एक हुंकार तो भरो


"ठहरो रूको आगे कयों आ रहे हो ??"
"क्योंकी तुम्हारे छोटे कपड़े उत्तेजित करते हैं"
"अच्छा ! तो अब मैं क्या करुँ ??"
"साड़ी पहनो"
"जी ठीक है"
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"अब क्यों आगे आ रहे हो?? दूर हटो ."
" तुम्हारा चेहरा , श्रंगाार आकृषित करता है"
" हम्म !!तो मैं क्या करूं? "
"घूंघट करो"
"जी ठीक है"
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दूर हटो .अब कयों आ गए ??"
" तुम्हारे हाथ ,पैर , पेट दिखता है"
" फिर ?"
"बुरखा पहनो"
"जी ठीक है"
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"अब कयों रास्ता रोक रहे हो?? "
" इस बुरखे के अंदर , तुमहारे शरीर की कल्पना , तुम्हारी आवाज़ , सड़क पर चलना ,पैरों का आगे पीछे होना आकृषित करता है "

"अब भी??... तो लो मैं इस शरीर का ही त्याग कर देती हूं "
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"अब भी तुम आ गऐ?? अब तो मैं आत्मा बन गई हूं ! दूर हटो .."

"तुम आत्मा हो, तुमसे कुछ लेना नही मुझे ! लेकिन.. लेकिन तुम अपना शरीर ऐसे ही क्यों छोड़ गई?? ये मुझे आकृषित कर रहा है ! "

"क्या ?? बेजान शरीर भी?? क्या पुरूष के लिए नारी एक शरीर मात्र है??

"नहीं ! पुरूष के लिए तो नारी माता है, बहन है , प्रेमिका है , पत्नी है , बेटी है! पुरूष माता के सामने मासूम बालक है ! माता के चरणों में उसका स्वर्ग है! बहन की रक्षा के लिए पुरूष जान दे सकता है , जान ले सकता है! पुरूष पिता है। जिसका तुम गौरव हो। पुरूष वो प्रेमी है ,जो तुम्हारे लिए दुनियां से लड़ लेता है। पुरूष वो पति है ..जो तुम्हारे हर सुख दुख में सहभागी..तुम्हारा साथी है। पुरूष तुम्हारा दोस्त है जो तुमको तुमसे ज्यादा जानता है और सही रास्ता दिखाता है!! "

"तो तुम कौन हो ??"

" मैं कापुरूष हूं! मुझे बस शरीर चाहिए । चाहे वो वृद्ध हो , बालिका या बालक हो । चाहे शिशु हो या पशु ही क्यों न हो! मैं वो कापुरुष हूं !"

" मैं तुम्हें पहचान क्यों नही पाई ??"

"तुम्हें तो तभी पहचान लेना चाहिए था, जब मैनें कहा था कि तुम्हारा शरीर दिखता है , और तुम्हारी तरफ बढ़ा था "

" हे कापुरूष ! अच्छा होता तुझे तभी दण्ड दिया होता। तेरे आगे बढ़ते हाथ काट दिए होते । तेरी आँख फोड़ दी होती दुष्ट "

" हा हा हा बिल्कुल ठीक कहा। लेकिन अब तो तू बस आत्मा है। तुझ आत्मा में कोई बल नहीं। मैं जा रहा हूं तेरे शरीर की तरफ , उसे नौंचने । बचा सकती है तो बचा ले "

"दुष्ट , तुझे आत्मा के बल ,आत्मबल की शक्ति नहीं पता। मैं आदि शक्ति की अंश हूं। तेरे जैसे कापुरूष का संहार पहले भी किया है और आज फिर कर रही हूं......"
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हे भारतवर्ष की नारियों । अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानों । आदि शक्ति स्त्री रूप में ही निवास करतीं है। स्वयं को अबला बेचारी कह कर और मान कर अपनी ही शक्ति का अपमान मत करो। प्रसव की महा पीड़ा सह कर भी ममता बरसाने वाली, जिम्मेदारियां निभा सकने वाली शक्ति को तुम साधारण मत समझो । आत्म बल है ,शारीरिक बल और बढ़ाओ। #Gym जाओ । अच्छी बनावट पाने के लिए नहीं ..बलवती बनने के लिए। अपनी बेटीयों को और खुद को युद्ध कला सिखाओ। थोड़ी आक्रमक बनो। एक हुंकार तो भरो..

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