"भूमिहारों का ब्राह्मणत्व से बढ़ती दूरी"

"भूमिहारों का ब्राह्मणत्व से बढ़ती दूरी"

हथुआ, बेतिया, काशी, टिकारी, अमावां, और तमकुही आदि अनेक भूमिहार ब्राह्मणों  के राज्यारोहण के बाद सम्पूर्ण भूमिहार समाज शिक्षा, शक्ति, और रूआब के उच्च शिखर पर पहुँच गया था
चारों ओर हमारे दबदबे की दहशत सी फैली हई थी
लोग भूमिहारों का नाम भय मिश्रित अदब से लिया करते थे
सर्वाधिकार प्राप्ति और वर्चस्व के लिए भूमिहार शब्द ही काफी था।

धीरे धीरे हमने विवेकशून्यता का प्रदर्शन करना शुरू किया।
फिर भूमिहार शब्द के साथ तमाम नकारात्मक विशेषण जुड़ने लगे।
हमने भूमिहार शब्द के चाबुक का प्रयोग हर उचित-अनुचित जगह करना प्रारम्भ किया।
भूमिहार शब्द का नशा हमारे दिलो-दिमाग को इतना विषाक्त कर दिया कि हमारे पैर जमीन पर नही टिकते थे।
हरेक भूमिहार चाहे वह साधारण कर्जदार खेतिहर रैयत ही क्यों न हो, वह इन रियासतों के मालिक से अपने आप को कमतर नहीं आंकने लगा।
खेत में भले ही वह मगधनरेश रूपी रैयत अपने मजदूर के साथ कंधा से कंधा मिलाकर धान-गेहूं की कटाई करे पर क्या मजाल कि गली से गुजरते वक्त वह मजदूर गली में खटिया निकालकर सामने बैठे रहने की जुर्रत कर ले।

हाल यह हुआ कि हम अब ब्राह्मणों से अलग अपनी एक जाति समझने लगे।
हमारे उम्र के लोगों को याद होगा कि जब बचपन में शादी के लिए अगुआ आता था तो हमें घर के लोग बताते थे कि अगुआ पूछेगा कि “बबुआ आप कौन जात के है?” तो बताना कि “हम भूमिहार ब्राह्मण हैं”।

लेकिन आज हम अपने को ब्राह्मण या भूमिहार ब्राह्मण कहने में अपनी तौहीन और सिर्फ भूमिहार कहने में अपनी शान समझते हैं।

अब तो हाल यह है कि “न खुदा ही मिला न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे”।

"भूमिहारों की वर्तमान स्थिति"

अब तो हम खालिस भूमिहार जाति के हो गए और ब्राह्मणों ने हमसे दूरी बना ली।

अब जब हमारे युवा स्वयं अपनी जड़ और अपना इतिहास पूरी तरह भूल गए हैं तो अन्य जातियां उनपर फब्तियां कसती हैं और पूछती हैं कि भूमिहार कौन सी जात है? न ब्राह्मण, न राजपूत, न वैश्य और न शुद्र!!! तुम तो ‘Mixed Breed’ (मिश्रित जाति) के हो,
तुम्हारा अपना कोई इतिहास नहीं है, आदि-आदि।

जब हम अपना इतिहास ही नहीं जानते तो उन्हें जवाब क्या देंगे? हम बगलें झाँकने लगते हैं और फेसबुक पर पूछते हैं कि हमारा इतिहास क्या है?

“वो परिंदा जिसे परवाज से फुर्सत ही न थी; आज तनहा है तो दीवार पर आ बैठा है।” 

यह किसकी गलती है? किसने हमें दम्भ में चूर होकर अपने को ब्राह्मण से अलग होने के लिए कहा? हमारे पूर्वज ब्राह्मणों ने तो हमे मदारपुर सम्मेलन से ही अपना माना था
कान्यकुब्ज हों या सरयूपारी दोनों ने ही सदा हमें अपना कहा
लेकिन हमें तो टिकारी, बेतिया और काशी नरेश बनना था
अयाचक्त्व के नशे में हमने अपने आप को अपने आधार से नीचे गिराकर अंतहीन अंधकूप में डाल दिया।

शिक्षा और उन्नति की हर विधा को तिलांजलि देकर हमने मगध नरेश बनने का सपना देखा
‘Firsr deserve then desire’ अर्थात ‘पहले काबलियत हासिल करो तब ख्वाब देखो’ के मूल मंत्र को भूमिहार के रोब में कोई स्थान नहीं दिया और नतीजा है कि आज हम अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मार बैठे हैं।

