अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने इजरायल के बारे में कहा था "मर्द तो मर्द ही होते हैं?"

अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने इजरायल के बारे में कहा था "मर्द तो मर्द ही होते हैं?"

इराक में जब सद्दाम हुसैन का राज था तब इराक के बड़े बड़े सपने थे। सद्दाम हुसैन ने इराक को परमाणु शक्ति से संपन्न राष्ट्र बनाने का निर्णय लिया था। फ्रांस जैसे बड़े एवं शक्तिशाली राष्ट्र भी इराक की सहायता कर रहे थे,,  क्योंकि इसके लिए उन्हें इराक से अत्यधिक धन की प्राप्ति हो रही थी। अमेरिका भी तब सद्दाम की ओर से आँखें बंद कर के चिप्स और बर्गर खा रहा था ,.क्योंकि उस समय इराक रुस के विरुद्ध अमेरिका का साथ दे रहा था।

वैसे भी अमेरिकी ऐसी बातों के लिए टेंशन नहीं लिया करते। उन्हें सबकी गहराई एवं ऊँचाई के विषय में पता है। पहले वे सद्दाम जैसे पिट्ठुओं को बनाते हैं और फिर उन्हें ही मारपीट कर फिर से नया खेल आरम्भ करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे हम और आप रेत के घरौंदे बनाते और बिगाड़ते हैं . . .

इजरायल ने फ्रांस, इटली, अमेरिका, ब्रिटेन जैसे शक्तियों से अपनी पीड़ा को व्यक्त किया। सबसे बताया कि इराक की नीयत परमाणु बम बनाने की है और यदि फ्रांस उसके यहाँ परमाणु संयन्त्र बनाएगा तो उसका उपयोग शांति के लिए नहीं किया जाएगा। फ्रांस इस बात को समझ तो रहा होगा किन्तु अस्सी के दशक में आर्थिक मोर्चे पर अनेकों समस्याओं का सामना कर रहे फ्रांस ने इजरायल के चिंता को कोई भी महत्व नहीं देते हुए इराक से अपना व्यापार ना केवल बनाए रखा अपितु परमाणु संयन्त्र के काम को भी नहीं रोका

संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रसिद्ध अभिनेता रोनाल्ड रीगन जो आगे चल कर वहाँ के राष्ट्रपति बने, वे भी इजरायल के चिंताओं को नहीं समझ सके। उन्होंने इजरायल को कहा कि इराक अपने परमाणु संयन्त्र को शांतिपूर्वक उद्देश्यों के लिए बना रहा है और ये उपयुक्त समय नहीं है जब उसके कार्यक्रम को रोका जाना चाहिए। अब इजरायल की चिंता बढ़ती जा रही थी........ उसे आभास हुआ कि अपने मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता। इन परिस्थितियों में इजरायल को जिस राष्ट्र का समर्थन प्राप्त हुआ, वह था ईरान . . .

ईरान के नीतिनिर्माताओं को सद्दाम हुसैन से समस्या थी। ईरान कभी भी नहीं चाहता था कि इराक एक परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बन जाए। ईरान इस परमाणु कार्यक्रम के विरोध में इस सीमा तक था कि 1980 में ईरान ने अपने युद्धक विमान भेजकर इराक के परमाणु संयन्त्र पर बमबारी तक करा दिया था। रोचक बात ये है कि इनका निशाना तब भी चूक गया था

इजरायल को ईरान से चाहिए था इराक के परमाणु संयन्त्र की तस्वीरें, ले-आउट व समस्त प्रासंगिक सूचनाएँ क्योंकि ईरान के विमानों का निशाना अवश्य चूक गया था किन्तु उन्होंने जासूसी कुशलतापूर्वक किया था। उन्होंने अपने सूत्रों के उपयोग से इराक के परमाणु संयन्त्र की अनेकों तस्वीरेंं, मानचित्र, सब प्राप्त कर लिया था। ईरान ये सारा कुछ उठाकर इजरायल को सौंप दिया

इजरायल ने अपने अतिविशिष्ट गुप्तचर एजेंसी मोसाद को कहा कि जवानो, जितना खाना है, खाओ परन्तु अभियान पर दिनरात लग जाओ। पता कर के आओ कि परमाणु संयंत्र कितना बना है, कितना शेष है। मोसाद ने अभियान को अविलम्ब आरम्भ कर दिया। जाकर सब पता किया, आकर सब बता दिया। अब इजरायल के रणनीतिकारों के सामने मेज पर पर्याप्त सूचना उपलब्ध थी। प्राप्त सूचना के अनुसार जून 1981 के अंत तक इराक का परमाणु संयन्त्र प्रायः पूर्णरूपेण कार्यरत हो जाना था। इजरायल ने उच्चस्तरीय बैठक बुलाकर सभी राजनीतिक दलों व शीर्ष अधिकारियों से विचार विमर्श किया। विपक्षी दलों ने कहा कि इजरायल को इराक पर कोई भी प्रत्यक्ष कार्रवाई ना करके विश्व के बड़े राष्ट्रों से इस प्रकरण पर कूटनीतिक समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए

