"हम अपने सनातन संस्कृति से भटके और अपनाया पश्चिमी संस्कृति के रेप, बलात्कार और राक्षसी प्रवृत्ति को"
"हम अपने सनातन मार्ग से भटके और अपनाया रेप, बलात्कार और राक्षसी प्रवृत्ति को"
किसी भी सामाजिक कुरीति को कम करने के लिये, हम क्या कर सकते है ?
एक दिन, मेरे एक मित्र ने एक घटना बताई, जो उनके साथ घटी थी, मेरे वो मित्र काफी समय से कथा श्रवण, भजन कर रहे थे, राधे राधे बोलना, हरे राम, हरे कृष्णा संकीर्तन करना, गुनगुनाना उनकी आदत बन गयी है।
उन्होंने बताया कि वो किसी रिस्तेदार के यहाँ गए थे, जिस परिवार में वो रुके थे, वहाँ एक 5-6 साल की एक बच्ची मिली, तो मेरे मित्र ने अपने स्वभाव के कारण उस बच्ची के साथ भी हरे राम, हरे कृष्णा संकीर्तन किया, राधे राधे बोला।
चूंकि उस परिवार के लोग अपने आप को आधुनिक मानते थे।
तो जब मेरे मित्र ने उस बच्ची के साथ राधे राधे किया, नाम संकीर्तन किया तो उस बच्ची के पापा आये और मेरे मित्र पर बहुत गुस्सा हुए, खूब खरी खोटी सुनाई, खबरदार जो मेरी बच्ची को ये सब बेकार की बाते सिखाई तो, ये सब बकवास है, पाखंड है,आदि बहुत कुछ।
मेरे मित्र ने मुझसे बात करते समय बताया कि,
भईया, जब उस बच्ची के पिता इस तरह गुस्से में चिल्ला रहे थे मेरे ऊपर, तो
शुरुआत में, मुझे बहुत खराब लगा, मैंने थोड़ी कोशिश करी उनको समझाने की,
परन्तु, तभी मुझे आपकी वो बात याद आ गयी, जो बात आप ने मुझे, एक दिन, अध्यात्म चर्चा करते हुए, प्रेम अश्रु सहित बताई थी कि
जब इंसान बहुत गुस्से में हो , हमारे सही कार्य की भी निंदा करे, अपमान करे, भजन भगवान की निंदा करे तो उस समय उसे कोई जवाब मत देना, कोई बहस मत करना, वहाँ से हट जाना
अपनी बात, अपना विचार रखना भी हो तो तब रखना जब उसका गुस्सा उतर जाय , गुस्साए हुए इंसान से बहस करना , आग में घी लकड़ी डालना ही है
मित्र मुझसे बोला -- भईया , आप की बात याद आते ही, मैं खामोश हो गया, फिर कोई बहस नही की
भईया, बाद में मुझे उस इंसान की सोच पर बहुत रोना सा आ रहा था, और कान्हा से मैंने दुआ भी करी उस बच्ची के लिए भी
अपने मित्र की बात सुन कर, मेरी आँखों मे खुशी के आँसू थे, उसी भाव दशा में मेरे मुँह से निकल गया कि
अब तुम्हारा भजन पकने लगा है,
उस दिन तुमने जो किया, हल्का गुस्सा आने पर भी बहस नही करी, वहाँ से हट गए, बाद में उनके लिये दुआ करी तो
तुमने इस दुनिया मे होने वाले , एक बच्ची के रेप को टाल दिया, एक बच्ची को रेप से बचा लिया
भाव दशा में बोली गयी, मेरी ये बात सुन कर, मेरा मित्र थोड़ा चौक गया
मित्र बोला -- भईया, आपकी बात समझ नही आई मुझे ,,,,, इस घटना का किसी बच्ची के रेप से क्या सम्बन्ध है ??
