#ब्राम्हण_और_मनु_पर अपने अपराधों का प्रत्यारोपण करके ब्रिटिश दस्यु किस तरह भारत का सामाजिक विखण्डन किया और उनके मूर्ख पिछलग्गुओं ने उस फेक न्यूज़ को आज संविधान का अंग बना रखा है।

#ब्राम्हणवाद_और_मनुस्मृति के साये में ब्रिटिश दस्युवो ने अपराधों को किस तरह सफलतापूर्वक ढाँप दिया?

#ब्राम्हण_और_मनु_पर अपने अपराधों का प्रत्यारोपण करके ब्रिटिश दस्यु किस तरह भारत का सामाजिक विखण्डन किया और उनके मूर्ख पिछलग्गुओं ने उस फेक न्यूज़ को आज संविधान का अंग बना रखा है।
ब्रिटिश दस्यु जब 1757 में बंगाल पर शासन अपने हाँथ में लिए तो भारत पूरे विश्व का 24% जीडीपी का उत्पादक था। उस समय उनका उद्देश्य एकमात्र था - भारत के धन वैभव को लूटकर अपने देश मे ले जाना। मैकाले तक इस बात से सहमत था। 1800 आते आते भारत मात्र 19% जीडीपी का उत्पादक था। फ्रांसिस हैमिलटन बुचनान ने 1800 से 1807 के बीच दक्षिण भारत का सर्वे करता है जिसको ईस्ट इंडिया कंपनी तीन वॉल्यूम में प्रकाशित करती है। लगभग 1500 पेज की इस पुस्तक में अछूत शब्द का जिक्र तक नही है।
1500 AD के बाद यूरोप से निकले धर्मांध ईसाई जहां भी गए उन्होंने गैर ईसाइयों की जर जोरू जमीन पर कब्जा किया, देशी ( Ab Origines) का कत्ल किया और बचे हुए लोगों का धर्म परिवर्तन किया।
Gova Inquisition के नाम से कई लोगो ने पुस्तकें लिखी हैं उनको आपको पढना चाहिए।
फ़्रांसिस हैमिलटन बुचनान अपनी पुस्तक के तीसरे वॉल्यूम के पेज 20-21 पर लिखता है:
" होस्सो-बेट्टा के मुख्य निवासी ही नही वरन तुलावा ( Tulava) के अधिकतर निवासी कोकड़ी ( Kankanies) हैं , या वे लोग जो कोंकण के रहने वाले थे। वे बताते हैं कि वे अपने देश गोवा से जबरन धर्म परिवर्तन किए जाने के भय से भागकर यहाँ आये। पुर्तगाल से एक आदेश आया कि समस्त देशी लोगों का धर्म परिवर्तन कर दिया जाय। वे कहते हैं कि जब आदेश आया तो वहां का वाइसराय बहुत विनम्र आदमी था, उसने समस्त देशी लोगों को अपनी संपत्ति लेकर देश छोड़ने की छूट दी, और इसके लिये उसने 15 दिन का समय दिया। अतएव सभी धनी लोग, ब्राम्हण और शूद्र, तुलवा चले आये, उस धन संपत्ति के साथ जो वह ला सकते थे, और अब वाणिज्य से अपना जीवन यापन करते हैं। ब्राम्हण और शूद्र दोनो ही लोगों को उनके देशी नाम कोंकणी से संबोधित किया जाता है, और यहां के ब्राम्हणो का इन भागकर आये हुए ब्राम्हणो से कोई सम्बन्ध नही है। लेकिन अब वे सम्पन्न अवस्था मे हैं, और मैंने आज राह में गुजरती हुई एक बारात देखी है, जिसमें बहुमूल्य परिधान वाले बाराती और अतीव सुंदर लड़कियां सम्मिलित थी। गरीब कोंकणी जो गोवा से नही भाग सके, उनको उस धर्म मे परिवर्तित कर दिया गया जिसको क्रिश्चियनिटी कहते हैं"।

हैमिलटन बुचनान के इस निरीक्षण से एक बात स्पष्ट है कि 1800 तक शूद्र न तो गरीब था, और न ही अछूत। इसका तात्पर्य यह नही है कि गरीब नही थे। गरीब थे लेकिन वे हर समाज मे सदैव रहते हैं। जिन गरीब हिन्दुओ का गोवा में धर्म परिवर्तन किया गया अवश्य ही वे ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र ही रहे होंगे।
लेकिन अभी ब्रिटिश दस्युवो को न तो हिंदुओं को सवर्ण और असवर्ण में बांटने की आवश्यकता महसूस हुई थी और न ही यह अभी आवश्यक था। अभी बहुतेरा भारत उनके कब्जे में नही आया था।

नीचे जो चित्र हैं इनमे सबसे नीचे एक तालिका है जिसमे भारत की गिरती जीडीपी और अकालों और संक्रामक रोगों से मरने वाले भारतीयों की लिस्ट है एक शताब्दी की।
भारत के लूट और कृषि शिल्प और वाणिज्य का विनाश करने के कारण भारत की जीडीपी निरन्तर गिरती गयी। 1800 में 19.6%, 1830 में 17.6% 1860 में 8.6%, 1880 में 2.8 %, और 1900 में 1.7%.