इजरायल के प्रधानमंत्री मेनाशेम ने मोसाद और इजरायल की वायुसेना के सर्वोच्च अधिकारियों से अलग से इस पूरे प्रकरण की चर्चा किया। कुछ अधिकारियों ने तो स्पष्ट रूप से कहा कि ऐसा अभियान सम्भव नहीं है और इसे आत्मघाती अभियान तक बताया। इसके पीछे कई कारण थे। इजरायल को जॉर्डन और सऊदी जैसे राष्ट्रों की वायु सीमा का उल्लंघन करते हुए सोलह सौ किलोमीटर दूर जाकर इराक के परमाणु संयन्त्र को नष्ट करना था। ये कोई छोटी सी बात नहीं थी। वो भी तब जब इजरायल घिरा हुआ है अपने शत्रुओं से जो इजरायल को कच्चा चबा जाने तक की इच्छा रखते हैं पर कर कुछ नहीं पाते। कोई भी राष्ट्र सहयोग करने को तैयार नहीं पर इजरायल के साहस के सामने सारे लक्ष्य छोटे बन जाते हैं।

अधिकारियों से सबकुछ समझ लेने के पश्चात इजराइल की कैबिनेट ने सहमति से सर्जिकल स्ट्राइक करने के पक्ष में निर्णय ले लिया। आठ F-16 लड़ाकू विमान तैयार किये गए और हर विमान को दो दो मार्क 84 बम से सुसज्जित किया गया। प्रत्येक बम का भार 2000 किलो था। ये सब करने के पश्चात 7 जून 1981 को अपराह्न चार बजे इजरायली वायु सेना के रणबाँँकुरे बाज की भाँति चल पड़े अपने लक्ष्य की ओर। इस अभियान में रडार से बचने के लिए इन पायलटों को यह ध्यान रखना था कि उनके विमान 100 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर ना उड़े। इसके अतिरिक्त उन्हें जॉर्डन और सऊदी की वायु सेना का उल्लंघन करते हुए और बिना पकड़े गए अपने लक्ष्य तक जाना था और वापस आना था। इसमें विमान में ईंधन का भी ध्यान रखना था क्योंकि उन्हें इंधन भरने के लिए कोई भी सुविधा नहीं देता। जब वह जॉर्डन में गए और उनको एकाध स्थान पर 100 मीटर से ऊंचा उठना पड़ा तो जॉर्डन के रडार पर वे चिन्हित कर लिए गए। वहाँँ पर वे सऊदी बोलने लग गए और वायुसीमा नियंत्रक द्वारा पूछे जाने पर कहा कि वे सऊदी के विमान हैंं और भटक कर इधर आ गए हैं। यही उनके साथ सऊदी में भी हुआ। वहाँ उन्होंने बोल दिया कि वे जॉर्डन के हैं और भटक करके इधर आ गए हैं

इराक की सीमा में पहुंचते ही इजरायल के F-16 विमानों ने अचानक से सीधा हो करके ऊँँचा उठना ऊँँचा उठना आरंभ किया और एक निश्चित ऊंचाई पर जाकर के हर विमान ने पांच-पांच सेकंड के अंतराल पर अपने सारे बम इराक के परमाणु संयंत्र पर गिरा दिया। इराक का परमाणु संयंत्र कुछ सेकंड में राख हो गया था। इराक के सुरक्षाबल उन पर गोलियाँँ दागने लग गए किंतु इजरायल के युद्धक विमान इतनी ऊंचाई पर जा चुके थे कि वहां तक गोलियां पहुंचना संभव नहीं रह गया था। इसके पश्चात पूरे रफ्तार के साथ वे जॉर्डन, सऊदी सब की सीमाओं का उल्लंघन करते हुए आराम से अपने यहां पहुंच गये। यह समाचार जंगल की आग की भांति पूरे विश्व में फैल गया। फ्रांस तो अत्यधिक कुपित हुआ। संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक भी बुलाई गई जहां पर इजराइल की कड़ी आलोचना की गई,,,, परंतु उसके पहले जब यह समाचार अमेरिका के राष्ट्रपति को प्राप्त हुआ। दो सेकंड सोचने के पश्चात उन्होंने मुस्करा कर कहा कि मर्द तो मर्द ही होते है

यह अपने प्रकार का अत्यंत ही विशिष्ट अभियान था और इसके पश्चात सम्पूर्ण विश्व ने इजरायल को एक नए रूप में देखना आरंभ किया। इस अभियान के कुछ समय पश्चात इजरायल के प्रधानमंत्री अमेरिका भ्रमण पर भी गए जहां अमेरिका ने उनका भव्य स्वागत किया। कालांतर में इराक के परमाणु संयंत्र को नष्ट करने के लिए अमेरिका ने आधिकारिक रुप से इजरायल को धन्यवाद भी ज्ञापित किया
ठाकुर की कलम से

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