*शाहीन बाग का सच के पीछे काले मोहरों की बिरयानी*

*शाहीन बाग का सच के पीछे काले मोहरों की बिरयानी*


वामपंथियों, कांग्रेसियों तथा राष्ट्र विरोधी अवसरवादियों द्वारा प्रायोजित दिल्ली के शाहीन बाग का धरना और मोदी सरकार द्वारा उस धरने को समाप्त कराने के विपरीत, चलता रहने दिया जाना, कोई रोजमर्रा में होने वाली समर्थन व विरोध की राजनैतिक उठा पटक नही है। यह CAA, NRC के विरोध में, जेहादी मुसलमानों की भीड़ को ढाल बना कर, अराजकता फैलाने के लिए, किया जाने वाला एक गैर राजनैतिक विरोध है। यह भीड़, भारत का मुसलमान खतरे में है, के कथानक से बुनी गयी है।

केंद्र सरकार, इस धरने व मुसलमानों के कलुषित कथानक को संभालने व ध्वस्त करने के लिए जो प्रयास या कुप्रयास कर रही है, वह भले ही आलोचकों व समर्थकों की दृष्टि में सरकार की कमजोरी और असफलता है लेकिन मैं देख रहा हूँ कि मोदी सरकार वह सभी वह कार्य कर रही है, जो धरने के प्रायोजकों के अपेक्षों के विपरीत हैं। जब शाहीन बाग के धरने की शुरुवात की गई थी तब उसके प्रयोजकों की अवधारणा यह बिल्कुल भी नही थी कि यह धरना, अन्य स्थानों में फैलने की जगह, एक ही जगह सिमिट कर रह जायेगा और वह, बिना हिंसा के इतने लंबे अंतराल तक खींच जाएगा। 

आज शाहीन बाग का धरना, मोदी सरकार व विपक्षियों के बीच शतरंज की बिसात बन चुका है। इसमे सिर्फ काले मोहरे साफ दिख रहे है जबकि सफेद मोहरे, बिना काले मोहरों के पैदलों को पीटे, उनके ऊंटों, हाथियों, घोड़ो को किनारा करते हुए, शह देने की तैयारी कर रहे है। काले मोहरे पिट नही रहे है, यह धरना प्रयोजको के लिए चिंता का विषय है। जब कोई पक्ष, प्रतिकार स्वरूप अराजक होने का अवसर ढूंढता है और उसका प्रतिद्वंद्वी, उसकी आशा के विपरीत, अपने अप्रत्याशित व्यवहार से उसको यह अवसर से वंचित करता है, तो वह मनोवैज्ञानिक रूप से दरकने लगता है। तब वह या तो अधीरता में बड़ी भूल कर जाता है या फिर प्रायोजित भीड़ को स्वयं से औचित्य का प्रश्न उठाने का अवसर प्रदान कर देता है।

अभी मैंने एक मुस्लिम को, शायद वह कोई मुल्ला मौलवी है उसको सुना है। उसको सुन कर यह लगता है कि शाहीन बाग के धरने में जो सहर्ष काले मोहरे बने हुए है, उन में से कुछ को, इस खींचते हुये धरने ने यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि जो बिरयानी उन्हें खिलाई जा रही है, क्या वे उस बिरयानी के बकरे खुद तो नही है? क्या वे बलि के बकरे तो नही है जिसकी आगे बनी बिरयानी, कोई और खायेगा?

"ठाकुर की कलम से"

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