विजयोत्सव

सबसे पहले हिन्दू नारियों को प्रणाम।
मोदी, आडवाणी, भागवत जी, अमित शाह या अशोक सिंघल जी को बाद में नमन करेंगे।

जिन्होंने कुल-परिवार को संभाला। 
एक रखा। 
जाड़ा, गर्मी हो या बारिश, सुबह चार बजे उठ, रात्रि दस बजे से पहले विश्राम ना कर, घर को शंखध्वनि से गुंजित कर, खुद भूखे रह बच्चो, पति और अतिथि की क्षुधा को सर्वोच्च माना, अपने आचरण से सन्तानों में सनातन के "बीज" को रोपित किया। 
बीज को जिलाए रखा। 
जिन्हें ना यश चाहिए था, ना वैभव और ना विलासिता। 
जिनके लिए घर-परिवार ही राममंदिर था और सियाराम का जीवन बनी मर्यादा, पूजा।

बीज को मां ने संरक्षित रखा, तभी सेना खड़ी हुई ? 
है कि नहीं ? 
हम जैसे मोमिन भी सनातन में लौटे। 
है कि नहीं ?

इन सहस्र करोड़ हिन्दू महिलाओं में मेरी मां भी एक अनाम चेहरा हैं और आपकी मां भी। 
हम सबकी मां।

कल का "विजयोत्सव" का श्रेय अधूरा है, यदि हजारों वर्षों से सनातन की नींव बनी "नारी शक्ति" को हमने नमन नहीं किया।

मेरा विनम्र निवेदन है, श्रीराम मंदिर की नींव का पहला पत्थर अयोध्या जी की सबसे बुजुर्ग हिन्दू मां रखे। वाल्मीकि समाज से हो तो अति उत्तम।
समाज के रामसेतु को स्थापित करने की चाहत है।

आज हम-आप हिन्दू हैं तो आधार हैं हम सबकी मां। जो कभी झुकी नहीं। जो कभी टूटी नहीं। बस, चुपचाप जाकर गंगाजी में समा गईं।

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