अछूतपन_की_उत्पत्ति_दर्शन_और_दृश्य

#अछूतपन_की_उत्पत्ति_दर्शन_और_दृश्य:

यूरोप के दस्यु ईसाइयों ने जब भारत की खोज में 15वीं शताब्दी में निकले तो वे भुखमरी, बेरोजगारी, प्लेग जैसे संक्रामक रोगों के कारण मौत से जूझ रहे थे।
ऐसे में उनके प्राण भुखमरी और रोग से हो या समुद्री यात्रा से, उन्हें बहुत अंतर नही पड़ता था।

क्योंकि इतिहासकार जानते है कि वास्कोडिगामा के समय उनके साथ आने वाले और अगले एक शताब्दी तक भारत आने वाले 20 से 25% यूरोपीय वापस अपने घर वालो से मिलने के लिए जीवित नही रहते थे।

इसलिए उन्होंने भारत को लूटने का प्लान बनाया।
सफल रहे और वापस लौट पॉये तो हाउस ऑफ लॉर्ड्स में सम्मानित सदस्य और लार्ड की पदवी दी जाएगी।
क्लाइव इस बात का जिंदा उदाहरण है किसने 1757 में धोखे से भारत मे बंगाल की सत्ता पर कब्जा किया।

उनके अनवरत लूट के बाद भी अगले सौ वर्षों में भारत मे अकाल और सूखे से होने वाली मौत नगण्य या शून्य रही है।

1850 के बाद ही सूखे अकाल और संकामक रोगों से भारतीयों को मृत्यु का सामना करना पड़ा।

ये भयानक सूखे 1850 के पूर्व कभी क्यों नही पड़े ?

जो लोग अंग्रेजों को अपना भगवान् समझते हैं , मैकाले का सम्मान अपने बाप से भी ज्ज्यादा करते हो और अंग्रेजी को ज्ञान की देवी मानते हों वे इसका उत्तर देंगे क्या ?

विल दुरांत ने 1930 में लिखा कि " मनुष्य के मष्तिष्क और हाँथ से बनने वाली जितनी भी वस्तुएं विश्व में उपलब्ध हो सकती है , जिनकी बहुमूल्यता या तो उनकी सुंदरता के कारण होगी या फिर उपयोगिता के कारण: उन सब वस्तुओं का निर्माण भारत में होता था ,जब् समुद्री लुटेरों के पैर भारत की धरती पर पड़ा।

भारत दुनिया के समस्त देशो से व्यवसाय करता था ।
भारत के पास बड़े बड़े जहाज बनाने की क्षमता थी ।
भारत में बड़े बड़े सेठ साहूकार थे "।

पॉल बैरोच और अंगुस मद्दिसों नामक दो विश्व प्रसिद्ध आर्थिक इतिहासकार ने रीसर्च कर के लिखा है - " कि 0 AD से 1500 तक भारत विश्व जीडीपी के एक तिहाई जीडीपी का शेयर होल्डर था और मुग़लों के आने के बाद 1750 तक एक चौथाई जीडीपी का शेयर होल्डर था ।
जबकि अमेरिका और ब्रिटेन दोनों मिलाकर 1750 में मात्र 2% जीडीपी के शेयर होल्डर थे ।

1700 में भारत से आयातित सूती वस्त्रों के यूरोप और ब्रिटेन में लोकप्रियता के कारण जब् वहां पर घरेलू ऊनी वस्त्र उद्योग के उत्पादन पर दबाव बना तो ब्रिटिश संसद ने #Calico_Act लॉकर ब्रिटेन में सूती वस्त्रों के पहनने पर रोक लगा दिया ।

R C Dutt ने 1904 में लिखा कि लगभग प्रत्येक गांव में एक या एक से ज्यादा हैंडलूम हुआ करते थे ।

उन हैंडलूम को चलाने वाले लोगों की सालाना आय 20 से 50 रुपये हुआ करती थी ।

प्रत्येक घर की (हर वर्ण के ) स्त्रियां दोपहर बाद आराम के क्षणों में सूत कात कर साल में 3 से 5 रुपये कमाती थी ।
फिर हाई टैक्स और मनी ड्रेन ( 1930 तक 4 ख़रब् पौंड ) भारत की जीडीपी 1900 आते आते मात्र 2% बची जबकि अमेरिका और ब्रिटेन की जीडीपी 43% हो गयी ।

भारत की 20% आबादी जो हजारों साल से मात्र मैन्युफैक्चरिंग पर आधारित थी वो बेरोजगार और बेघर होकर कृषि पर बोझ बन गयी ।
1850 से 1900 के बीच इन्ही बेरोजगार लोगों में से 2.5 से 5 करोड़ लोग अन्न के अभाव में मौत के मुह में समा गए ।इसलिए नहीं कि अकालों के कारण भारत में अन्न की कमी थी , बल्कि इसलिए कि उनके जेब में अन्न खरीदने का पैसा नही था ।

ये तो फोटो की पृष्ठभूमि पर बात् हुई।
उन्में से जो जिन्दा बन गए उनको 1921 में depressed class बनाया अंग्रेजों ने फिर 1935 में scheduled Caste .
और उनके दुर्दशा का कारण बताया हिन्दू धर्म की कमियां और ब्राम्हणवाद ।
खैर ।

अब प्रश्न ये उठता है कि जो लोग वर्ण धर्म आश्रम का विरोध करते हैं उनसे एक प्रश्न पूंछ रहा हूँ क़ि यदि ब्राम्हण पूजा पाठ अद्ध्ययन अध्यापन करता था , क्षत्रिय रक्षा और शासन में रत था , वैश्य व्यापर में :

तो 2000 वर्षों से विश्व की जीडीपी का एक तिहाई और एक चौथाई जीडीपी का निर्माता कौन था ?

अब तो भारत के विदेशमंत्री का भी आधिकारिक बयान आ गया है कि ब्रिटिश दस्युवो ने भारत मे 190 वर्षो में 45 ट्रिलियन डॉलर की लूट की।

तुमने रामायण और महाभारत को न तो पढ़ा है और न ही तुम्हे समझ है उसे समझने की। लेकिन दस्यू ईसाइयों ने तुमको लूटकर तुम्हे फेक नरेटिव सुनाकर इन ग्रंथों के पात्रों की दुर्व्याखायों से तुम्हे भरमाया , तो तुम वही झुनझुना आज भी बजाए जा रहे हो ?
लेकिन 200 साल के आधिकारिक दस्तावेजों को पढकर इन फेक नरेटिव को खारिज करने की तुम्हारी क्षमता नही है।

मेरे पास 1807 से 2015 तक इस विषय में लिखे गए लगभग समस्त दस्तावेज उपलब्ध हैं।
@Narendra Modi जी से आग्रह है कि वे अपने विदेशमंत्री के आधिकारिक बयान को ध्यान में रखते हुए 200 वर्षो में लिखे गए समस्त दस्तावेजो की प्रामाणिकता की जांच करवाएं और भारत के बारे में विश्व भर में फैलाये गए, और फैलाये जा रहे फेक नरेटिव को ध्वस्त करने में सहायता प्रदान करें।

"ठाकुर की कलम से"

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