संघ के विचारकों की देशभक्ति-धर्मभक्ति पर संदेह करना एकदम मूर्खता ही होगी।

संघ के जो टॉप के 15-20 विचारक हैं उनकी देशभक्ति-धर्मभक्ति पर संदेह करना एकदम मूर्खता ही होगी। 70 सालों से ये राष्ट्र के लिए हर तरह का वलिदान करते आये हैं और आज भी पीछे नहीं हटते साथ में ऐसे ही कार्यकर्ताओं की फौज भी खड़ी करने में सतत लगे रहते हैं। धर्म परिवर्तन के लिए हजार मककारीपूर्ण षड्यंत्र रचने के बाद भी मुठल्ले और मिशनरीज इस फौज के निश्छल और निस्वार्थ सेवाभाव के सामने बौने पड़ जाते हैं। यही संघी लोग इन राष्ट्रविरोधी अराजक तत्वों के सामने सबसे बड़े दुश्मन सावित हुए हैं जो अपनी जान के खतरे को भांप लेने के वाबजूद अपने कदम पीछे नहीं खींचते भले ही जान गँवा बैठें। 

इनके बिना किसी स्वार्थ सेवाभाव की वजह से जनता में इन लोगों को धीरे-2 भयानक समर्थन मिलने लगा और देश की गद्दी को अपनी बपौती समझने वालों की चूलें हिल गईं। हालत ये है कि राहुल गाँधी कभी आतंकियों के खिलाफ नहीं बोलता पर संघ के खिलाफ जहर उगलने में उसको महारथ हासिल है। यहां तक कि संघ को डिफेम करने का केस कोर्ट पहुँचा और पप्पू गाँधी को अदालत में झूँठ भी बोलना पड़ा साथ में माफी भी माँगनी पड़ी। उनकी सरकारों में तो ऐसे केस कोर्ट तक पहुंचते ही नहीं थे क्योंकि उसका अंजाम संघ को पता था। आतंकियों के सहारे देशभर में डर फैलाकर सत्ता पर कब्जा किये बैठे इन डकैतों से  सीधी टक्कर ली है तो संघियों ने वो भी उनके द्वारा पालित नक्सल, माओ, नागा, उल्फा, और ऐसे ही अनेकों नाम से आतंक फैलाने वाले कांग्रेसी स्लीपर सेल की गोलीं-बम के सामने अपनी छाती अड़ाकर ...

वो जो टॉप के 15-20 लोग छँटकर वहां पहुंचते हैं वो हर वक्त सिर्फ राष्ट्र और धर्म के लिए मर मिटने को तैयार रहते हैं। कुछ भी कर गुजरने में लगे रहते हैं। उनका बस चले तो इन आतंक के सफेदपोश सरगनाओं की मुण्डी उखाड़ लें पर सम्बिधान से बंधे हैं इसलिए संविधान सम्मत रास्ता खोजने में सतत लगे रहते हैं। वस्तुतः संघ इसीलिए इन दरिंदों के आंख की किरकिरी है। संघ सिर्फ सत्ता परिवर्तन के लिए कार्यरत नहीं है बल्कि आतंक के सहारे कब्जा किये बैठे बादशाहों और उनके दरबारियों की जड़ें ही खोद रहा है। पूरा नेक्सस ही ध्वस्त करने में दिन रात लगा है।

