मूल जैसी बातें पूरी तरह ज़मींदोज़ हो जायें और दया धर्म के नाम पर आप सुरक्षा बालों के क्रूर इलाज़ में कहीं रोड़ा ना बन पायें..
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हिन्दू समाज का मैंने बहुत बारीकी से अध्ययन किया है ये हमेशा समस्याओं से पलायन करना पसंद करता है अपनों को आँखें दिखाता है लेकिन अमन-परस्त समाज से संघर्ष से बचना चाहता है।
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ये समाज तभी चेतता है जब समस्या की अंतिम सीमा आ जाती है और उसी का इंतज़ार मोदी, शाह कर रहे हैं।
और सच कहूँ तो मैं भी.......
"ठाकुर की कलम से"
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