*हिन्दू राष्ट्र नेपाल को तबाह किया था राजीव गांधी ने .....*
पूर्व भारतीय पीएम
राजीव गांधी ने नेपाल के हिन्दू राजपरिवार को सत्ता को उखाड़कर वामपंथियों और चीन समर्थकों के सत्ता प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया था :
*पूर्व स्पेशल डायरेक्टर रॉ*
भारत के प्रति
सदैव लगाव व झुकाव रखने वाले नेपाल के राजपरिवार के विरुद्ध राजीव गांधी ने रॉ के द्वारा शुरू करवाये थे वामपंथी आंदोलन।
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*राजीव ने दो वजहों से नेपाल को बर्बाद किये*
एक बार वहां की राजकुमारी के साथ छिछोरापन करने की असफल कोशिश की
और गिरफ्तार हुए
पर भारत सरकार के हस्तक्षेप से बच गए,
दूसरी बार
राजीव सोनिया के साथ पशुपति नाथ मंदिर दर्शन जाना चाह रहे थे,
जहां राजीव को पुजारियों ने तब रोक दिया अंदर प्रवेश से,
*क्योंकि पशुपतिनाथ में तब परंपरा थी गैर हिन्दू मंदिर में प्रवेश या पूजा नहीं कर सकते थे ।*
फिर सरकारी हस्तक्षेप के बाद राजीव को तो मंदिर प्रशासन ने इज़ाज़त दे दी, पर सोनिया को फिर भी नहीं जाने दिया ।
इस बात पर राजीव चिढ़ गए और वो मंदिर गए बिना ही लौट आये और भारत आने के बाद नेपाल की बर्बादी का खेल खेला ।
*गैर हिन्दू पृष्ठभूमि के कारण संसार के एकमात्र हिन्दू राष्ट्र के प्रति द्वेषभाव ऐतिहासिक सत्य है ।*
नेपाल के राज परिवार का लगाव व झुकाव सदैव भारत की ओर था,
यह लगाव इतना था कि भारत के स्वतंत्र होने पर नेपाल के राजपरिवार ने खुद राजपाट त्यागकर नेपाल का भारत में एक राज्य के रूप में विलय का प्रस्ताव तक रखा था,
परन्तु अक्ल पर भारी चट्टानें रखकर घूमने वाले तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री नेहरू ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था और तर्क दिया था कि वैसे ही इतना बड़ा देश संभालना मुश्किल हो रहा है,
भला और अतिरिक्त भू भाग कैसे संभालेंगे।
उसी नेहरू खानदान के कुलदीपक राजीव गांधी ने भारत के प्रति सदैव आदर व स्नेह का भाव रखने वाले नेपाली राजपरिवार को नेपाल की सत्ता से हटाने हेतु पर्दे के पीछे से एक बहुत ही गंदा खेल खेला
और आनेवाले दशकों के लिए
नेपाल को भारत के मित्रों की सूची से दूर करते हुए
वामपंथी नेतृत्व के अंतर्गत चीन के प्रति झुकाव रखने वाला देश बनवा दिया।
यह बातें निकलकर आईं हैं, रॉ के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर अमर भूषण की किताब
*"इनसाइड नेपाल"*
से,
जिसमें विस्तार पूर्वक बताया गया है कि
*कैसे संवैधानिक लोकतंत्र के नाम पर राजीव गांधी के निर्देश पर कोवर्ट ऑपरेशन्स लांच कर*
*नेपाल की भारत समर्थक हिन्दू राजशाही को सत्ता से हटाया गया ।*
अमर भूषण की पुस्तक
इनसाइड नेपाल में
राजीव गांधी के निर्देश पर लॉन्च किये गए कोवर्ट ऑपरेशन्स की प्रकृति का भी उल्लेख है
और यह भी बताया गया है कि किस प्रकार
*तत्कालीन नेपाल के विपक्षी दलों के संग मिलकर गुप्त तरीके से नेपाल के पूरे राजशाही सिस्टम को ध्वस्त किया गया,*
उस समय अमर भूषण जो चीफ ऑफ ईस्टर्न ब्यूरो ऑफ रॉ थे,
को एक नकली नाम जीवनाथन के अंतर्गत उनकी पहचान छिपाकर इन ऑपरेशन को अंजाम देने का दायित्व सौंपा गया था,
उन्हें एक अनुभवहीन यूनिट बनाकर नए जासूसों को भर्ती कर राजा बीरेंद्र बीर बिक्रम शाह देव की राजशाही का तख्तापलट कर नेपाल में संवैधानिक लोकतंत्र लाने का मिशन दिया गया था,
