अखण्ड_भारत

#अखण्ड_भारत

“जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है वह नर नहीं, नर पशु निरा है, और मृतक समान है”

अखंड भारत या वृहत्तर भारत की चर्चा होते ही आज की पीढ़ी के मन में सबसे पहले ब्रिटिश कालीन भारत का नक्शा उभरता है। पर जानकर हैरत होगी भारतवर्ष के इतिहास में 1947 में विशाल भारतवर्ष का पिछले 2500 वर्षों  में हुआ 24वां भौगोलिक और राजनीतिक विभाजन था।

इस भारतवर्ष के इतिहास पर एक वृहद दृष्टी डालेंगे तो पायेंगे, यूनानी (रोमन-ग्रीक), यवन, हूण, शक, कुषाण, सीरियन, पुर्तगाली, फ्रेंच, डच, अरब, तुर्क, तातार, मुगल और अंग्रेज सभी हमलावरों ने भारतवर्ष (हिन्दुस्तान) पर आक्रमण किया है। शायद ही कोई रिसर्च होगा या बिल्कुल ही कम होगा जिसमें चर्चा की गई हो कि इन पुराने हमलावरों ने सिर्फ अफगानिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका, नेपाल, तिब्बत, भूटान, पाकिस्तान, मलेशिया या बांग्लादेश पर आक्रमण किया।

पिछले 200 सालों में अपनी एक तिहाई जमीन खो चुके हैं हम, 1857 की क्रांति के पश्चात ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई थी उन्हें लगा की इतने बड़े भू-भाग का दोहन एक केंद्र से करना संभव नहीं है एवं फुट डालो एवं शासन करो की नीति अपनायी एवं भारत को अनेकानेक छोटे-छोटे हिस्सो में बाँट दिया केवल इतना ही नहीं यह भी सुनिश्चित किया की कालांतर में भारतवर्ष पुनः अखंड न बन सके।

1857 से 1947 के बीच अंग्रेजों ने तो भारत को सात बार तोड़ा, और इस शृंखला विघटन का प्रारम्भ अफ़ग़ानिस्तान से हुआ जब सन् 1876 में रूस एवं ब्रिटैन के बीच हुई गंडामक संधि के बाद अफ़ग़ानिस्तान का जन्म हुआ, उसके बाद 1906 भूटान, 1914 तिब्बत, 1935 श्रीलंका, 1937 म्यनमार, और 1947 पाकिस्तान एवं बांग्लादेश ।

1857 में भारत का क्षेत्रफल 83 लाख वर्ग कि.मी. था। वर्तमान भारत का क्षेत्रफल 33 लाख वर्ग कि.मी. है।

विश्व के सार्वकालिक और सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक विभुतियों में से एक महापुरुष श्रीअरविंद ने अपने जन्मदिन और भारत की आजादी के समय 15 अगस्त 1947 के शुरुआती लम्हों में ही रेडियो त्रिची से अपने संबोधन में विभाजन को कृत्रिम मानते हुए इसके दोबारा एकीकरण को स्वाभाविक और अपरिहार्य होने की भविष्यवाणी की थी।

अखण्ड भारत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अवधारणा है। संघ भारत से अलग हुये इन देशों को दोबारा भारत में मिलाकर अविभाजित भारत का निर्माण चाहता हैं। अखण्ड भारत का निर्माण सैद्धान्तिक रूप से संगठन (हिन्दू एकता) तथा 'शुद्धि  से जुड़ा हैं।

संघ इस विचार का हमेशा मुखर वाहक रहा है।संघ के विचारक हो०वे० शेषाद्री की पुस्तक The Tragic Story of Partition में अखण्ड भारत के विचार की महत्ता पर बल दिया गया है। संघ के समाचारपत्र ऑर्गनाइजर में परम पूजनीय सरसंघचालक मोहन भागवत जी का वक्तव्य प्रकाशित हुआ जिसमें कहा गया कि केवल अखण्ड भारत तथा सम्पूर्ण समाज ही असली स्वतन्त्रता ला सकते हैं।

मातृभूमी अखण्ड होगी
कण्टकों से शून्य होगी
संघटित सामर्थ्य की कर गर्जना
जगत को ललकारते साधक निरंतर

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