"जहरीले होते सेकुलर्स कीड़े"
राष्ट्रवादी विचारधारा के खिलाफ ज़हर उगलने के लिए सेकलुर बुद्धिजीवी हमेशा तैयार रहते है, बिते दिनों इन्होंने फायदा उठाया सरदार पटेल की जयंती का। मुद्दा ये बनाया कि पटेल संघ से कितनी नफरत करते थे, हैरत की बात ये है कि लिबरल गैंग की तरफ जिन लोगों ने आज ज्ञान की गंगा बहाई उनमें से कुछ लोग तो ऐसे हैं जिनका इतिहास को लेकर ज्ञान एकदम शून्य है। इन्हें न तो बंटवारे की जानकारी है, न 47 के दंगों पर इनका रिसर्च है और गांधी वध पर तो इनकी समझ एकदम “शून्य बटे सन्नाटा” है।
इसी चक्कर मे इन बुद्धिहीन परम् बुद्धिजीवियों से हो गई एक ग़लती, इन्होंने 11 सितम्बर 1948 के उस पत्र का हवाला दिया जो सरदार पटेल ने गोलवलकर को लिखा था। अब ओरिजनल तो ये लोग पढ़ते लिखते हैं नहीं, तो कहीं से कॉपी पेस्ट यानी चेपने के चक्कर मे ये पटेल के पत्र का एक पैराग्राफ कॉपी करना भूल गए, इस पैराग्राफ में क्या है, ये मैं आपको जरूर बताऊंगा लेकिन उसके पहले पटेल के पत्र की पृष्ठभूमि जल्दी से जान जान लीजिए।
गांधी का वध होता है, गोलवलकर गिरफ्तार किए जाते हैं, संघ पर प्रतिबंध लगाया जाता है, लेकिन जब कोई सबूत नहीं मिलता तो हत्या का केस हटाने के बाद गोलवलकर को अगस्त 1948 में रिहा कर दिया जाता है लेकिन संघ से प्रतिबंध नहीं हटाया जाता और इसी प्रतिबंध को हटाने के लिए गोलवलकर पटेल को पत्र लिखते हैं, जिसके जवाब में 11 सितम्बर 1948 को पटेल ने गोलवलकर को पत्र लिखा जिसमे उन्होंने संघ को कई नसीहतें दी, जिन्हें सेकुलर गैंग कॉपी पेस्ट कर रहा था। लेकिन इनसे एक पैराग्राफ छूट गया जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया था ...
तो आइए जानते हैं उस पैराग्राफ में पटेल ने गोलवलकर को क्या लिखा था। पटेल अपने पत्र के आखिरी में लिखते हैं, “मै फिर से आपको बताना चाहता हूं कि आप मेरे जयपुर और लखनऊ के भाषणों *** पर विचार करें और उन भाषणों में मैंने संघ को जो मार्ग दिखाया है उसे स्वीकार करें, मुझे विश्वास है कि इसमें ही संघ और देश का भी भला है। आपने ये मार्ग स्वीकार किया तो देश के कल्याण के लिए हम हाथ मिला सकते हैं, मुझे पूरा विश्वास है कि संघ देशभक्ति का कार्य कांग्रेस में आकर ही कर सकेगा, अलग रहकर या विरोध करके नहीं …”
तो ध्यान दिया आपने … पटेल सीधे सीधे गोलवलकर को ये प्रस्ताव दे रहे हैं कि संघ के स्वयंसेवक कांग्रेस में शामिल हो जाएं … अब आप जानना चाहते होंगे कि पत्र में पटेल आखिर अपने किन भाषणों *** का ज़िक्र कर रहे हैं ? दरअसल दिसंबर 1947 में जयपुर और जनवरी 1948 में लखनऊ में दिए भाषणों में सरदार पटेल ने सार्वजनिक रूप में कहा था कि संघ के लोग देशभक्त हैं ...
तो वापस मुद्दे पर आते हैं … सवाल तो कई हैं, जो अब उठेंगे, जैसे …
1. अगर पटेल कि नज़र में संघ इतना घिनौना संगठन था, जैसा कि सेकुलर गैंग साबित करना चाह रहा है तो फिर वो उसे कांग्रेस में क्यों शामिल करना चाहते थे ?
