मुगल_सल्तनत_का_दुखदायी_अंत

"मुगल_सल्तनत_का_दुखदायी_अंत"

साल 1707 में मुग़ल बादशाह औरंगजेब मर गया और बाबर के कुनबे की उल्टी गिनती चालू हो गयी.... 1857 में बहादुर शाह जफर के साथ ही मुगलिया दौर इतिहास के पन्नो से गायब हो गया..... लेकिन बहादुर शाह के मरने से पहले ही मुगलिया कुनबे को जीते जी मरने का दौर भी किश्मत ने दिखाया था.... जिन मुग़लों ने दूसरों की बेटियों को जबरिया हरम में लाने की रवायतें चालू की थी उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था के उनके खानदान के साथ कुछ ऐसा भी हो सकता है......

कहानी तब की है जब अब्दाली भारत से लौट चुका था और मुग़ल सल्तनत की औकात लाल किले से पालम तक की रह गयी थी और इस औकात के भी माई बाप हुआ करते थे उनके वज़ीर.... उस वक़्त दिल्ली की गद्दी पर शाह आलम द्वितीय बैठा था..... अब #शाह_आलम को ये ग़लतफहमी हो गयी के वो हिन्द के बादशाह हैं उन्ने अपने पुरखों की स्टाइल में कुछ फतवे कुछ फ़ैसले कर डाले..... जिनमें से एक था अपने बेटे #अकबर_मिर्ज़ा को दिल्ली प्रशासन का प्रमुख बनाना...... अब शाह आलम के इस फैसले से चिढ़ उनके गिने चुने वफादार भी उनसे किनारा कर गए और मौके का फायदा उठा मुगलिया हरम के ख्वाज़ासरा(हिजड़े) #ग़ुलाम_कादिर ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया..... जान बचा शाह आलम तो भाग निकला लेकिन पूरा मुग़ल कुनबा पकड़ लिया गया...... अब दिल्ली की गद्दी पर एक हिजड़ा ग़ुलाम क़ादिर बैठा.....!

ग़ुलाम क़ादिर ही था जिसने मुग़लों को सबसे गहरा घाव दिया इतिहास में..... दिल्ली की गद्दी पर बैठ ग़ुलाम क़ादिर ने मुग़लिया शहज़ादों और शहजादियों को दीवानेआम में बुलवाया और फिर उसने मुग़ल शहजादियों को कपड़े उतारने का हुक़्म दिया, फिर मुग़ल शहजादियों के कपड़े शहज़ादों को पहनाए जिनमे शहज़ादा अकबर मिर्ज़ा भी था..... मुग़लों की आबरू दिल्ली के दरबार में तार तार खड़ी थी....
ग़ुलाम क़ादिर नाम का एक हिजड़ा शहज़ादों को औरतों के कपड़े पहना और शहजादियों को नंगा कर नचवा रहा था..... दीवानेआम में तालियां और ठहाके गूंज रहे थे...... औरंगज़ेब जिसने दूसरों के बच्चे जिंदा दीवारों में चुनवा दिए उसकी मौत के सौ वर्ष के भीतर ही उसकी नश्ल का ये हश्र हुआ था.....!

वर्तमान की खाशियत होती है वो इतिहास से नहीं सीखता..... सत्ता तो बिलकुल नहीं सीखती अपने नशे में....... और इसी नशे का मारा उत्तरपदेश का एक नेता था आज़म खां...
ये आईएएस/आईपीएस को जूते साफ करवाने की धमकी देता, ये दंगे करवाने के एलान करता, ये महिलाओं की चड्डियों के रंग बताता, सचिवालय के अधिकारियों से बिना गाली बात न करता...... इसकी भैंस भी खो जाती तो पूरे प्रदेश की पुलिस खोजने को निकल पड़ती....
लेकिन आज उसी आज़म खां की ज़ुबान सिली हुई है, डर से ऊंचा पजामा गीला है, पुलिस से भागा फिरता है सायद डर के मारे बेग़म के घाघरे में शरण ले ली है..... सायद कल उनकी चड्डी की रंगत भी बता दे!

सत्ता के हर सामंत को जो दूसरे की जऱ, जोरु, ज़मीन को रौंद, जो आम जनता के आत्मसम्मान की छाती पर पैर रख अकड़ कर सत्ता ताक़त के नशे में बदकार हुआ जाता है उसे याद रख लेना चाहिए अंज़ाम औरंगज़ेब की औलादों का....... जिल्लेसुब्हानी की छतों में जाले लटक गए..... तुम्हारी तो औकात ही क्या है बे..... वक़्त से डरो..... ये बड़ा बलवान 

"ठाकुर को छेड़ोगे, तो सात पुस्तों तक नहीं छोड़ेगा।"

"ठाकुर की कलम से"

Comments