2005 का साल था,
क्रिकेट में ज्यादा रुचि नही रखने वाला मैं जब भी थककर बाहर कमरे में B&W टी.वी. पर अपने मनपसंद कार्यक्रम देखने के लिए जाता तो वहाँ पूरे गाँव को इकट्ठा होकर दूरदर्शन पर मैच देखता देख नाराज होकर वापस चला आता कि पता नही क्या रखा है इस सबमे, हमेशा बस वही चला करता है।
और ये वो समय था जब देश मे ही नही बल्कि पूरे विश्व मे सचिन का नाम चल रहा था, और घर में भी बाबा, ताऊजी, पिताजी, चाचाजी, सबके मुंह से हमेशा से बस एक ही नाम सुनता आ रहा था कि मेरा बेटा सचिन बनेगा।
तभी 2004-05 के आसपास एक लम्बे बालों वाला लड़का भारतीय क्रिकेट टीम में आता है, आड़े तिरछे शाट्स खेलता है, लोग कहते हैं ये क्या खेलेगा ? ये लम्बे बालों वाला क्या कीपिंग करेगा ?
लेकिन लोगों को क्या पता था कि ये भारतीय क्रिकेट इतिहास में ऐसा नाम कर जाएगा कि उसके जैसा न कोई था, न कोई है, न कोई होगा।
मुझे पहला मैच वही याद है जब धोनी ने श्रीलंका के खिलाफ नाबाद 183 रन की पारी खेली थी।
बड़ी बात ये थी कि उस मैच में धोनी ने 10 छक्के जड़े थे, जो मुझ जैसे 5 साल के बच्चे के जेहन में याद रह जाने को काफी नही था बस एक धुंधली तस्वीर रह गयी थी लम्बे बाल वाले की।
2007 वर्ल्ड कप में भारतीय टीम बांग्लादेश से हारकर बाहर हो गयी और इंग्लैंड से सीरीज हारने के बाद द्रविड ने कप्तानी छोड़ दी। फिर कप्तानी दी गई उसी लम्बे बाल वाले लड़के को जो अब तक बैटिंग में अपना लोहा मनवाना शुरू कर चुका था, और शुरू हुआ टी-20 विश्व कप, जिसको एक युवा टीम के साथ जीतकर इस लम्बे बाल वाले खिलाड़ी ने अपनी कप्तानी का बिगुल फूंक दिया और शुरू हुआ भारतीय क्रिकेट इतिहास का स्वर्णिम युग।
लेकिन अब वो खिलाड़ी लम्बे बालों वाला नहीं रहा, अब उसने बाल कटवा लिये थे।
दादा ने टीम को लड़ना सिखाया तो धोनी ने जीतना।
उस समय आस्ट्रेलिया ऐसी टीम थी जो अजेय थी, सब ये इंतजार करते कि इंडिया आस्ट्रेलिया को कब हरायेगा, और 2008 की ट्राई सीरीज में आस्ट्रेलिया में ही जीत कर सबको ये भी बता दिया कि ये नया भारत है, घर में घुसेगा भी और मारेगा भी।
और ये सच है कि मैंने सचिन की वजह से क्रिकेट देखना और खेलना शुरू किया और उनके सन्यास लेने के बाद रोहित शर्मा को अपना आदर्श बनाया लेकिन उन्हें उस शिखर तक पहुचाने का श्रेय धोनी को जाता है।
इस खिलाड़ी के बारे में जितना लिखो उतना कम होगा,
हाथों से ग्लव्स को टाइट करते हुये पूरी फील्ड को देखना और फिर आँखों को अंगूठे से हल्का सा रगड़कर दोनों कंधों को एक बार उचकाने के बाद जब खेलने के लिये तैयार होता है तो पूरा देश इस खिलाड़ी की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहा होता है और उसके बाद जब हेलीकाप्टर उड़ता है तो पूरा देश उछल पड़ता है।
धोनी ने तो देश को वो दे दिया जो शायद हम कभी सोच भी न पाते।
लेकिन धोनी होना भी इतना आसान कहाँ है !