हम क्या थे और क्या हो गए
आज हमें दूसरों से नहीं अपनों से ही डर सता रहा है।

“मेरा अज्म इतना बुलंद है, कि पराये शोलों का डर नहीं; मुझे खौफ आतिशे-गुल से है, कहीं ये चमन को जला न दे”।

आज हम कठिन परिश्रम से जी चुराते हैं और सब कुछ बिना प्रयास के अपनी थाली में पाना चाहते हैं।
“We want everything on a Platter” हाँ, यह बात ठीक है कि आज के ‘Welfare State System’ अर्थात कल्याणकारी राज्य व्यवस्था में आरक्षण आदि बहुत से प्रावधान हमारे समाज की उन्नति में बाधक हैं लेकिन सरकारी प्रतियोगिताजन्य नौकरियों के अलावे अभी भी Private Sector में अपार संभावनाएं हैं जहां योग्यता की पूछ, इज्जत और जरुरत है और अपनी क़ाबलियत दिखाने के असंख्य अवसर
कौन रोकता है हमें।

“सितारों के आगे जहां और भी है”।

"पुनरोद्धार के उपाय"

अंग्रेजी में एक कहावत है –“It is never too late” किसी भी अच्छे काम की शुरुआत के लिए कभी देर नही होती।

हमने अपने आप को गहरे जख्म अवश्य दिये हैं लेकिन मर्ज ला-ईलाज नहीं हुआ है
हाँ, इसके लिए बहुत बड़े पैमाने पर और हरेक स्तर पर सामूहिक और दृढ़ निश्चयी प्रयास की आवश्यकता है।

मेरे विचार से निम्नलिखित उपाय कारगर साबित हो सकते हैं:-

1. शीघ्रातिशीघ्र हम अपने बच्चों के स्कूल रिकॉर्ड में जाति के स्थान में ‘भूमिहार ब्राह्मण' लिखना शुरू कर दें।

2. सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर सरकार पर प्रभाव डालें कि जनगणना आदि सभी अभिलेखों में हमारी जाति ‘भूमिहार ब्राह्मण' ही अंकित हो।

3. केन्द्रीय और प्रांतीय सभी अभिलेखों से भूमिहार शब्द हटाकर भूमिहार ब्राह्मण ही लिखा और माना जाय।

4. आवश्यकता पड़ने पर सर्वदलीय सांसद - विधायक-जनता समिति बनाकर जातीय एकता का प्रदर्शन करते हुए संविधान संशोधन कर इसे सुनिश्चित कराना चाहिए।

5. सामान्यतया भूमिहार ब्राह्मणों का बौद्धिक स्तर काफी ऊँचा है लेकिन समुचित सामाजिक विकास के लिए शिक्षा के स्तर को सुधारना आवश्यक है।

मैं अंग्रेजी का अंध समर्थक नहीं हूँ लेकिन मेरा ७० वर्षों का अनुभव बताता है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में “अंग्रेजी दा जवाब नहीं”!!! आज हमारे युवक अंग्रेजी सीखने के डर से हिंदी का गुणगान करते हैं।
अंग्रेजी सीखकर अगर हिंदी का गुणगान करते तो कुछ और बात होती।

6. साधनहीन मेधावी बच्चों के शैक्षणिक विकास के लिए ग्राम, प्रखंड, जिला और राज्य स्तर पर उचित एवं समर्पित वित्तीय संगठन की आवश्यकता है।
अधिवेशनों में यह प्रस्ताव तो आ जाता है लेकिन उसपर Follow Up या बाद में प्रगति कार्य नहीं किया जाता है।
यह सुनिश्चित होना चाहिए
इसके बिना प्रस्ताव किसी काम का नहीं।

7. विडंबना यह है कि समाज में जिसके पास धन है वे कुछ कर नहीं सकते और जो कुछ कर सकते हैं उनके पास धन नहीं है।
अगर कुछ करना है तो दोनों के बीच सामंजस्य बैठाने की सख्त जरूरत है।

8. अभी तक हमारे समाज में ‘एक म्यान में दो तलवार’ नहीं रहने की संभावना व्याप्त है।