2. संघ अगर गांधी हत्याकांड में शामिल था, जिसे लिबरल गैंग साबित करने में अपनी पूरी ज़िंदगी लगा चुका है तो बापू के सच्चे शिष्य पटेल उसे अपनी पार्टी में क्यों ला रहे थे ?
चूंकि वामपंथी गैंग की आदत है बाल की खाल निकालने की तो जाहिर है वो पटेल के पत्र के आखिरी पैराग्राफ (जिसे आप से छुपाया गया) पर भी सवाल उठाएंगे, तो उसका भी जवाब है। पटेल ने जो पत्र में कहा था उस पर काम भी किया, दरअसल उस दौर में कांग्रेस के अंदर नेहरू के गुट जितना ही ताकतवर एक समूह था जिसमे पटेल, टंडन, राजेंद्र प्रसाद थे, ये तीनों हिं'दूवादी थे इस पर कोई इतिहासकार सवाल नहीं उठा सकता। खैर, संघ से प्रतिबंध हटाने के कुछ समय बाद ही कांग्रेस कार्य समिति ने एक प्रस्ताव पारित किया कि संघ के स्वयंसेवक कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। जिस समय ये प्रस्ताव पारित किया गया, तब नेहरू राष्ट्रमंडल सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन गए हुए थे। इस प्रस्ताव से नेहरू और उनके मेनन टाइप समर्थक हैरान रह गए, देश लौटते ही नेहरू ने प्रस्ताव वापस लेने के लिए वर्किंग कमेटी को मजबूर किया और प्रस्ताव वापस हो गया।
भला हो चाचा नेहरू का कि वो प्रस्ताव कैंसिल हो गया नहीं तो पहले जनसंघ और फिर आज की बीजेपी कैसे बनती ? तो इस नाते आप ये कह सकते हैं कि चाचाजी की दूरदृष्टी की वजह से देश का ही नहीं कांग्रेस का भी नुकसान हुआ है !!!
जाने दीजिए, पटेल जयंती पर पटेल जी की बात करते हैं। जब सारे सेकुलर इस बात का कयास लगा रहे हैं कि सरदार पटेल संघ के लिए क्या सोचते थे तो मैं भी तो आज़ाद हूं सोचने के लिए, मुझे लगता है कि पटेल संघ को कांग्रेस में शामिल कर के कांग्रेस को हिंदुत्व की ओर ले जाना चाहते थे। ऐसा सोचने की पुख्ता वजह हैं क्योकि पटेल ने 1950 में हिंदूवादी टण्डन को नेहरू की इच्छा के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष बनवा दिया था वहीं दूसरे हिंदूवादी नेता राजेन्द्र प्रसाद को पटेल ने 1950 में ही नेहरू के खिलाफ जाकर राष्ट्रपति बनवा दिया।
खैर, बिना कयास की गम्भीर बात ये है कि गांधी की हत्या के एक दिन पहले 29 जनवरी 1948 को ही नेहरू ने कह दिया था कि - "मैं संघ को कुचल दूंगा", अगले दिन हुई गांधी की हत्या ने नेहरू को अपने अरमान पूरे करने का मौका भी दिया उन्होंने संघ को कुचलने की भरपूर कोशिश भी की। दूसरी तरफ गुरु गोलवलकर को जब महात्मा गांधी की हत्या का षडयंत्र रचने के आरोप में 1 फरवरी 1948 को नागपुर से गिरफ्तार किया गया तो पुलिस जीप की तरफ जाते हुए गोलवलकर ने अपने स्वयंसेवको से कहा था कि - "संदेह के बादल जल्द ही हटेंगे और हम निष्कलंक बाहर आएंगे", 72 साल पहले 96 घण्टे के अंतराल पर नेहरू और गोलवलकर दोनों ने जो भविष्यवाणी की थी, किसकी सच हुई और किसकी गलत निकली इसका फैसला मैं आप पर छोड़ता हूं।
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