1886 में एक ब्रिटिश लेखक H M Hyndman की पुस्तक छपी है जिसका आधार ब्रिटिश संसद में उपलब्ध डाक्यूमेंट्स हैं। उस पुस्तक का नाम है "Bankruptcy Of India".जिसमे उसने बताया कि भारत का खून किस तरह चूसा जा रहा है। उसने यह भी बताया कि भारत की गरीबी का कारण मनी ड्रेन, ऊंचे दर पर निर्दयता पूर्वक वसूला जा रहा टैक्स, और कृषि शिल्प और वाणिज्य का विनाश है। उसने यह भी बताया कि उन कृषकों का हाल किस तरह बेहतर है जो देशी शासकों के अधीन है, उनकी तुलना में, जो सीधे ब्रिटिश शासकों के अधीन है।

यद्यपि भारत के बारे में अफवाहबाजों के पितामह विलियम जोंस ने 1786 में ही फेक न्यूज़ की रचना शुरू कर दिया था और मैक्समुलर ने आर्यन अफवाह की रचना 1859 में किया। अभी उसका प्रसार होना शुरू हुआ था। लेकिन 1882 में छपे भारत के गजेटियर ऑफ इंडिया में आर्यन और देशी ( ab orogine) की अफवाह ने जगह बना लिया था। इस तरह अफवाह आधारित इतिहास और समाजशास्त्र को पहली बार वैधानिक स्वरूप में स्थापित किया गया। इस फेक न्यूज़ का आगे का किस्सा मैंने कई पोस्टों में लिखा है। इस अफवाह का लाभ उनको यह हुवा कि वे अपने सारे आपराधिक कृत्य और भारतीयों के नरसंहार से अपने आपको मुक्त करते हुए उसको ब्रमांहनो और मनुस्मृति के मत्थे मढ़ने में सफल रहे। वह अफवाह साहित्य आज भी भारत के स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है।

यहाँ आज इसको एक और एंगल से देखने की आवश्यकता है। अभी हाल में शशि थरूर ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन में इस लूट की चर्चा की थी। वह वीडियो उपलब्ध है। जे एन यू की एक प्रोफेसर उषा पटनायक ने अभी एक लेख में बताया कि ब्रिटिश अपने शासन काल मे 45 ट्रिलियन पौंड लूटकर ले गए।

समाज के पास दो तरह की संपत्ति होती है। एक व्यक्तिगत दूसरी सामूहिक। दोनो संपत्तियों के दो स्वरूप होते हैं चल और अचल। ईसाइयो की यह रणनीति रही है कि अचल संपत्ति पर कब्जा करने हेतु चल संपत्ति को छोड़ा जा सकता है। ऊपर गोवा से भागे हुए कोंकणी चल संपत्ति ही लेकर भाग पाए होंगे। अचल संपत्ति का क्या हुवा? उस पर ईसाइयों ने कब्जा कर लिया। यह जर जोरू जमीन पर कब्जा करने की विभिन्न नीतियों में से एक हैं।
एक सार्वजनिक संपत्ति और होती है यथा मंदिर, महल, तालाब आदि आदि। ब्रिटिश दस्यु कोहिनूर ले जा सकते थे। इनको अपने साथ नहीं ले जा पाये।

उसी पर यह पोस्ट है।
नीचे हजारों वर्षों से निर्मित कुछ मंदिरों के चित्र हैं यह आज भी भारत के वैभव साइंस और तकनीक की कहानी कह रहे हैं।
इनका निर्माण सार्वजनिक संपत्ति से हुवा है।
लेकिन निर्माणकर्ता कौन था ?
ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र?

इन मंदिरों के निर्माण में कई पीढियां लगती हैं। यदि यह राजशिल्प ( आर्किटेक्चर ) का ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी राजशिल्पियों के परिवारों को मिलती रही तो उसमें कोई बुराई थी ?

ये राजशिल्पी भी नही बचे जब भारत के वैभव के स्रोत - कृषि वाणिज्य शिल्प का विनाश कर दिया गया तो।

आज वे scheduled Caste, अनुषुचित जाति या अछूत में आते हैं।
तब नही थे, जब हिन्दुओ का राज था।
तब वे सम्मानित राजशिल्पी थे।
नग्रेजो का राज जाते जाते वे अछूत हो गए।

इस पर विचार नही किया जाना चाहिए कि आखिर यह
कैसे हुवा?
#राजशिल्पी_अछूत कैसे हो सकते थे?

अफवाह साहित्य को कब तक पढाते रहोगे ?

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