ईसाइयत_इस्लाम_और_आधुनिक_शंकराचार्य

#ईसाइयत_इस्लाम_और_आधुनिक_शंकराचार्य।

आज से 2000 साल पहले जब #सनातन_संस्कृति
पर आज ही की तरह चारों ओर से हमले हो रहे थे ।
हमले करने वाले थे #जैन और #बौद्ध मत की आड़ लेकर उस वक्त के तथाकथित #बुद्धिजीवी और #सेकुलर जो सनातन धर्म से और उसकी व्यवस्था से असंतुष्ट थे।
उस समय #आदिशंकराचार्य जी का उदय हुआ उन्होंने अपने एकल प्रयास से सनातन को थामा  और उस पर हो रहे सतत आक्रमणों का अपने तर्कों और वेद के ज्ञान से प्रतिकार किया ।
और फिर
अपने इसी उद्देश्य के लिए चार पीठों की स्थापना की आदि शंकराचार्य जी के उन्हीं प्रयासों के फलस्वरूप बौद्ध और जैन धर्म की आड़ ले कर सनातन को कुचलने की कुचेष्टा को असफल किया था ।
ठीक उसी तरह 20 वीं सदी के आरंभ में फिर #हिंदू_संस्कृति और सनातन धर्म को नष्ट करने के लिए उस पर चारों और से आक्रमण होने लगे तब धर्म और संस्कृति पर मंडराते हुए आसन्न खतरे को भांपते हुए परमपूज्य डॉ हेडगेवार जीने ने संघ की स्थापना की ,
और उन्होंने अपने एकल प्रयास को #हिंदुत्व_का_रक्षा_कवच बना दिया।
यह बात बिल्कुल सत्य है कि आज हिंदुस्तान में सनातन #संस्कृति_हिंदूधर्म_और_हिंदुस्तान यदि बचा हुआ है तो वह सिर्फ और सिर्फ संघ के त्याग बलिदान और उसके प्रयासों के कारण, वरना अब तक ,,,,,,
#इस्लाम_और_ईसायत_की_आंधी_हिन्दू_सनातन_संस्कृति_को_लील_चुकी_होती।

तो क्या यह कहना गलत होगा कि परमपुज्य डॉक्टर हेडगेवार जी आधुनिक समय के शंकराचार्य थे ,जिनके मन मे भी आद्यशंकराचार्य जी की तरह अपनी वेद परम्परा के पतन की पीड़ा थी।
और इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने संघ की स्थापना की।
आज  वह स्थान नागपुर हिंदू समाज के लिए पांचवी पीठ की तरह पूजनीय है ।
मुझे पता है कई लोगों को इससे शायद #ईर्ष्या होगी #जलन होगी किंतु मैं डॉक्टर हेडगेवार जी को आधुनिक शंकराचार्य के रूप में पूजनीय मानता हूं ।
प्रत्येक संघ के सच्चे दायित्व वान कार्यकर्ता को उसी परंपरा के संवाहक सन्यासी के रूप में देखता हूं ।
मेरा तो यह कहना है कि ,,,,
#शंकराचार्य_जी_की_चार_पीठ_के_अलावा_नागपुर_संघ_कार्यालय_को_पंचम_पीठ_की_मान्यता_दी_जानी_चाहिए।

विचार आमंत्रित है।

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