#हिंद के वीरों
"समर शेष है महासिंधु का"
सोने में समय मत गवांओ, 70 सालों में हम जड़, जोरू और जमीन बहुत कुछ खो चुके हैं।
इन कांग्रेसी नरभक्षियों, वामपंथी गीद्धों को पहचानों ये अपने आसपास हीं रहते हैं । ये मुगलों के वो नाजायज औलादें हैं जो शनैः शनैः गजवा-ए-हिंद की चाहत रखते हैं और काफी हद तक सफल रहें हैं।
जितने भी #CAB विरोधी है, सबके सब सड़क पर उतर आए...लेकिन एक भी #CAB समर्थक सड़क पर नहीं आया विरोधियों की बजाए समर्थकों की संख्या सौ गुनी है फिर भी...मुट्ठी भर लोग दहशत पैदा करने में सफल हो जाते है...यह सिलसिला तब तक चलेगा जब तक आम लोग चुपचाप सहेंगे व इनके विरुद्ध सड़कों पर नहीं उतरते...
ये तैयारी है मोपला २.०, डायरेक्ट एक्शन डे २.० की...सिटीजन अमेंडमेंट बिल आने के बाद जिस सुनियोजित तरीके से बंगाल, केरला, आसाम और पूर्वोत्तर राज्यों में अराजकता की आग शांतिदूतों/ मुगलों के हरम की नाजायज औलादों ने लगाई है, यह भारत के बहुसंख्यकों के लिए चेतावनी नही है बल्कि यह उनके ऊपर होने वाली रक्तिम आक्रमकता और उनके नरसंहार होने के अंतिम प्रहर की तरफ, उन्माद में बढ़ते चरण है...
यह हम लोगों को १९२१ के मोपला और १९४६ के डायरेक्ट एक्शन डे की पुनरावृत्ति किये जाने की आगामी सूचना है...
यदि हमने अपने आप को अभी भी जाग्रत नही किया तो जैसे आजादी के समय सुनियोजित तरीकों से हुआ था वैसे आज भी सुनियोजित तरीके से हो रहा है ..
क्योंकि मैं नही समझता कि इस विभाजित बहुसंख्यक समाज को कोई भी शासकीय व्यवस्था व उसका तंत्र, इन आसुरी शक्तियों से सुरक्षा दे पाएगी, जब तक वह अपने अंदर, प्रतिघात की मानसिकता से ग्रसित होने को तैयार नही होगी...
हम अपनी पिछली पीढ़ियों द्वारा खुद के नरसंहार के प्रति आत्मसमर्पण करने को दासत्व के युग की विवशता, विरासत में मिली कूपमण्डूकता, अहिंसा के दर्शन की नपुंसकता व अविश्वसनीय नियंत्रित सूचना तंत्र की पुरातन व्यवस्था के बोझ में दबे होना मान कर, समझा सकते है लेकिन वर्तमान की पीढ़ी के लिए यह आज सब क्षम्य नही हो सकता है...
हमें स्वयं में ही समग्र होना होगा क्योंकि वर्तमान को भविष्य के लिए, भूतकाल केवल सीख देता है, कोई आशा नही देता है...
सावधान हो जाओ...
ये जो #CAB के लिए बंगाल मे ट्रेनों, स्टेशनों और देश की संपत्ति को आग के हवाले कर रहे हैं ना, कल वो तुम्हें भी जला सकते हैं...?
ये नागरिकता बिल का विरोध नहीं, ये भावी गृहयुद्ध का पूर्वाभ्यास है...
जब असली गृह युद्ध होगा तब ना कांग्रेसी हिन्दू बचेगा ना भाजपाई हिन्दू...आज तत्काल आवश्यकता है, कि नागरिकता संशोधन बिल पर सरकार के समर्थन में गम्भीरतापूर्वक सड़कों पर आएं, और देश के दुश्मनों के मंसूबो को कुचल डाले...!
अरे भई जब युद्ध सर पे है,तो भावुकता कैसी...?
वे गौ को आगे करेंगे, कभी बच्चों को सामने करेंगे, कभी घाघरे की ओट लेंगे, कभी इंसानियत का हवाला देंगे...
युद्धाय कृतसंकल्प...!
जिन इलाकों और जिन संस्थाओं ने डायरेक्ट एक्शन डे का समर्थन किया था, पृष्ठभूमि बनाई थी, बौद्धिक जमीन तैयार की, वही सभी अब सक्रिय हैं...!
भारत में एक हजार के उपर यूनिवर्सिटी व उच्च संस्थान हैं, पर ले दे के वही अलीगढ़, जामिया उनके क्लोन जादवपुर, TISS, हैदराबाद, बंगाल, मुर्शिदाबाद, माल्दाह पुराने रजाकारों का नाम बदल कर मीम, लीग के आगे इंडिया जोड़कर इंडियन मु ली, कमीने वामपंथी तो भूकंप महामारी में भी 'चांस और अवसर' ढूंढते हैं, क्योंकि उनकी हालत इतनी खराब है कि नथिंग टू लूज के बाद किसी गोलमाल अराजक समय में ही उनकी लाटरी खुल सकती है...?
गो बैक टू १९४०, समझिये कि पृथ्वी वहीं कैसे पहुंची, हालात बहुत खराब हैं, हम शंकित हैं, लगता है बाजी निकल जायेगी...
मगर ठहरिए, यह लड़ाई तो लड़नी ही पड़ेगी, जितनी देर करिएगा, शत्रु का एडवांटेज बनेगा...और फिर पिछले १०००/१२०० सालों में आज हम सबसे बेहतरीन पोजीशन में हैं...
ऐसा कमांडर कहां मिलता है, इसलिए कमांडर के साथ खड़े रहिये...किसी गैसलाइटिंग के चक्कर में न पड़ें...बिल्कुल एपोलोजेटिक न हों...!
केवल हमारी मृत्यु ही हमें विरत करे तो करे, जीवित अवस्था में पीछे न हटने का प्रण लें...
परिवार, व्यापार, आपसी संपर्क, खुशहाल ठीक-ठाक जीवनयापन, नौकरी इत्यादि बहुत मामूली चीजें हैं, राष्ट्र धर्म के आगे...फ्रीडम और ग्लोरी के आगे...अंदाजा करिये हमारे पुरखों ने क्या झेला होगा, उन्हें ट्रिब्यूट देने का वक्त आ गया है तो समझिए हम भाग्यशाली हैं...फर्ज का कर्ज उतारिये,
गाईये जोर से-
"मेरा रंग दे बसंती चोला,
मेरा रंग दे बसंती चोला,
हां ये रंग दे, ओए रंग दे,
मेरा रंग दे बसंती चोला,
मां ए रंग दे बसंती चोला...!!!
"ठाकुर की कलम से"
Comments
Post a Comment