तत्कालीन राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने नेपाल के हिन्दू मोनार्क की सत्ता समाप्त करने हेतु उस समय नेपाल में चल रहे जन आंदोलनों का समर्थन किया था,
और सैंकड़ों वर्षों से जो नेपाल राजपरिवार भारत के प्रति समान धर्म व संस्कृति के कारण मित्रतापूर्ण आचरण करता रहा, स्नेह व विश्वास का भाव रखता था,
उसी नेपाल के राजपरिवार संग राजीव गांधी ने यह गंदा खेल खेला
और रॉ स्पॉन्सर्ड जन आंदोलन के नाम पर नेपाल के हिन्दू राजपरिवार को सत्ता से हटाने का षड्यंत्र रच दिया ।
राजीव गांधी की जब नेपाल नरेश बीरेंद्र बीर बिक्रम के संग नेपाल में लोकतंत्र लागू करने की वार्ता कई दौर की बातचीत के बाद विफल हो गयी,
*तब राजीव गांधी ने भारत से नेपाल जाने वाली खाद्य सामग्री व अन्य आवश्यक वस्तुओं पर रोक लगा दी*
*और नेपाल नरेश को नेपाल में लोकतंत्र लागू करने के लिए बाध्य किया ।*
जिसके कारण नेपाल के राजपरिवार को, जिसने तब तक चीन से दूरी बनाये रखी थी, उसे उसी चीन से सहायता मांगनी पड़ी
और राजीव गांधी की इसी मूर्खतापूर्ण हरकत के कारण चीन को नेपाल के आंतरिक विषयों में दखल देने का अवसर मिल गया
और साथ ही उसके बाद चीन धीरे धीरे नेपाल में अपनी जड़ें मजबूत करता हुआ नेपाल को भारत से दूर ले गया
और आज भारत की सिक्योरिटी इस्टेबलिशमेंट के लिए नेपाल एक सरदर्द है ।
नेपाल में चीनी फुटप्रिंट रणनीतिक रूप से भारत के लिए बहुत ही चिंताजनक व प्रतिकूल परिस्थिति थी
और भारत कभी नहीं चाहता था कि चीन की उपस्थिति कभी भी नेपाल में हो,
यह किसी भी प्रकार से भारतीय हित में नहीं था,
किन्तु राजीव गांधी द्वारा बिना सोचे समझे उठाये विवेकहीन कदम ने भारत का यह दुःस्वप्न सच कर दिया।
अंत में रॉ के चीफ ए.के वर्मा को नेपाल में लोकतंत्र स्थापित करने का दायित्व दिया गया,
जिन्होंने अपने विश्वासपात्र 'जीवनाथन' को मैदान में उतारा,
भूषण उर्फ जीवनाथन ने कार्यभार सम्भाला और माओवादी लीडर पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड को काफी कूटनीति इस्तेमाल कर व मशक्कत कर अपनी तरफ किया और उसे अन्य विपक्षी पार्टियों से हाथ मिलाकर नेपाल की राजनीति में नेपाल के हिन्दू राजपरिवार के विरुद्ध एक ज्वाइंट फ्रंट बनाने को कहा ।
सबको राजपरिवार के विरुद्ध एकसाथ लड़ने को कहा,
यही प्रचंड आगे चलकर 2008 व 2016 में नेपाल का प्रधानमंत्री भी बना,
प्रचंड एक जाना माना वामपंथी है,
जो चीन का काफी करीबी है
और समय समय पर भारत सरकार के विरुद्ध चीन को इस्तेमाल भी करता रहा है ।
पुस्तक "इनसाइड नेपाल" बताती है कि कैसे दुर्गम क्षेत्रों में विभिन्न राउंड्स की गहन बातचीत के बाद रॉ ने पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड को राजीव गांधी का एजेंडा फॉलो करने के लिए मनाया,
क्योंकि आरम्भ में प्रचंड को भी भारतीय प्रधानमंत्री राजीव की इस आत्मघाती रणनीति पर विश्वास नहीं हो रहा था
और बातचीत में एक समय पर तो उसने रॉ से यह प्रश्न भी किया था कि
आखिर भारत को नेपाल में लोकतंत्र लाकर क्या फायदा मिलेगा,
राजपरिवार तो पहले से ही भारत की सभी नीतियों का अनुसरण करता है ?
परन्तु भारत देश का दुर्भाग्य कि ऐसी विकृत मानसिकता से ग्रस्त विवेकहीन अदूरदर्शी राजीव गांधी उस समय भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर 400 सीटों के अभूतपूर्व बहुमत के संग खून पीने वाले चमगादड़ के समान उल्टा लटका हुआ भारत के हितों को ही नुकसान पहुंचाने में लगा है ।
"ठाकुर की कलम से"
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