आखिर क्या वाकई भारतवर्ष समस्त सभ्यताओं की जननी है...!!!
एक प्रसिद्ध और ऐतेहासिक दस्तावेज "स्टोरी ऑफ सिविलाइज़ेशन" के अमेरिकी लेखक और इतिहासकार विल डूरेंट ने भारत को दुनिया की समस्त सभ्यताओं की जननी कहा है। उन्होंने "दी केस फ़ॉर इंडिया" नामक अपनी पुस्तक में लिखा है कि - भारत से ही सभ्यता की उत्पत्ति हुई है। संस्कृत भाषा सभी यूरोपियन भाषाओं की जननी है। हमारा समूचा दर्शन संस्कृत से ही उपजा है। विज्ञान और गणित इसकी ही देन है। इसीलिए भारत माता हम सबकी माता है। उनके द्वारा लिखित विश्वविख्यात पुस्तक "स्टोरी ऑफ सिविलाइज़ेशन, इंडिया" से उद्धरित कुछ अंश।
विज्ञान के क्षेत्र में भारत की देन अत्यंत प्राचीन एवं नवीन दोनो ही है। लौकिक एवं स्वतंत्र शास्त्र के रूप में तो यह देन नवीन है लेकिन वैदिक शास्त्र की सहायक एवं अप्रधान विद्या के रूप में यह अत्यंत पुरातन है। चूंकि हिन्दू धर्म जीवन का हृदय है अतएव पहले उन्ही विज्ञानों की उन्नति हुई जिनका की धर्म को विशेष देन थी। ग्रहों की आराधना से ज्योतिष की उत्पत्ति हुई तथा त्योहारों और यज्ञ की तिथियों के पंचांग के निर्माण को लक्ष्य करके इन ग्रहों की चाल का निरीक्षण किया गया तथा प्रत्येक मंत्र को सही सही पढ़ने एवं उच्चारण करने पर विशेष जोर भारतवर्ष के वैज्ञानिकों द्वारा ही प्रतिपादित किया गया।
ग्रीक प्रभाव से ऊपर होकर खगोल विधा (astronomy) के ज्योतिष शास्त्र (astrology) की व्युत्पत्ति सर्वप्रथम वराहमिहिर ने अपने संकलन (Complete System of Natural Astrology) में दी। आर्यभट्ट जोकि हिन्दू ज्योतिषियों एवं गणितज्ञों में सर्वश्रेष्ठ हैं, ने पद्य में Quardic Equations, Sine एवं X के मूल्य जैसे काव्यात्मक विषयों का वर्णन किया है। उन्होंने ग्रहण (Eclipse), अपनकाल (Solistice), विपुवीय (Equinox) की व्याख्या की, पृथ्वी की वर्तुलाकारता की तथा अपनी धुरी पर उसके दैनिक आवर्तन की घोषणा की।
रिनेसाँ-विज्ञान की साहसी पूर्वज्ञता के साथ उन्होंने लिखा कि "ग्रह-मण्डल स्थायी है तथा पृथ्वी के आवर्तन से प्रतिदिवस ग्रहों और तारागणों का उदय और अस्त होता है।" उनके सबसे प्रसिद्ध अनुयायी ब्रम्हगुप्त ने भारतवर्ष के ज्योतिर्विज्ञान को क्रमबद्ध किया। इन व्यक्तियों तथा उनके अनुयायियों ने बेबीलोन के आकाश मण्डल के विभाजन की राशि-चक्र संबंधी नक्षत्र-मण्डल के रूप में हिन्दुओं के प्रयोगार्थ व्यवस्था की। उन्होंने बारह महीने का वर्ष, तीस दिन का मास, तीस घड़ी का दिन निर्धारित करते हुए हर पांचवे वर्ष एक मलमास का प्रक्षेप कराकर वर्ष विभाजन की सूची तैयार की। उन्होंने विलक्षण यथार्थता से चंद्रमा के व्यास, चंद्र और सूर्य ग्रहण, ध्रुवों के स्थान तथा बड़े बड़े नक्षत्रों के स्थान और गति का निर्धारण किया।
उन्होंने अपने सिद्धान्त ग्रंथो में यह लिखते हुए कि "पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से सभी वस्तुओँ को अपनी ओर खीँचती है" पृथ्वी के आकर्षण-शक्ति के सिद्धांत की व्याख्या की। जिससे प्रेरणा लेकर बाद में न्यूटन ने Law of Gravity प्रतिपादित किया।