ऐसे में संघ पर किसी भी तरह का अविस्वास करने का कोई कारण नहीं बनता सिवाय हमारी कट्टर झट्टर मानसिकता के पल्लवित-पोषित न होने के और इसी मानसिकता का फायदा उठाया है उन लोगों ने। संघ हमारी सोंच को ठेस पहुंचाए बगैर अपना काम करना चाहता है परन्तु फिर भी कभी-2 नासमझी में हम अपनी भावनाओं में बहकर उड़ता तीर ले चिचिया ही पड़ते हैं, आदत से मजबूर हैं। हममें आपस में इतने तरह की खाई खोदी जा चुकी है कि एक बयान हम लोगों में आपस में युद्ध सुरु करवा देने में सक्षम है। हम निज स्वार्थ और निज जाति स्वार्थ में इस हद तक अंधे हैं कि अपने ही खून की बलि ले लेने पर उतारू रहते हैं। याद करो वो भागवत जी का आरक्षण की समीक्षा वाला बयान, जीता हुआ बिहार ही दाऊ को हरा दिया। एक कम्युनिटी खुश तो दूसरी कम्युनिटी नाराज। पूरे देश में दाऊ को एक तबके का विरोधी होने का षड्यंत्र रचा जा रहा था तब। रोज गुजरात से जानबूझ कर दाऊ के हरिजन विरोधी होने की खबर प्लांट की जाती थी वो भी चुनाव जीतने के लिए हायर की गई एजेंसी के प्लान से। सिर्फ स्वार्थ में अंधे होकर हम सब लाठी चला रहे थे पर सच्चाई ये थी कि हम सब षड्यंत्रकारी हरामियों की उँगली के इशारे पर नाच रहे थे। दाऊ को इन हरामियों की अभेद्य दीवार बाबा साहब को छीनने के लिए पता नहीं कितनी मेहनत करनी पड़ी और हमारे ताने भी सहने पड़े। 

भागवत जी का वो आरक्षण वाला बयान जब उल्टा पड़ गया तब से संघ को पता चल गया कि हमारे लोग कितने भी शिक्षित हो जाँय पर राजनैतिक रण में बिल्कुल ही गधे हैं और इसीलिए 70 साल से इन नासमझी का परिणाम भुगत रहे हैं। ऐसा ही दूसरा मुद्दा अभी BHU में डॉ फिरोज का सामने आया था। संघ की प्लांनिग की वजह से वो मोहरा सेट किया गया था। पर हम अड़े थे कि पहले फिरोज धर्म-परिवर्तन करे जबकि संघ एक ऐसे बंदे को वहाँ खड़ा कर रहा था जो घर वापसी के लिए मिशाल बन जाता और वो दांव चूकता तो जो आज हुआ है वो तब भी होता परन्तु हम अपनी कट्टर मानसिकता से ऊपर नहीं उठ पाए। डॉ फिरोज सिर्फ संस्कृत पढ़ाने या रोजी कमाने के लिए घर वापसी क्यों करेगा? कल उसका मांन-सम्मान उसके परिवार का सम्मान नहीं हुआ तो फिर जग हंसाई कराएगा क्या? ऊपर से उंस पर आज ही गुप्त फतवा लग जाता और परिवार सहित मार दिया जाता। षड्यंत्र से तो कमलेश तिवारी भी नहीं बचा। जान भी बचानी है उन लोगों की, इधर आने के बाद सामाजिक विसंगतियों में बैलेंस भी बनाना है और सबसे बड़ी बात कि हद कट्टर पण्डों के प्रकोप से भी बचाना है। बहुत चुनौतियां थीं डॉ फिरोज को घर वापसी करा कर पद देने में बल्कि ये ज्यादा आसान रहता कि यहाँ कुछ समय कार्यरत रहकर दक्षता हांसिल करते फिर उनको AMU में प्लांट कर दिया जाता जहां हजारों फिरोज हमारी संस्कृति को नजदीक से देख पाते और उनके अंदर भरे गए जहर का इलाज हो पाता। पर मैं खुद भी इस मुद्दे पर बहुत बवाल करता रहा। हालांकि इसको हाइप देनी थी पर विरोध में दे बैठा। खैर आगे से विचार रहेगा कि संघ यदि कोई स्कीम लाता है तो स्वार्थ और कट्टरता से ऊपर उठकर ऐसे में सहायक की भूमिका निभा सकूँ, उन लोगों को अब मैं देशभक्ति या धर्म सिखाऊँ, अभी इतना भी ज्ञानी नहीं हुआ। आज से संघ को मेरा समर्पण 🙏🙏 क्योंकि वो लोग कुछ करने में लगे हैं परिणाम जो होगा देखा जाएगा परन्तु हम सिर्फ मुँह चलाने में लगे हैं जिसका परिणाम 70 साल से भुगत ही रहे हैं ...

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