धोनी होने के लिये आपको लोगों की टूटती उम्मीदों को जोड़ना होता है, जमीन पर खड़े होकर हेलीकाप्टर उड़ाना होता है, टूटे अँगूंठे के साथ खेलना पड़ता है, बिना देखे गेंद को स्टंप्स में मारना पड़ता है, पलक झपकने से पहले गिल्लियाँ बिखेर देना होता है, कोई कितना कुछ बोल ले लेकिन उस पर कोई प्रतिक्रिया न देना और मैदान में जवाब देना होता है धोनी होना, धोनी होने के बाद भी सबसे मुश्किल काम ये है कि धोनी होकर भी धोनी बने रहना।
जब तीन डण्डों के पीछे खड़ा धोनी आंखों से सुन और हाथों से बोल रहा हो, जब सबके माथे पर पसीने की बूंदे हों उस वक्त में भी शान्त रह कर मैच को जीत कर ले आना होता है धोनी होना।
जिसने देश को माता - पिता माना, माँ की गोदी से ज्यादा वक्त क्रिकेट मैदान पर बिताया, देश के लिए खेलने का सपना कब जिम्मेदारी में बदल गया पता ही नहीं चला, युवा टीम को लेकर अपनी चतुराई से ट्वेंटी वर्ल्ड कप दिलाया, टीम को टेस्ट में नंबर 1 का ताज पहनाया और एशिया कप में एशिया का स्टार बना दिया, परन्तु अभी उसकी जिम्मेदारी पूरी नहीं हुई थी अभी एक सूखे को खत्म करना था जो सालो से चला आ रहा था, अभी क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर को उनके सपने के साथ विदाई देनी थी, सबके सहयोग, बेहतरीन टीम संयोजन और करोड़ों लोगों की दुआओ से उसने ये भी कर दिखाया और भारत को वर्ल्ड कप दिलाकर सबको उत्सव मनाने का मौका दिया।
वो अपनी सारी जिम्मेदारियां निभा चुका है जिसके लिए उसे भेजा गया था,
उसने कप्तानी भी छोड़ दी है, अब वो सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो गया है, अब वो मैदान पर मजे करता है, आईपीएल जीतने के बाद ट्रॉफी टीम को देकर अपनी बेटी के साथ खेलता है, वक्त पाकर मैदान पर सो जाता है, दर्शकों के साथ दौड़ लगाता है, विपक्षी टीम के खिलाड़ियों को खेल के तरीके सिखाता है, जब तक वो मैदान पर है वो हर एक पल जीना चाहता है, उसको करने दो जो वो कर रहा है उसके बारे में सोचना बंद कर दो।
उसे अपने चाहने वालो से ही नहीं पूरे देश से लगाव है।आलोचक वहीं मिट्टी में मिल जाते है जब वो ग्राउंड में पहला कदम रखता है और हजारों लोग खड़े होकर उसका स्वागत करते है।
जिसकी लोग पूजा करते है और जो करोड़ों का मार्गदर्शक बन चुका है, उसकी जीवन और क्रिकेट की पारियो का आनंद लो बस।
धोनी वो इंसान है जो 'कप्तान धोनी' के नाम से ही जाना जायेगा, वो भले ही कप्तानी छोड़ दे लेकिन खुद कप्तानी उसको छोड़ नहीं सकती,
वो इकलौता माही है।
क्रिकेट पहले भी खेला जाता था,
क्रिकेट आगे भी खेला जायेगा, लेकिन आँखों में जीत का भरोसा लिये एक इकलौता इंसान शायद अब क्रिकेट को अलविदा कह दे।
तुम उसको कितना भी बोल लो, लेकिन जिस दिन धोनी रिटायर होगा न, उस दिन पूरे देश के साथ वो बाइस गज की पट्टी और वो तीनों डण्डे भी रोयेंगे, जिसके पीछे वो 15 साल से खड़ा है।
जब जब इस बाइस गज की पट्टी और विकेट के पीछे खड़े खिलाड़ियों की बात होगी, तब तब एक नाम सबसे पहले लिया जायेगा,
वो नाम है -
महेन्द्र सिंह 'धोनी'
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