कोई वर्ल्ड वॉर नहीं होने जा रही...
आज की स्थितियों के अनुसार ईरान के पास केवल 2 ही ताकतवर दोस्त हैं, पहला रूस और दूसरा चीन।
इनमें रूस इतना ताकतवर जरूर है कि दुनियाँ के किसी भी देश से लड़ने में सक्षम है। लेकिन इतना ताकतवर नहीं हुआ है कि दुनियाँ में चौधरापन करे और उसकी चौधराहट को दुनियाँ स्वीकार ले।
चौधराहट के लिए दुनियाँ के कई ताकतवर देशों का मजबूत गैंग बनाकर उसका सरगना बनना पड़ता है। इस कसौटी पर रूस की झोली बिल्कुल खाली है और ट्रम्प की झोली लबालब भरी हुई है। इसलिए रूस यह मोटा बयाना बिल्कुल नहीं लेगा।
रही बात चीन की तो... जब भारत ने उसकी सबसे खास रखैल पाकिस्तान को 2 बार घर में घुसकर जुतियाया तब चीन ने चुप रहने में ही भलाई समझी। इसलिए अपने साथ कभी नरम कभी गरम सम्बन्ध रखनेवाले ईरान के लिए चीन अमेरिका से जूझ जाएगा, यह सोचना भी हास्यास्पद है। 1962 में नेहरू की देशघाती मूर्खता और अपनी धोखाधड़ी से भारत से युद्ध जीतने के बाद 70 के दशक में चीन ने वियतनाम सरीखे छोटे से देश को कमजोर समझकर उस पर हमला किया था। लेकिन वियतनाम ने चीन को जमकर जुतिया के उसके भ्रम का भूत बहुत बुरी तरह उतारा था। तबसे अबतक चीन फिर कभी किसी देश से जूझने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है। अभी कुछ वर्ष पूर्व जापान को छोटा देश समझ कर उसकी समुद्री सीमा में घुसने की चीन की कोशिश के जवाब में जापान ने जैसे ही अपने युद्धपोत समुद्र में चीनी नौसेना के सामने उतारे थे तो जापान की समुद्री सीमा से चीनी नौसेना सिर पर पैर रखकर भागी थी।
जो अन्य थोड़े बहुत देश ईरान के साथ हैं वो स्वयं ही तबाह बरबाद भिखारी सरीखी हैसियत वाले हैं। अरब और इस्लामी दुनिया के सबसे धनी देश खुलकर अमेरिका के खेमे में खड़े हैं।
अतः ऐसी स्थितियों में विश्वयुद्ध नहीं होता।
जब 19-20 के फर्क वाले लगभग बराबर ताक़त के ताकतवर देशों के दो समूह जब आमने सामने होते हैं तब विश्वयुध्द होता है।
जबकि ईरान अमेरिका युद्ध में स्थिति इसके ठीक विपरीत है।
हालांकि भारत अभी चुप्पी साधे है और बहुत सधी हुई प्रतिक्रिया दे रहा है। लेकिन कश्मीर से 370 हटाने के भारत के फैसले के खिलाफ पाकिस्तानी मुहर्रम में शामिल होकर ईरान यह तय कर चुका है कि यदि भारत के लिए निर्णय लेना अपरिहार्य हो तो वो क्या निर्णय ले.? ईरान के साथ या अमेरिका के साथ.?
Comments
Post a Comment