सर्वोच्च न्यायालय का राममंदिर के पक्ष में आये निर्णय के निहितार्थ:-
रामजन्म भूमि पर सर्वोच्च न्यायालय का जो निर्णय आया है वह सिर्फ न ऐतिहासिक है बल्कि कालजयी व सनातन धर्म के पुनर्स्थापना की एक लिपि भी है।
मैं इस निर्णय के लिए उच्चतम न्यायालय व उसके न्यायाधीशों की कोई भूरी भूरी प्रशंसा नही करूँगा!
क्योंकि 134 वर्ष से राम के अस्तित्व व स्थान को लेकर लंबित रखने के लिए वे भारत के सेकुलर कीड़ों/वामपंथी गुंडों और टुकड़े गैंगों की तरह ही दोषी है।
हां, इसके लिए मैं उन सभी हुतात्माओं और नायकों को नमन करूँगा जिन्होंने 2014 से पहले की विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग हो कर श्रद्धा व विश्वास को अस्त्र बना, हमारे राम और धर्म की रक्षा करते रहे है तथा धर्म रक्षार्थ मुल्ला मुलायम की मुस्लिम तुष्टिकरण पर बलिदान हुए।
इसके बाद भी सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा 1045 पन्ने के निर्णायक निर्णय को पढ़ने पर कुछ बिंदुओ पर अवश्य कुछ कहना चाहूंगा। क्योंकि मैं समझता हूँ कि उन पन्नों ने विधि द्वारा न सिर्फ हिंदुओं की श्रद्धा व विश्वास के समक्ष समर्पण किया है बल्कि भविष्य के प्रश्नचिन्हों को वर्तमान में प्रतिउत्तरित किया है। इसी के साथ यह भी कहना चाहूंगा कि राजदण्ड जब प्रबल और निर्विवादित होता है तो न्याय को भी अपनी तमाम विचारधाराओं, अरुचियों और अन्धस्वार्थ को नेपथ्य में रखना पड़ता है और न्याय करना पड़ता है।
मेरे लिए वामपंथ व छद्म धर्मनिर्पेक्षता के विष से ग्रसित न्यायालय के धीशों द्वारा दिये गये निर्णय में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह रहा है कि रामजन्म भूमि के वादियों से निर्मोही अखाड़े को अस्वीकार कर, उन्होंने राम लला को ही वादी मान कर ही निर्णय दिया है।
यहां भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने विधि द्वारा श्री राम के अस्तित्व को न सिर्फ स्वीकार किया है बल्कि पिछली दो शताब्दियों से पाश्चात्य बौद्धिकी द्वारा स्थापित कथानक व भारतीय वामपंथियों और लिबर्ल्स द्वारा सतयुग, त्रेता व द्वापर युग के भारत के इतिहास को पौराणिक कथाओं कह कर उपहास करने की वैचारिकता को ध्वस्त कर दिया है। इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा है कि यह पांचों न्यायाधीशों द्वारा एक मत से दिया गया निर्णय है, जो किसी भी नए विवाद के कुत्सित प्रयास की भ्रूण हत्या है।
न्यायाधीशों ने निर्णय लिखते समय इस बात का पर जोर दिया है कि यह निर्णय सिर्फ और सिर्फ विवादित भूमि के स्वामित्व (टाइटल) को केन्द्रवत रख कर लिया गया है लेकिन सत्य यह है कि निर्णय के अंत तक आते आते यह हिन्दुओ की आस्था और विश्वास की लाटों पर ही प्रतिस्थापित किया गया है।
मैंने बहुतों को इस निर्णय को भारत का निर्णय बताया है, जिससे मैं अस्वीकार करता हूँ। मुसलमानों को अयोध्या में ही मस्जिद के लिए 5 एकड़ भूमि देने का निर्णय किसी भी तरह से विधि की ग्राह्यता को नही प्राप्त कर सकता है। मंदिर तोड़ कर खड़ी की गई मस्जिद के तोड़े जाने पर न्यायाधीशों द्वारा मुस्लिम समाज को 5 एकड़ जमीन दे कर पुरस्कार करने का प्रयास, उनकी हीनता को परिलक्षित करती है।
मैं समझता हूँ कि जिस प्रकार से न्यायालय ने केंद्र सरकार को अयोध्या ट्रस्ट बना कर मंदिर बनवाने के अपने निर्णय का परिपालन किया जाना सुनिश्चित किया है, उसी तरह मंदिर तोड़ कर बनी मस्जिद के टूटने की क्षतिपूर्ति का निर्णय भी इसी ट्रस्ट को सौपना चाहिए था।
इसी के साथ मैं यह भी समझता हूँ कि जब न्यायाधीशों ने मुस्लिम समाज को 5 एकड़ देने का निर्णय लिया था तब उन्हें उन लोगो को दंड, नही तो कम से कम भर्त्सना अवश्य करनी चाहिए थी जिन्होंने इसी प्रस्ताव को, मस्जिद टूटने से बहुत पहले, 1989 से ही इसको बराबर अस्वीकार किया है। वैसे तो 134 वर्ष बाद लिए गए इस निर्णय के नायक अनेक है। लेकिन मेरा दृढ़ विश्वास है कि बिना नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमंत्रित्व के यह निर्णय असम्भव था। इस निर्णय पर हस्ताक्षर न्यायाधीशों के अवश्य है लेकिन उनकी उंगलियों को लेखनी मोदी जी के शासकीय दण्ड ने ही पकड़ाई है।
मैं इस कालजयी निर्णय आने पर जहां सभी राममंदिर समर्थकों को ह्रदय से बधाई देता हूँ वही पर राममंदिर का विरोध कर रहे भारत के हिंदुओं के साथ, वे कट्टर राष्ट्रवादी व हिंदूवादी जो 2015 से ही मोदी पर अविश्वास की अलख जगा कर लोगो को नोटा व कांग्रेस की गोद मे बैठाने का सोशलमीडिया पर निर्लज्जता से प्रयास कर रहे थे उन्हें हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी की निकृष्टतम व अमर्यादित दुर्वचनों से कुशोभित करता हूँ।
अंत में मैं आप सबसे पुनः एक बार फिर कहूँगा की मोदी जी पर अविश्वास करना हिन्दुओं की सबसे बड़ी भूल होगी।
अभी बहुत कुछ होना है, जो कष्टकारी तो लगेगा लेकिन वह भारत के लिए श्रेष्ठ होगा।
मैं स्पष्ट रूप से 2020 में रुद्र का रौद्र देख रहा हूँ, साथ मे 2024 से पहले, बिना न्यायालय के किसी भूमिका के मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि व काशी में बाबा विश्वनाथ को मस्जिदों के प्रकोप से मुक्त होता देख रहा हूं।
वर्ष बदलते रहेंगे और मोदी जी तो बिना आलोचना का संज्ञान लिए अपने कर्तव्यों का निर्वाह व पूर्वनिर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने का प्रयास करते रहेंगे लेकिन परीक्षा आपकी है जिन्हें एक हिन्दू होने के साथ भारतीय होने के दायित्व का निर्वाह स्वयं ही करना होगा।
यह हिंदुओं के साथ सभी को याद रखना चाहिए कि कृष्ण रूपी मोदी बड़ा निर्मोही है।
"ठाकुर की कलम से"
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