देश का बँटवारा
"15 अगस्त 1947 के पदचाप"
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हिंदुओं सावधान "नेपथ्य में देश की पुनः बँटवारे की पदचाप"
हमको जो आज पूरे बचे हुए भारत मे दिखाई और सुनाई पड़ रहा है वह गांधी और कांग्रेस के भारत ने 1940 में भी देखा और सुना था। उस वक्त तब भी कांग्रेस और गांधी प्रभाव से ग्रसित हिंदुओं में उपजीत अहिंसा की नपुंसकता ने, उसको न देखा था और सुना था। उसी का यह परिणाम हुआ कि अगले सात वर्षों, 15 अगस्त 1947 में, कांग्रेस ने जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में, लार्ड माउंटबेटन और जिन्ना से गलबहियां करते हुए, गांधी के घड़ियाली आसुंओं से भीगते हुये, भारत का बंटवारा करा दिया था।
23 मार्च 1940 को जब मुस्लिम लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में मुसलानों के लिए एक नए देश पाकिस्तान के प्रस्ताव को स्वीकार किया था। जब यह प्रस्ताव पास हुआ था तब कांग्रेस समेत ज्यादातर हिंदुओं ने इसको दूर की कौड़ी मान कर अनदेखा किया था। लेकिन जब मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को कलकत्ता में हुए डायरेक्ट एक्शन डे का आवाहन किया और हिन्दुओ का नरसंहार किया तब कांग्रेस के हाथ पांव फूल गये थे। इस डायरेक्ट एक्शन डे का प्रभाव पूरे बंगाल में पड़ा जिसने शनै शनै पूरे भारत को हिन्दू मुस्लिम दंगो में लपेट लिया था। यह धर्म के आधार पर एक ऐसा मृत्यु का तांडव था जिसमे मुस्लिम लीग के समर्थक आक्रमण के लिए पूरी तरह तैयार थे और हिन्दू, या तो अपना बचाव कर रहा था या फिर पलायन कर रहा था। इस आक्रमण ने गांधीवाद और कांग्रेस को पूरी तरह से वैचारिक रूप से दिवालिया कर दिया था। जिसके कारण वे आगे लड़ने की जगह वह से पूरी तरह समझौते की डगर पर चल दिये थे।
जो गांधी यह कहते हुए नही धकते थे कि उनकी लाश के ऊपर, भारत का बंटवारा होगा, वो भी नेहरू को बंटवारे के बाद भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनवाने के लिए धूर्तता करने से कोई संकोच नही किया था। 1940 के बाद के भारत का इतिहास को देखे तो यह स्पष्ट होजाता है कि 1947 आते आते तक गांधीवाद और कांग्रेस, जो भारत के हिन्दुओ का राजनैतिक नेतृत्व कर रही थी, मानसिक रूप से पराजित हो चुकी थीI। उस वक्त एक तरफ गांधी जी, भारत और उसके हिंदुओं के भविष्य के चिंतन से बिल्कुल विमुख, अपनी विचारधारा की घनघोर असफलता को, कुतर्कों से सामयिक बनाने के लिए प्रयासरत थे। वहीं कांग्रेस बंटवारे के बाद के भारत की राजनीति व ब्रिटेन के हितों की रक्षा करने में व्यस्त थी।
आज भी यही कुछ, एक अलग कलेवर में होता दिख रहा है। गांधी जी आज नही है लेकिन भारत का धर्मनिरपेक्ष बौद्धिक, हिंदुओं पर हो रही प्रताड़ना को नेपथ्य में ढकेल, उनकी विचारधारा की लाश को हमसे जिंदा मनवाने में लगा है। कांग्रेस व उसके साथ खड़े राजनैतिक दल आज भी हिन्दू हितों के विरुद्ध खड़े, बन्द आखों से इस अराजकता के तांडव पर, वोट के लिए आत्ममुग्ध, डमरू बजा रहे है।
जैसे जैसे इस अराजकता की विकरालता बढ़ती जाएगी वैसे वैसे भारत के कई और बंटवारे की आवाजें फिर से आने लगेगी। इस अराजकता के पीछे, यह नागरिक अमेंडमेंट बिल तो बहाना, वस्तुतः यह हिंदुओं को उन इलाकों से खदेड़ने का रक्तिम प्रयास है, जहां के हिन्दू पिछले कई दशकों से पलायन करते रहे है। यह उस अभ्यास की पुनर्वित्ति है जो 1946 से अविभाजित भारत के प्रांत पंजाब, सिंध, नार्थ वेस्ट फ्रंटियर, बलूचिस्तान और बंगाल में हिन्दुओ के साथ वहां के मुसलमानों ने किया था।
मुझको विश्वास है कि मोदी सरकार, अगले 3/4 महीनों में इस अराजकता का दमन करने में सफल हो जाएगी लेकिन उसी के साथ यह भी कटु सत्य है कि वह सिर्फ अपने भरोसे यह सब नही कर पायेगी। उसके लिए हिन्दू समाज को न सिर्फ जागृत होना होगा बल्कि अपनी चहारदीवारियों से बाहर आकर, इस भितरघात का हर पथ पर सामना भी करना होगा।
"ठाकुर की कलम से"
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