सामाजिक सद्भाव और सहिष्णुता के समावेश से इसे बदला जा सकता है।

9. स्वजातीय एकता और सुरक्षा को ध्यान में रखकर कुछ संगठन बने तो सही लेकिन अंततः व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना ने इसे तार्किक परिणिति तक पहुंचने से रोक दिया।
इस पर पुनर्विचार की जरूरत है।

10. एक ऐसी स्थायी कार्यकारिणी समिति बने जिसमें ग्रामीण, शिक्षित और दबंग आदि समाज के हर स्तर के लोग हों, ताकि लिए गए निर्णयों को सुचारू रूप से कार्यान्वित किया जा सके तथा इनकी उर्जा को भी सकारात्मक दिशा में प्रयोग किया जा सके और इन्हें महसूस हो कि सामाजिक उत्थान में इनकी भी नितांत आवश्यकता है।

11. आंतरिक द्वेष, ईर्ष्या और कलह ने हमारे विकास के धार को कुंद कर दिया है, इसे आपसी सौहार्द्र और सामंजस्य से ठीक किया जा सकता है।

12. हमें भूमिहार ब्राह्मण की एक ऐसी Close Group Web Site बनानी चाहिए जिसपर समाज के सक्षम लोग जो नौकरियां दे सकते हैं अपनी Vacancy का विज्ञापन दें जिससे सिर्फ स्वजातीय ही आवेदन कर सकें।

हाँ, योग्यता के सवाल पर कोई ढील नहीं दी जाय ताकि उनकी गुणवत्ता कायम रहे।
लोगों में यह धारणा बनी रहे कि ‘अगर भूमिहार ब्राह्मण है तो काबिल ही होगा’
इससे कम से कम योग्य स्वजातीय युवकों को उचित नौकरी मिल सकेगी जो अन्यथा Corporate Sector के विज्ञापन से अनभिज्ञ रह जाते हैं।

उपसंहार

हरेक इतिहासकार ने माना है कि भूमिहार ब्राह्मण अर्थात अयाचक ब्राह्मण एक ऐसी सवर्ण जाति है।

जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। 

प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगों को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया, उसके बाद सारस्वत, महियल, सरयूपारी, मैथिल ,चितपावन, कन्नड़ और केरल के नम्बूदरी आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगों से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए
मगध के ब्राह्मणों और मिथिलांचल के पश्चिमा तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार ब्राह्मणों में ही सम्मिलित होते गए।
‘इस तरह लोग मिलते गए और कारवां बनता गया’।

इस जाति ने सत्ययुग से लेकर कलियुग तक किसी न किसी रूप में अपना स्तित्व और प्रभाव अक्षुण्ण रखा।

अभी तक पचासों अखिल भारतीय भूमिहार सम्मलेन या भूमिहार महासभा या अखिल भारतीय त्यागी महासभा स्थापित कर और चितपावन, नम्बूदरी आदि ब्राह्मणों को इसका सभापतित्व देकर अयाचक ब्राह्मणों की एकता का परिचय दिया है।

हालांकि महासभाओं में लिए गए निर्णयों/प्रस्तावों पर बाद में अग्रेत्तर करवाई या अमल नहीं किया गया।

समृधि और सम्पन्नता के सुनहरे समय में गुमराही के दौर से गुजरने के बाद भी सुबह का भूला शाम को घर आने की क्षमता रखने वाली इस जाति के लिए अभी भी खोई प्रतिष्ठा प्राप्त करने की उम्मीद शेष है।

इसमें सर्वाधिक आवश्यक है कठिन परिश्रम और मजबूत इरादे से जीवन के हर क्षेत्र में महारत हासिल करने की।

सत्ययुग से ही अध्ययन या शिक्षा हमारी रक्तनलिका में प्रवाहित होती रही है।

पूर्वजन्म के संस्कार और प्रारब्ध फलानुसार अल्प प्रयास से ही हम उसे वापिस प्राप्त कर सकते हैं।

हमारे पास मानसिक शक्ति, बुद्धि, तर्क-शक्ति, दुर्धर्ष साहस और उछलकर वापस आने का अद्भुत कौशल है।

जरूरत है इसे अपने व्यवहार में लाकर अपनी सफलता में परिवर्तित करने की।

हम अपनी क्षमता से सदैव आशान्वित रहते हैं, जरूरत है एकजुटता की, हमें अपने समाज को एकजुट रखकर निरंतर आगे बढना चाहिए।

"ठाकुर की कलम से"

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