"मोपला 2.0"
"डायरेक्ट एक्शन डे 2.0"
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"जागो हिन्दुओं जागो"
कब तक सोये रहोगे
सिटीजन अमेंडमेंट बिल आने के बाद जिस सुनियोजित तरीके से बंगाल, केरला, आसाम और पूर्वोत्तर राज्यों में अराजकता की आग शांतिदूतों ने लगाई है, यह भारत के बहुसंख्यकों के लिए चेतावनी नही है बल्कि यह उनके ऊपर होने वाली रक्तिम आक्रमकता और उनके नरसंहार होने के अंतिम प्रहर की तरफ, उन्माद में बढ़ते चरण है।
यह हम लोगो को 1921 के मोपला और 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे की पुनर्वित्ति किये जाने की आगामी सूचना है। यदि हमने अपने आप को अभी भी जाग्रत नही किया तो जैसे कल हुआ था वैसे आज भी होगा। क्योंकि मैं नही समझता कि इस विभाजित बहुसंख्यक समाज को कोई भी शासकीय व्यवस्था व उसका तंत्र, इन असुरी शक्तियों से सुरक्षा नही दे पाएगी, जब तक वह अपने अंदर, प्रतिघात की मानसिकता से ग्रसित होने को तैयार नही होगी।
हम अपनी पिछली पीढ़ियों द्वारा खुद के नरसंहार के प्रति आत्मसमर्पण करने को दासत्व के युग की विवशता, विरासत में मिली कूपमण्डूकता, अहिंसा के दर्शन की नपुंसकता व अविश्वसनीय नियंत्रित सूचना तंत्र की पुरातन व्यवस्था के बोझ में दबे होना मान कर, समझा सकते है लेकिन वर्तमान की पीढ़ी के लिए यह आज सब क्षम्य नही हो सकता है।
हमे स्वयं में ही समग्र होना होगा क्योंकि वर्तमान को भविष्य के लिए, भूतकाल केवल सीख देता है, कोई आशा नही देता है।
"ठाकुर की कलम से"
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