इन पेंचीदी गणना के लिये हिन्दुओं ने एक ऐसी पद्धति का विस्तार किया जो यूनानियों से हर प्रकार से उच्च थी। यूनान की प्राच्य-संपत्ति के सबसे प्रमुख अंगों में अरबी-अंक तथा दशमलव प्रणाली भी अरब के द्वारा भारतवर्ष से ही आये। वे अंक जिन्हें गलती से यूनानी अरबी अंक कहते हैं, उनके अरब साहित्य में आने से एक हज़ार साल पूर्व अशोक के शिलालेखों में 256 ई पू पाये जाते हैं।
सभी संख्याओं को केवल दस चिन्हों (अंको) से अभिव्यक्त करने की कौशलपूर्ण विधि संसार को प्रदान करने का श्रेय भारतवर्ष को ही है। जिसमे प्रत्येक चिन्ह अपने स्थान के अनुसार मूल्य प्राप्त करता है तथा जिसका अपना निरपेक्ष मूल्य भी है। दशमलव पद्धति का ज्ञान आर्यभट्ट एवं ब्रम्हगुप्त को उसके अरब एवं सीरिया के लोगो की रचनाओं में स्थान प्राप्त करने के बहुत पहले से ही था।
बीजगणित का विकास हिन्दुओं और यूनानियों ने स्वतंत्र रूप से किया प्रतीत होता है लेकिन यूरोप में उसका प्रवेश भारतवर्ष से ही हुआ है। हिन्दू वैज्ञानिक आर्यभट्ट, ब्रम्हगुप्त और भास्कर ने (Radical Signs) और बीजगणित के चिन्हों का आविष्कार किया था। इन व्यक्तियों ने क्षयराशि के विचार का निर्माण किया जिसके प्रभाव में बीजगणित का अस्तित्व ही असंभव था। उन्होंने क्रम-परिवर्तन (Permutation) एवं एकीकरण (Combination) संबंधी नियमों को निर्धारित किया। उन्होंने 2 का वर्गमूल निकाला और ईशा की आठवीं सदी में दूसरे अंश के वर्गसमीकरण (Quadratic equation of second degree) को हल किया जबकि यूरोप में उनका ज्ञान लगभग एक हज़ार साल बाद आडलर (Edler) के समय तक किसी को भी नही था।
उन्होंने अपने विज्ञान को पद्यात्मक रूप में व्यक्त किया तथा गणित संबंधी प्रश्नों को ऐसी रोचकता प्रदान की जो भारतीय स्वर्ण युग की विशेषता है। आर्यभट्ट ने सर्वप्रथम त्रिभुज, चतुर्भुज एवं वृत का क्षेत्रफल निकाला तथा पाई (व्यास का वृत की परिधि से संबंध) का मूल्य 3.1416 पर निर्धारित किया। भास्कर ने स्थूल रूप में (Differential Calculas) का प्रतिपादन किया, आर्यभट्ट ने Sines की तालिका तैयार की तथा सूर्य-सिद्धान्त ने त्रिकोणमिति (Trigonametry) की एक ऐसी पद्धति प्रदान की, जिससे अधिक उत्तम प्रणाली का ग्रीस के निवासियों को कुछ ज्ञान नही था।
इतना ही नही विल डूरेंट ने अपनी किताब में कणाद के वैशेषिक-दर्शन, पदार्थ-विज्ञान, सुषुर्त धन्वंतरि एवं चरक के औषधि-विज्ञान, शरीर-विज्ञान एवं शल्य-चिकित्सा के अलावा भारत मे ही अविष्कृत संगीत-ग्रंथो के स्वर रचना, हिन्दू जहाजो में दिशा सूचक यंत्र "कुतुबनुमा" रसायन शास्त्र, सन्तानोउत्पादक-शक्ति, गर्भ संस्कार आदि भारतीय शास्त्रों को अन्य संसार से अधिक विस्तृत और विकसित बताया है।
लेकिन देश की विडंबना है आज भी देश के नौनिहालों को मैक्समूलर व मैकाले की शिक्षा पद्धति से पोषित रोमिला थापर व रामचंद्र गुहा जैसे वामपंथियों द्वारा लिखित लंपट इतिहास पढ़ाया जाता है। और हमे बताया जाता है कि न्यूटन का ग्रेविटी नियम, आइंस्टीन की ऊर्जा का नियम, पाइथागोरस प्रमेय व आर्कमिडीज का सिद्धांत सब यूरोप की देन है, जबकि वास्तविकता कुछ और है। भारतवर्ष के वैदिक इतिहास को अगर जानना है तो श्री चमनलाल जी द्वारा लिखी पुस्तक "हिन्दू-अमेरिका व "इंडिया, मदर ऑफ ऑल सिविलाइज़ेशन" नामक पुस्तकों को ज़रूर पढ़े।
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