"#वास्तव_में_जातिवादी_कौन?"
———#मनुस्मृति (#मनु) #या #ललित_विस्तार (#बुद्ध)———
#मनु कहते हैं- जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते।
अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं।
वर्तमान समय में ‘#मनुवाद’ शब्द को #नकारात्मक अर्थों में लिया जा रहा है। ब्राह्मणवाद को भी मनुवाद के ही पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है। वास्तविकता में तो मनुवाद की रट लगाने वाले लोग #मनु अथवा #मनुस्मृति के विषय में जानते ही नहीं है या वे अपने निहित स्वार्थों के लिए मनुवाद का राग अलापते रहते हैं। वास्तव में, जिस जाति व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराया जाता है, उसमें जातिवाद का उल्लेख तक नहीं है।
जब हम बार-बार मनुवाद शब्द सुनते हैं तो हमारे मन में भी प्रश्न उठता है कि यह मनुवाद है क्या? महर्षि मनु मानव संविधान के प्रथम प्रवक्ता और आदि शासक माने जाते हैं। मनु की संतान होने के कारण ही मानव को मनुष्य कहा जाता है। अर्थात मनु की संतान ही मनुष्य है। सृष्टि के सभी प्राणियों में एकमात्र मनुष्य ही है, जिसे विचारशक्ति प्राप्त है। मनु ने #मनुस्मृति में समाज संचालन के लिए जो व्यवस्थाएं दी हैं, उसे ही सकारात्मक अर्थों में मनुवाद कहा जा सकता है।
समाज के संचालन के लिए जो व्यवस्थाएं दी हैं, उन सबका संग्रह मनुस्मृति में है। अर्थात मनुस्मृति मानव समाज का #प्रथम_संविधान है, न्याय व्यवस्था का शास्त्र है। यह वेदों के अनुकूल है। वेद की कानून व्यवस्था अथवा न्याय व्यवस्था को कर्तव्य व्यवस्था भी कहा गया है। उसी के आधार पर मनु ने सरल भाषा में मनुस्मृति का निर्माण किया। वैदिक दर्शन में संविधान या कानून का नाम ही #धर्मशास्त्र हैं।
मनुस्मृति न तो दलित विरोधी है और न ही ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देती है। यह सिर्फ मानवता की बात करती है और मानवीय कर्तव्यों की बात करती है। मनु किसी को दलित नहीं मानते। दलित संबंधी व्यवस्थाएं तो अंग्रेजों और आधुनिकवादियों की देन हैं।
दलित शब्द प्राचीन संस्कृति में है ही नहीं। चार वर्ण जाति न होकर मनुष्य की चार श्रेणियां हैं, जो पूरी तरह उसकी योग्यता पर आधारित है। प्रथम ब्राह्मण, द्वितीय क्षत्रिय, तृतीय वैश्य और चतुर्थ शूद्र। वर्तमान संदर्भ में भी यदि हम देखें तो शासन-प्रशासन को संचालन के लिए लोगों को चार श्रेणियों- प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में बांटा गया है। मनु की व्यवस्था के अनुसार हम प्रथम श्रेणी को ब्राह्मण, द्वितीय को क्षत्रिय, तृतीय को वैश्य और चतुर्थ को शूद्र की श्रेणी में रख सकते हैं। जन्म के आधार पर फिर उसकी जाति कोई भी हो सकती है।
#मनु कहते हैं -
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च। (१०/६५)
महर्षि मनु कहते हैं कि कर्म के अनुसार ब्राह्मण शूद्रता को प्राप्त हो जाता है और शूद्र ब्राह्मणत्व को। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न संतान भी अन्य वर्णों को प्राप्त हो जाया करती हैं। विद्या और योग्यता के अनुसार सभी वर्णों की संतानें अन्य वर्ण में जा सकती हैं।
मनु की व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण की संतान यदि अयोग्य है तो वह अपनी योग्यता के अनुसार चतुर्थ श्रेणी या शूद्र बन जाती है। ऐसे ही चतुर्थ श्रेणी अथवा शूद्र की संतान योग्यता के आधार पर प्रथम श्रेणी अथवा ब्राह्मण बन सकती है। हमारे प्राचीन समाज में ऐसे कई उदाहरण है, जब व्यक्ति शूद्र से ब्राह्मण बना। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुरु वशिष्ठ महाशूद्र चांडाल की संतान थे, लेकिन अपनी योग्यता के बल पर वे ऋषि बने। विश्वामित्र अपनी योग्यता से क्षत्रिय से ब्रह्मर्षि बने। ऐसे और भी कई उदाहरण हमारे समक्ष उपस्थित हैं, जिनसे इन आरोपों का स्वत: ही खंडन होता है कि मनु दलित विरोधी थे।
ये तो रही मनुस्मृति के विषय में बात, अब थोड़ा ललित विस्तार को भी देख ले, जो स्वकथित भीमवादी और तथाकथित बौद्ध ब्राह्मणवाद और मनुवाद को समाज के लिए विष बताते है, और सनातन धर्म और महर्षि मनु पर निराधार आक्षेप लगाते हैं, वे अपनी पुस्तकों पर भी दृष्टि डाल लें ---
बौद्ध मत का ग्रन्थ है ललित विस्तार
सुत्त इसका तृतीय अध्याय है " कुलशुद्धि परिवर्त "
बोधिसत्व हीनकुलो में ,चांडाल कुलो में ,रथकार कुलो में ,निषाद कुलो में उत्पन्न नही होते है ,किन्तु दो ही कुलो ब्राह्मण कुल और क्षत्रिय कुलो में ही होते है ,जब लोक में ब्राह्मण लोग बढ़े चढ़े है तब ब्राहमण और जब क्षत्रिय तब क्षत्रियो में उत्पन्न होते है। ललितविस्तार ३/२६ (पृष्ठ ६०-६१ )
अब तो जातिवाद के कारण अवश्य ही नवबौद्ध मनुस्मृति समान इस ग्रन्थ को भी जलाएंगे ?
और देखिये इससे स्पष्ट है कि कथितबौद्ध कितनी भी विपश्ना आदि कर ले लेकिन बौद्ध पद्धवी नही पा सकते है, क्योंकि वो तो ब्राह्मण और क्षत्रियो के ही पुत्रो के लिए आरक्षित है। और इसमें भी जिसका पलड़ा भारी उसी कुल का बुद्ध बनेगा मतलब दादागिरी।.
"ठाकुर की कलम से"
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