#हिंदू_राष्ट्रवाद_बनाम_पैनइस्लामिज्म
दुनियाँ का इतिहास गवाह है कि जो कौमें इतिहास से सबक नहीं सीखतीं वे इतिहास में दफन हो जाती हैं और दुर्भाग्य से इस सबक को सीखने में भारतीयों का रिकॉर्ड बहुत खराब है।
भारत में एक वर्ग हमेशा से ऐसा रहा है जो झूठे आदर्श और बड़े बड़े शब्दों के माध्यम से 'सत्य और धर्म' की राह में काँटे बिछाता आ रहा है।
इनकी पहचान ये है कि यह हमेशा 'राष्ट्र और धर्म' को पुनर्परिभाषित करने की कोशिश कर जनसामान्य को भ्रमित कर राष्ट्र के लिये गुलामी का रास्ता तैयार करते रहे हैं और वो भी अन्तराष्ट्रीयतावाद और मानवतावाद जैसे भारी भरकम शब्दों के माध्यम से ताकि जनसामान्य का सहज राष्ट्रबोध 'अपराधबोध' बन जाये।
इनके कुकृत्यों की लिस्ट यों तो बहुत बड़ी है परंतु इतिहास से कुछ उदाहरण पर्याप्त हैं--
1- ई.पू. 185 से 160 के बीच बौद्ध मठाधीशों को राष्ट्र के धन को दान देने पर रोक लगा दी गई तो इन देशद्रोहियों ने यूनानियों विशेषतः मिनांडर को आक्रमण हेतु आमंत्रित किया और इसे 'अन्तराष्ट्रीयतावाद' कहा और भारतीय राष्ट्रवाद के प्रतीकपुरुष पुष्यमित्र को 'बौद्धद्रोही ब्राह्मण नेता' कहकर बदनाम करने का प्रयास किया।
2- 455 ई. में बौद्धों ने गुप्त साम्राज्य के अंतर्गत भारत में उभरते हिंदू धर्म से चिढ़कर अन्तराष्ट्रीयतावाद के नाम पर हूणों को उकसाया जिनके आक्रमण के कारण भारत को बहुत हानि उठानी पड़ी। बौद्धों को भी अपनी करनी का फल मिला और उन्हें अपने द्वेष की बहुत भारी कीमत अपने कटे सिरों से चुकानी पड़ी।
3- बौद्ध मठाधीशों ने अपने स्वार्थों व विद्वेष के कारण देशद्रोह करते हुये 711 ई में सिंध के राजा दाहिरसेन के विरुद्ध अरबों का साथ इसी 'अन्तरराष्ट्रीयतावाद' के नाम पर दिया और फिर सहस्त्रों हिंदू स्त्रियों के शील हरण व पुरुषों बच्चों की हत्याओं के बाद चुपचाप अपना खतना भी करा लिया।
4- सत्य अहिंसा और मानवता के इन तथाकथित पुजारियों ने बिहार बंगाल में एक पूरी कौम को नपुंसक बनाकर रख दिया और मानवता के नाम पर उस नरपिशाच बख्तियार खिलजी का चिकित्सा व आवभगत की जिसने बीस हजार विद्यार्थियों के सिर नालंदा में काटकर बिछा दिये और सहस्त्राब्दियों से संचित ज्ञानराशि जलाकर राख कर दी गई।
5- सत्य और अहिंसा का एक तथाकथित पुजारी फिर बीसवीं शताब्दी में अवतरित हुआ जिसकी अहिंसा की कीमत लाखों हिंदुओं को अपने रक्त से, स्त्रियों को अपने शील से और राष्ट्र को अपने एक विशाल भूखंड से चुकानी पड़ी।
6- स्वातंत्र्योत्तरकाल में दुर्भाग्य से बुद्धिजीवी वर्ग में फिर से वही कालनेमि आ बैठे जिनकी पैट्रो डॉलर्स में खरीदी गई कपटपूर्ण जिव्हा से अंतराष्ट्रीयतावाद, मानवतावाद और समानता जैसे भारी भरकम शब्द झड़ते रहे और उनके पीछे झुंड के झुंड मुस्लिम भारत के शरीर में रोगाणु संक्रमण की भांति घुसते रहे।
यह 'पाखंडी भारतद्रोही वर्ग' आजकल 'लिबरल्स' कहलाते हैं।
आज जबकि हिंदू प्राचीन युग के तक्षशिला के विद्यार्थियों की भांति उठ खड़े हुये हैं और उनका राजनैतिक नेतृत्व सम्राट मिहिरभोज की भांति भारत में इस 'वैम्पायर संक्रमण' को रोकने का प्रयत्न कर रहा है, तथाकथित मानवताप्रेमियों का 'यवन प्रेम' जाग उठा है और उनके लिये विधवाविलाप कर रहे हैं।
इन्हें अपने धर्म व संस्कृति के कारण प्रताड़ित बचेखुचे कुछ हजार हिंदुओं के शरण देने में अर्थव्यवस्था व जनसंख्यावृद्धि की समस्या दिखाई दे रही है लेकिन पैनइस्लामिज्म के पैरोकार पिशाचों के झुंडों को शरण देने में मानवता दिखाई दे रही है जो मानवता के नाम पर कलंकित इतिहास लिये घूमते हैं। पर अब और नहीं।
अब हिंदू राष्ट्रवादियों का सीधा सादा सा व्यवहारिक दृष्टिकोण है-
'अपने परिवार के सदस्यों की कीमत पर मानवतावाद तुम्हें मुबारक हो, मैं अपने परिवार की रक्षा पहले करूंगा।'
यह 'घर' हिंदुओं का है और यहाँ वही आ सकेंगे जिन्हें हिंदू चाहेंगे। उन्हें तो आने की बिलकुल अनुमति नहीं होगी जिनका इतिहास अतीत से लेकर आज तक भारत को हजार घाव देने का रहा है और जो आज भी जनसांख्यकीय संतुलन को अपने पक्ष में कर गजवा ए हिन्द के माध्यम से भारत के टुकड़े करने का ख्वाब देख रहे हैं।
जिन्हें मानवतावाद की ज्यादा हुड़क छूट रही हो और इन रक्तपिशाचों पर दया आ रही है वे दो चार परिवारों को गोद ले लें।
"ठाकुर की कलम से"
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