हम शायद युद्धनीति या सही कहें तो कमीनगी में श्रेष्ठ नहीं है।

हम शायद युद्धनीति या सही कहें तो कमीनगी में श्रेष्ठ नहीं है। पुराने समय में रणक्षेत्र में हमारे सेनापति, राजा महत्वपूर्ण लोग सेना में आगे होते थे।

और उनके ?
सेना के पीछे। सुरक्षित।

वो तब भी हसेशिन, शॉर्प शूटर्स, स्नाइपर्स का इस्तेमाल जानते थे, करते थे ।
वे अपने रणनीतिकारों का तो अनुमान ही नहीं होने देते,
हम tv चैनलों पर उनकी चर्चाएं सरेआम करते हैं।

हम उनसे खतरा होने पर भी अपनी जान के प्रति बेपरवाह रहते हैं, जबकी वे अपने बाप पर भी भरोसा नहीं करते।

हम ये नहीं गौर करते कि, जब एक लड़की किसी मुसलमान से निकाह करती है तो, 
एक कमलेश तिवारी मारा जाता है तो, 
एक मुकदमा बेहिसाब खींचा जाता है तो,
एक मैच हारा जाता है तो हमारे और उनके हौंसलो पर,मानसिकता पर, मनोधैर्य पर क्या असर होता है ।

और ये असर सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं पूरे मजहबियो पर होता है।

ना जाने हम युद्धरत होने की सच्चाई को कब स्वीकार करेंगे, कब सीखेंगे, सीखेंगे भी या नहीं ....

महाकाल हमें सद्बुद्धि दे। क्योंकि अगर हम चेत जाएं तो पाकिस्तान क्रिकेट में जैसे लम्बे समय से नहीं जीत पा रहा वैसा ही हश्र हम मुसलमानों का हर जगह कर सकने का माद्दा रखते हैं, क्षमता रखते हैं।

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