#दलित_और_शूद्र_का_सच_तथयो_के_साथ
देखो अम्बेडकरवादियों (कृपया दलितों को शूद्र समझने की भूल न करें। शूद्र सम्मानित सनातनी हैं।ै)
द्रोण को राजा द्रुपद ने अपमानित कर दिया। वो महान ब्राह्मण जो ब्रह्मास्त्र का ज्ञाता था, महापराक्रमी था, पर लो इतना भीषण दरिद्र था कि उसके पुत्र को दूध और चावल के पानी के बीच का अंतर तक पता नहीं...इसका हिसाब कौन देगा ?
पूर्व में दिए गए वचन के कारण ही आचार्य द्रोण द्रुपद के पास गए थे। यूँ ही मुंह उठाकर नहीं पहुंचे। लेकिन उनका अपमान हुआ और उन्होंने स्वात्माभिमान की रक्षा करने की शपथ ली। पहुंचे हस्तिनापुर, जहां वीरवर देवव्रत भीष्म पलक बिछाकर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। वहां उन्हें राजगुरु बनाया गया। वह भी केवल कुरुवंशी राजकुमार समूह को शिक्षा देने के लिये। उन्होंने कोई प्राइवेट स्कूल नहीं खोला था , सरकारी कोच थे भाई।
क्या कहा ? ये सब काल्पनिक है ? मनगढ़ंत है ? रुको रुको, अभी तो एकलव्य की एंट्री बाकी है। अच्छा ? अब ये सही हो गया न ? एकलव्य को तो उन्होंने शायद दलित (? 😘 ) होने से नहीं पढ़ाया। लेकिन द्रोण ने तो बहुत सी विद्या और अस्त्र का ज्ञान केवल अर्जुन को दीं। अपने पुत्र अश्वत्थामा तक को नहीं दी थीं। वो भी दलित था क्या ?
अर्जुन में योग्यता थी, अश्वत्थामा में नहीं। और गुरु केवल योग्यता देखता है, रिश्ते नहीं। क्या कहा ? एकलव्य में ज्यादा योग्यता थी ? हां भई , बिल्कुल थी। लेकिन यदि कोई गलत उद्देश्य वाला व्यक्ति योग्य हो तो सरकार या सरकारी प्रशिक्षक उसे देशहित के विरुद्ध शस्त्र ज्ञान देगा क्या ?
और एकलव्य ने जब अपना अंगूठा दिया गुरू द्रोण को, तो उसमें न कोई संकोच था, न मज़बूरी, न डर और न ही घृणा। और एक बात, वो दलित तो था ही नहीं, क्षत्रिय था। कैसे ?
एकलव्य सात्वत वंशका क्षत्रिय था , जो किसी कारणवश बचपन में निषादोंके द्वारा पाला गया था , वसुदेवजी के भाई देवश्रवाका पुत्र शत्रुघ्न ही एकलव्यके नाम से प्रसिद्ध निषादराज हुआ -
" निवृत्तशत्रुं शत्रुघ्नं देवश्रवा व्यजायत !!
देवश्रवाः प्रजातस्तु नैषादिर्य: प्रतिश्रुव:!
एकलव्यो महाराज निषादै: परिवर्धित:!!(महा०खिलभाग हरिवंश पर्व०३४/३२-३३) "
गुरु द्रौणाचार्य कुरुकुलके शिक्षक नियुक्त किये गये थे , और कुरु राज्यके शत्रु राजा जरासन्धके राज्यका कोई व्यक्ति जाकर धनुर्वेद सीखे यह कुरु राज्यके लिये अनर्थकारी हो सकता था , क्योंकि शत्रु गुप्तचर ऐसे ही नियुक्त करते हैं और जरासन्ध तो लगातार विदेशी राजाओं , चीनका राजा भगदत्त , शोणितपुरका राजा बाणासुर , प्राग्ज्योतिषपुरका राजा भौमासुर और यवनका राजा कालयवन आदिके साथ मिलकर अखण्ड भारतको खण्ड खण्ड करने में लगा था , क्योंकि भगवान् श्रीकृष्णने उसके जामाता कंसका वध कर दिया था , ऐसे में कोई भी राज्य शत्रु राज्यके किसी बालकको धनुर्वेद नहीं सिखा सकता था , जिसका पिता जरासन्धका कृपापात्र रहा हो और जो स्वयं जरासन्धकी सेनाका नायक बना , इसीलिए गुरु द्रौणने उसे धनुर्वेदकी शिक्षा नहीं दी ।
सभी ने यह देखा कि गुरु द्रौणने एकलव्यका अँगूठा कटवा लिया गुरु दक्षिणामें जिससे वह महान् योद्धा न बन सके , पर किसीने यह नहीं देखा कि एकलव्यको बिना अँगूठेके दो अँगुलियोंसे बाण चलाना भी गुरु द्रौणाचार्यने ही सिखाया था -
"स सत्यसंधं नैषादिं दृष्ट्वा प्रीतिऽब्रवीदिदम् !
एवं कर्तव्यमिति वा एकलव्यमभाषत !!
तत: शरं तु नैषादिरङ्गुलीभिर्व्यकर्षत !(महा०आदि पर्व०१३१/५९) -
द्रौणाचार्यजीने निषादनन्दन एकलव्यको सत्यप्रतिज्ञ देखकर बहुत प्रसन्न हुए , उन्होंने सङ्केत से उसे यह सिखा दिया कि तर्जनी और मध्यमाके संयोग से बाण पकड़कर कैसे खीचना चाहिये ।" और आज धनुर्वेदकी सबसे कठिन विद्या मानी जाती है बिना अँगूठे के बाण संधान करना ।
यदि राम क्षत्रिय होने से बाहरी थे तो बुद्ध भी तो थे। और यदि द्रोण ब्राह्मण होने से बाहरी थे तो एकलव्य भी था।
राम जी ने यदि शम्बूक को मारा तो रावण (ब्राह्मण) को भी मारा। क्योंकि वो धर्म और अधर्म देखते हैं,जाति नहीं। विभीषण को गले लगाया तो निषादराज को भी। क्योंकि वो भाव देखते हैं, जाति नहीं।
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