हिन्दू"-- शरणार्थियों को जाने नहीं देगे और घुसपैठियों को रहने नहीं देगे"

"हिन्दू"-- शरणार्थियों को जाने नहीं देगे और घुसपैठियों को रहने नहीं देगे" -- गृह मंत्री की इस घोषणा को ओवैसी जैसों ने मुस्लिम हितों के विपरीत समझा है और शरणार्थियों को हिन्दू  व मुस्लिमों को घुसपैठियों के  रूप में देखा है ।

ओवैसी जैसों को देश  में घुसपैठियो का ऐसा वर्गीकरण सिद्धांततः ठीक नहीं लगता ।
सरसरी तौर पर देखने से ऐसी सोच भेद- भाव पर आधारित दिखाई देगी भी । मगर ऐसी धारणा सही नहीं लगती । मेरी दृष्टि में  इस समस्या के पीछे के कारणों को समझने की आवश्यकता है । जिसके लिए हमें अपने दायरों से बाहर आकर यह जानना चाहिये कि किन किन देशों के लोग घुसपैठ कर रहे हैं?  और क्यों कर रहे हैं?? इनमें बांग्लादेश,  पाकिस्तान, म्यांमार प्रमुख हैं । इनमें जो हिन्दू, सिख, जैन आदि भारतीय मूल के लोग पाक और बांग्लादेश में विभाजन के समय रह गये थे। उनकी वहां जन- संख्या 15% से भी अधिक थी । मगर ईश निन्दा, जबरन धर्म परिवर्तन और दूसरे तरीके से  आतंकित करके वहा अब ये 2% से भी कम रह गये हैं । किसी तरह अपने जीवन और धर्म बचाने के लिए यहाँ अवैध ढंग से रह रहे हैं ।अब आप सोच सकते हैं कि अस्तित्व संकट के कारण वे लोग अपने मूल देश की ओर रुख करते हैं तो क्या गलत है? इस विषय में सारी सच्चाई जग जाहिर है । मगर पाक और बांग्ला देश के मुस्लिमों के लिए यह सुविधा उपलब्ध इसलिए नहीं कराई जा सकती है क्योंकि मुस्लिमों के लिए तो 1947 मे ही अलग ( पाक +बांग्ला) देश बँटवारे में दिया जा चुका था। इसलिए इस धर्म के घुसपैठी लोगों का स्वाभाविक देश पाक/बांग्ला देश ही है । वहीं पर रहने और विकास करने का इनका मूल अधिकार है अब यदि कोई गरीबी से त्रस्त होकर /रोजगार या विकास के लिए 10/20/30----या अधिक समय पहले भारत में घुसपैठ कर यहाँ बस गया था तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह भारत का वैसा ही वैध नागरिक माना जायेगा जैसा कि 1947 में भारत के नागरिक थे । इसके अलावा म्यांमार के रोहिग्या मुस्लिमों ने अपने ही शरणदाता और शान्ति प्रिय बौद्धों के साथ जो बर्बर हिंसा का नंगा नाच किया और जिनके अमानुषिक व्यवहार की तस्वीरें सोशल मीडिया में छाई रही--, उनकी घुसपैठ को भी अनेक देश हितों के लिए खिलवाड़ करने वाले संगठनों / नेताओं ने सही ठहराने की कोशिशें की। जबकि देश के प्रबुद्ध और जागरूक जनमत के विरोध के चलते वे कोशिशें बस कोशिशें ही रह गयीं  और हाँ उनका मूल देश-- बांग्ला देश भी उन्हें बड़ी हुज्जत बाज़ी के बाद स्वीकार करने के लिये सिद्धांततः तैयार हुआ ।
इस तरह से यदि इस मुद्दे पर विचार करेंगे तो गृह मंत्री की  घोषणा और उसके मूल में निहित  ऐतिहासिक आवश्यकता तथा सच्ची न्याय भावना को सही संदर्भ में समझा जा सकता है ।इसके अलावा मेरे  सम्मानित मुस्लिम मित्रों को "भारतीय मुस्लिम" और "कोई भी मुस्लिम"-- के बीच सुस्पष्ट अन्तर को हमेशा सामने रखते हुए सोचना होगा और यह भी समझना होगा कि देश के नागरिक होने के नाते भारतीय मुस्लिमों के हितों का भी ध्यान रखना भारत सरकार की उतनी जिम्मेदारी है कि जितनी अन्य भारतीय नागरिकों की है। परन्तु सरकार को गैर भारतीय मुस्लिमों के हितों का ध्यान रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है और न प्रबुद्ध जागरूक तथा संगठित जनमत सरकार को ऐसा कुछ करने देगा ।

"ठाकुर की कलम से"

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