"पाक घरेलु मोर्चे पर संघर्ष करते हुए"
पाक इस समय अपने वजूद को लेकर भीतर से डरा हुआ है ।कारण साफ़ है कि उसका निर्माण हीं इस्लामिक राष्ट्रवाद के आधार पर हुआ । इसीलिए वह खासकर कश्मीर घाटी को पाने के लिये बरसों से मंसूबे पाले हुए हैं और उसके लिए वह कबायली हमला-1847, भारत पाक युद्ध- 1965, फिर कारगिल युद्ध और आतंकवादी हमले -मुम्बई, संसद, पठानकोट, पुलवामा आदि के रूप में भारत पर दबाव बना कर उसे किसी भी तरह हथियाने की कोशिशें करता रहा है और फिर कश्मीर के रास्ते से देश के अन्य मुस्लिम बाहुल्य हिस्सों में काबिज होने की दूरगामी सोच के तहत आगे कीं रणनीति पर वह काम कर रहा था । कुछ तथाकथित सेक्युलरों को यह सब काल्पनिक लग सकता है और अतिरंजित भी । मगर जो विश्लेषक पाक आर्मी और वहां के मैन स्ट्रीम के नेतृत्व और टिप्पणीकारों पर नजदीकी नजर बनाये रखते हैं उनके लिए यह सब शीशे की तरह साफ़ हो चुका है । पाक फ़ौज हमारे देश के नेतृत्व कीं कमजोरी हिचकिचाहट और परमाणु बम के हव्वे को सामने रखते हुए लगातार अपनी रणनीति को बेखोफ अंजाम दे भीरही थी । ऊपर से पाक 55 मुस्लिम देशों की भी ताकत दिखाने का बखूबी इस्तेमाल कर आ रहा था। चीन जैसे भारत विरोधी देश के साथ होने के चलते पाक को अपनी भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम तक पहुंचती दिख रही थी उसे लगता था कि पहले कश्मीर घाटी और फिर उसके रास्ते भारत में घुसपैठ करा कर आतंकी हमलों के जरिए गज़वा ए हिन्द की तरफ तेजी से आगे बढ़ सकेगा और फिर दुनियां में इस्लामिक परचम लहराने वाला एक मात्र मुस्लिम एटमिक देश होगा जिसके झंडे के नीचे अरब यमन अफगान तुर्क वगैरह सब इस्लामिक देश देर सबेरे आ जायेंगे ।
मगर मोदी सरकार ने एक झटके में कश्मीर से धारा 370 B & 370C और 35A को हटाकर और दो केन्द्र शासित राज्य बना कर पाक को तो हक्का-बक्का कर दिया । पाक कुछ करता उससे पहले ही प्रमुख मुस्लिम देशों के साथ घनिष्ट सम्बन्ध जोड़कर मोदीजी आगे की रणनीति पर पहले काम कर रहे थे इसलिए पाक के साथ तुर्की के अलावा और कोई नजर नहीं आया । मानवाधिकार और यू एन ओ के मंच से कश्मीर मुद्दे को उठा कर भी उसे क्या हासिल हुआ? हमने इमरान खान नियाजी से क्या सुना? -- इस्लामिक- फोबिया, इस्लाम पर खतरा ,मुस्लिम ऊम्मा से अपील, कश्मीर पर जुल्म,आर एस एस और हिन्दू आतंकवाद और एटमिक जंग छिडने की धमकी । इन सब बातोंके जरिए उसका दुनियां से गुहार लगाना कि कश्मीर के मसले पर भारत पर दबाव बनाये। अन्यथा एटमिक जंग छिड़ने के खतरे को झेलने के लिये तैयार हो । मगर क्या एकाध को छोड़ कर किसी ने उसे गम्भीरता से लिया?
अब फिर घूम घाम कर फिर आतंकवादी घुसपैठ करा कर कोई बड़ा हमला कराने की उसकी रणनीति है। लेकिन क्या फ्री हैंड डोभाल साहब और विपिन रावत साहब की जोड़ी की शख्सियत और एक्शन को कभी पाक आर्मी भूल सकती है??
यही कारण है कि आज पाक रणनीति पर सवालिया निशान खुद पाक मीडिया में लगाये जा रहे हैं ।
मेरी दृष्टि में आज पाक के सामने बड़ा रणनीतिक संकट खड़ा हो गया है । छद्म युद्ध की अरसा पुरानी उसी की रणनीति ने उसे आज आमने-सामने के युद्ध के मुहाने पर खडा कर दिया है ।पारम्परिक युद्ध में उतरना भी उसके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है-- खुद उसके वजूद के लिये भी !! और हाँ-,पी ओ के, बलोचिस्तान, सिंध वगैरह में पाक विरोधी गतिविधियों को देखते हुए भी वह पसोपेश में रहेगा और ऊपर से आर्थिक मदद के लिये आतंकवादी गतिविधियों पर लगाम लगाने की समय सीमा ......? आदि ।तब क्या वह भारत को सफल होता देखता रहेगा कश्मीर में? --- ...या फिर कश्मीर के लिए वह आखिरी हद तक जा सकता है जैसा कि कई बार वह घोषित कर चुका है!!!
मगर यह जानते हुए हमें तैयार रहने की आवश्यकता है कि पाक के सामने अब विकल्प बहुत ज्यादा नहीं है ।
........."ठाकुर की कलम से"
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