हिन्दूत्व के दुश्मनों से सावधान

आज फिर से असमंजस में हूँ, क्योंकि विषय नहीं मिल रहा!हालांकि दिमाग "कुछ लिखने का"लगातार आग्रह कर रहा है!
मेरे मित्र विकास राय ने आग्रह किया कि मैं जाति विभेद की चौड़ी होती खाई पर कुछ लिखूँ, जिससे समाज मे समरसता आये!

बात तो सुंदर है और विषय ज्वलन्त! लेकिन परेशानी यह है कि विषयवस्तु को कितना भी तटस्थ कर लूं लेकिन एक न एक पक्ष नाराज़ हो ही जायेगा!

एक चीज़ तो यही है कि आज अपने देश में समाज व्यवस्था का दृश्य क्या है ? अभिजन वर्ग, बहुजन वर्ग – वंचित वर्ग, पिछड़ा वर्ग, घुमंतु समाज, वनवासी, महिला समाज, इन बहुजन वर्ग के अनेक अंगों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है! सुदृढ़ समाज व्यवस्था की अपेक्षा करते समय इन दुर्बल कड़ियों पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है! बहुजन समाज की उन्नति उपर्युक्त समता-बंधुता-स्वतंत्रता, समरसता इन तत्वों के आधार पर हो सकती है!
स्वामी विवेकानंद जी ने बहुजन समाज की उन्नति के लिए दो बातों की आवश्यकता प्रतिपादित की है! उनमें से पहली शिक्षा की और दूसरी सेवा की!
अब बहुजन बोलते समय पिछड़े और SC वर्ग अपने आपको लेख का केंद्र बिंदु न समझ लें क्योंकि आजकल ये दो वर्ग अपनी ऊर्जा कुछ गलत लोगों से ग्रहण कर रहे हैं! जिससे इनमें राष्ट्रीयता का भाव कम हो रहा है और ऊर्जा अगड़े वर्ग से फिजूल के झगड़ों में लग रही है! क्या ही अच्छा होता अगर वो अगड़ों को अपना अग्रज मानकर उनसे सहयोग का भाव प्रदर्शित करें!
कोई भी मीम जरा सी चिंगारी लगाकर इनको इनकी जड़ों से काट देता है और ये निर्बुद्धि फ़ौरन उसके षड्यंत्र जाल में उलझ जाते हैं! गलत है न!🙏🙏🙏

अब बात अभिजात्य या सवर्ण वर्ग की, जो अपने असुरक्षा के भाव से बाहर नहीं आ पा रहा है!उसको लगता है कभी के बंधुआ आज सर पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, अपनी हदों को पार कर रहे हैं! हालांकि आजादी के बाद के अवसरवादी नेतृत्व ने अंधाधुंध आरक्षण दे देकर तथा हर चुनाव के समय वोट के लालच में बेतहाशा सौगातों की बरसात करके वंचितों की आदतें बिगाड़ने का ही काम किया है, जो बाद में लालच और हरामखोरी का पर्याय बन गया! और मज़े की बात यह है कि ऐसा करते वक़्त देशहित को ताक पर रख दिया गया!
हालांकि कहना पड़ेगा कि देश की सकल घरेलू आय व जीडीपी में इसी अग्रज वर्ग का योगदान 90% है! लेकिन उसको लगता है कि हमारी टैक्सदारी पर हरामखोर ऐश कर रहे हैं! बात कड़वी है लेकिन सच भी और मैंने शुरू में कहा भी था की मैं इस लेख को भरसक तटस्थ रखूं लेकिन एक न एक नाराज जरूर होगा😂😂

अब आता हूँ एक मज़ेदार बात पर की मैंने इस विषय को केवल हिन्दू धर्म और उसके घटकों पर केंद्रित किया है और मैं इससे मुस्लिम और ईसाई को बाहर रख रहा हूँ क्योंकि मुस्लिमों को मैं अपना मानता ही नहीं और ईसाई मेरी समझ से बाहर हैं क्योंकि उन्होंने इस धर्म को लालच के वशीभूत होकर चुना!

प्रश्न अब सामाजिक समरसता का कि आज अगड़ों को अपना दिल बड़ा कर लेना चाहिए, क्योंकि ये दलित वंचित भी उनके ही बंधुजन हैं, ईश्वर न करे अगर ये खुद को हिंदू समाज से कटा कटा महसूस करेंगे तो इनका मीम के पाले में जाने का पूरा पूरा अंदेशा है और दुर्भाग्यवश ऐसा हो भी रहा है, जिससे अंत मे हिन्दू समाज ही दुर्बल हो रहा है!

मेरी हार्दिक इच्छा है कि आज छोटे बड़े की दीवार गिराने की आवश्यकता है! कोई कितना भी इंकार कर ले लेकिन भारत में रहने वाला हर धर्मलम्बी अपनी जड़ों से हिन्दू है! और जो ऐसा नहीं मानता उसकी मैं कड़ी भर्त्सना करता हूँ!

सबसे बढ़िया राय यह है कि बड़े बड़े मठों में सम्राटों की सी जिंदगी बिता रहे धर्माचार्य व शंकराचार्य लोग सामाजिक एकता के लिए बाहर धूप में निकलें और विश्व के सबसे प्राचीन धर्म को मजबूती देने का काम करें! मेरा दावा है कि भारत के चारों शंकराचार्य ही इस दुरूह कार्य को सरलता से अंजाम दे देंगे, ऐसा मेरा मानना है!

भारत के सारे मंदिर बिना किसी भेदभाव के सामाजिक समरसता के सन्देशवाहक बन जाये, और इन मंदिरों की प्रबंधन समिति में 50-50% अगड़े पिछड़े नियुक्त किये जायें ताकि हिन्दू धर्म मजबूत बने!
अंत मे याद रखो की अगर समय के साथ आप लोगों ने अपने धर्म को मजबूत न किया तो मूसा तुम्हे नेस्तानाबूद करने को तैयार बैठा है!
इसलिए जागो मोहन प्यारे,जागो!
गिरा दो ऊंच नीच की दीवार
लगा लो गले एक दूजे को!
आज कम से कम ईसा तो तैयार बैठा है तुम्हारे धर्म मे आने को!पूरा यूरोप, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी एशिया, जापान, कोरिया आदि भगवान राम व शिव को अपना पूर्वज बता रहे हैं! और तो और जम्बू दीप में भी बहरीन, दुबई, इज़राइल, जॉर्डन, इराक व मिस्र भी तुम्हारे धर्म मे विलय को तैयार बैठे हैं! तुमको विश्व गुरु के सिंहासन पर बिठाने को तैयार है और तुम लाखों वर्षों बाद भी ऊंच नीच छोटा बड़ा खेल रहे हो!

"ठाकुर की कलम से"

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