नोटबन्दी पूरा सफल नहीँ होने का मुख्य कारण था कि नकली नोट रिजर्व बैंक से भी चलाये जा रहे थे मनमोहन सिंह के समय से।
नोटबन्दी पूरा सफल नहीँ होने का मुख्य कारण था कि नकली नोट रिजर्व बैंक से भी चलाये जा रहे थे। जितने नोट छपे थे, उससे अधिक जमा हो गये। इसका एक तरीका १९८३ में मनमोहन सिंह के समय आरम्भ हुआ जब वे मुख्य करेसी अधिकारी थे। ५० करोड़ रुपए के नोट को खराब प्रिंटिंग कह कर नष्ट हुआ दिखा दिया किन्तु उसे चलाने के लिए ओड़िशा भेज दिया। भुवनेश्वर रिजर्व बैंक ने उसे सबसे दूर कोरापुट स्टेट बैंक भेज दिया जहाँ से उसे कई शाखाओं में भेजा गया। डाबुगांव (तेलुगु में पैसे को डाबु कहते हैं) शाखा से बीडीओ ने फरवरी १९८४ में शिक्षकों को वेतन देने के लिए पैसा निकाला। वहाँ से वेतन लेकर एक शिक्षक ने उसी बैंक में अपने एकाउंट में डाला तो बैंक मैनेजर ने उसके विरुद्ध डाली नोट चलाने का केस कर दिया। प्रमाणित हुआ कि बैंक मैनेजर ने ही सभी जाली नोट बीडीओ को दिये थे। उसने तिजोरी की जांच की तो पता चला कि कोरापुट मुख्य शाखा से आये हैं। कोरापुट के मैनेजर ने प्रमाणित किया कि भुवनेश्वर रिजर्व बैंक ने ५० करोड़ भेजे थे। तब वहाँ के मुख्य के साथ पुलिस मुख्यालय में मीटिंग हुई। उसकी रिपोर्ट पर मनमोहन सिंह ने लिखा कि यह नष्ट होने के बदले भूल से चला गया था। पर उसकी जगह प्रिंट हुए नोट भी चल रहे थे।
पूर्व पुलिस महानिदेशक ओड़िसा
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