मैं उसी भाव दशा में ही बोलता चला गया कि
इस दुनिया की तरह तुम्हे भी यही लगता है कि रेप, बलात्कार का एक मात्र कारण -- वासना है
परन्तु ये पूर्ण सत्य नही है, रेप का कारण, खासकर किसी बच्ची के साथ हुए रेप का 100% कारण - सिर्फ वासना नही है
हर विकार की एक पावर होती है
सिर्फ वासना में इतनी ताकत ही नही है कि वो किसी मासूम बच्ची की जिंदगी बर्बाद कर सके
किसी इंसान पर, वासना का अटैक बहुत तेज हो जाय,
तो फिर वो इंसान पैसे का, बुद्धि का, मीठी बातों का प्रयोग करेगा किसी लड़की औरत को बहलाने का, फुसलाने का, खरीदने का, ,,, फिर भी कोई सरीर न मिल पाये तो खुद के सरीर से ही अपनी वासना शांत कर लेगा, परन्तु रेप नही कर सकता है
रेप, खासकर किसी बच्ची के रेप में --
वासना 30-40% से ज्यादा रोल अदा नही करती है,
60-70 % रोल अदा करता है -- क्रोध, और क्रोध के अन्य रूप
गुस्सा, नाराजगी, नफरत, खीज लोगो से जीवन से
जो भी लोग किसी बच्ची के साथ रेप करते है, वो व्यक्ति बहुत विछिप्त हो चुका होता है, लोगो के ताने, तिरिस्कार झेल झेल कर,,,,, उसका भरोसा इंसानियत पर, ईस्वर पर बहुत नगण्य हो चुका है,
जब कभी अकेले में, सुनसान जगह पर, हमारे ऊपर कोई विकार हावी होता है तो उस समय, हमारे अंदर की इंसानियत, ईस्वर पर भरोसा, ही हमे बचा पाती है कोई कुकर्म करने से,
ऐसी जगह पर कोई पुलिस, सरकार, कोई कुछ नही कर सकता है,
जेल अदालत मृत्यु दण्ड का भय भी सिर्फ उसी व्यक्ति को उस समय रोक पायेगा, जिसके अंदर जीवन जीने की थोड़ी भी चाह बाकी हो
बहुत ज्यादा तिरिस्कार, बहुत ज्यादा जीवन से, लोगो से, ईस्वर से शिकायत, गुस्सा नफरत , इंसान को भावना शून्य कर देता है
मैं उसी भाव दशा में अपने मित्र को बोला कि
तुमने उस घटना में, उस व्यक्ति से बहस नही करी तो उसका गुस्सा तुम पर उतर कर खत्म हो गया
यदि तुम समझाते, बहस करते तो उनका गुस्सा भी कई गुना बढ़ जाता और तुम्हारे अंदर भी गुस्सा बढ़ जाता
फिर तुम दोनों लोग, ये गुस्सा किसी और पर उतारते, वो लोग , और अधिक लोगो पर , और ऐसे करते करते गुस्से की कई चैन श्रंखला बनती बनती उस इंसान तक पहुँच जाती जो इंसान रेप करने की कगार पर है
उस व्यक्ति ने भी कही और का गुस्सा तुम पर निकाला था
तुमने उस व्यक्ति से बहस नही करी, उसके गुस्से की आग में घी और लकड़ी नही डाली तो वो गुस्सा वही समाप्त हो गया
बहस न करके, भगवान का नाम गुनगुनाकर, बाद में उसके लिये दुवा करके , तुमने एक बहुत बड़ी गुस्से की चैन श्रंखला को वही पर तोड़ दिया , इस अस्तित्व में, आकाश में क्रोध बढ़ने से बचाया
यदि हम इस तरह लोगो से बहस न करे, क्रोध नफरत द्वेष न बढ़ाये, जहाँ तक सम्भव हो हरि नाम गुनगुनाये , मुस्कुराहट बांटे , प्रेम व्यवहार बढ़ाये तो
ये प्रेम , मुस्कुराहट, इंसानियत , दया ,ईस्वर प्रेम, जीवन से प्रेम भी एक दूसरे से ट्रान्सफर होते होते उस लोगो तक पहुँच जाएगा जो लोग भयंकर गुस्से में रेप करने की कगार पर खड़े है,,,,
सिर्फ लोगो पर, पुलिस, सरकार पर आरोप लगाने से कुछ नही होता है, बल्कि ये सब करके हम इस दुनिया मे निकृष्ठ क्रोध ही बढ़ा रहे है
किसी भी सामाजिक कुरीति पर हम लोग सिर्फ चिल्लाते है, फेसबुक व्हाट्सएप आदि में लोगो पर सिर्फ दोषारोपण करते है-- रेप, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज , भ्रष्टाचार सब बढ़ रहा है, पुलिस सरकार कुछ नही कर रही है, इसको ऐसा करना चाहिये, उसको ऐसा करना चाहिए
ऐसा करके हम अपना पल्ला झाड़ लेते है, हमारे करने लायक क्या है ?? ये देख ही नही पाते 😭😭😭
इस दुनिया का सबसे आसान कार्य -- दुसरो पर आरोप लगाना
मुश्किल कार्य -- खुद को सुधारना, भजन गुनगुना कर मौन रहना, बहस न करना
Comments
Post a Comment