#ये_है_Mवायरस_का_बदलाव???

#ये_है_Mवायरस_का_बदलाव???

आखिर M-वायरस का संक्रमण चरित्र ही नहीं, संपूर्ण डीएनए को ही बदल देता है...!!!

शायद आपको पता होगा कि हिंदुस्तान से अलग होने के बाद मुस्लिमों ने अपने देश का नाम पाकिस्तान ही क्यों रखा। दरअसल पाकिस्तान नामक शब्द के जनक सियालकोट के रहने वाले मोहम्मद इकबाल उर्फ अल्लामा इकबाल थे। जो एक कश्मीरी ब्राह्मण की संतान थे।

इकबाल के दादा कन्हैयालाल सप्रू मूलतः शोपियां से कुलगाम जाने वाली सड़क पर स्थित स्प्रेण नामक गाँव के निवासी थे। कन्हैयालाल के पुत्र रतनलाल सप्रू ने एक मुस्लिम महिला इमाम बीबी से विवाह कर इस्लाम अपना लिया था और अपना नाम नूर मोहम्मद रख लिया था। गबन के आरोप के बाद से ये अपनी ससुराल सियालकोट जा बसे थे।

ये वही मुहम्मद इकबाल हैं जिन्होंने "तराना-ए-हिंद" के नाम से एक प्रसिद्ध सेक्युलर गीत "सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा" लिखा था। उस समय वो इस सामूहिक देशभक्ति गीत से अविभाजित हिंदुस्तान के लोगों को एक साथ रहने की नसीहत देते थे। इस गीत के कुछ अंश में सभी धर्मों के लोगों को "हिंदी हैं हम वतन है हिंदोस्तां हमारा" और "मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना" कहकर देशभक्ति और राष्ट्रवाद की प्रेरणा देते थे।

देश की विडंबना है कि कुछ सेक्युलर और धर्मांध लोग इन्हें गंगा जमुनी तहजीब का सिरमौर बताते नही थकते, इनकी तारीफों के पुलिंदे बांधते नही थकते।

"है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज,
अहले नजर उसको समझते हैं इमामे हिंद"

अब आप M-वायरस के संक्रमण की पराकाष्ठा देखिए,  संक्रमित होते ही इकबाल ने अपनी एक किताब "कुल्लियाते इकबाल" में अपने बारे में कुछ इस तरह से लिखा है...

"मिरा बिनिगर कि दर हिन्दोस्तां दीगर नमी बिनी,
बिरहमन जादए रम्ज आशनाए रूम औ तबरेज अस्त"

अथार्त मुझे देखो मेरे जैसा हिंदुस्तान में दूसरा कोई नहीं होगा, क्योंकि मैं एक ब्राह्मण की औलाद हूँ लेकिन मौलाना रूम और मौलाना तबरेज से प्रभावित होकर मुसलमान बन गया।

कालांतर में यही इकबाल मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बने और साथ ही पाकिस्तान के जनक भी। 1920 में ब्रिटिशर्स ने इन्हें नाईटहुड की पदवी से भी अलंकृत किया था। पंजाब, उत्तर पश्चिम फ्रंटियर प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को मिलाकर एक राज्य बनाने की अपील करने वाले वह प्रथम व्यक्ति थे। सन 1930, इलाहाबाद में मुस्लिम लीग द्वारा प्रायोजित लीग के 21वें सत्र में खिलाफत मूवमेंट के समय उन्होंने कहा था...

"हो जाए अगर शाहे खुरासा का इशारा,
सिजदा ना करूं हिंदोस्तां की नापाक जमीन पर"

अथार्त यदि तुर्की का खलीफा (अब्दुल हमीद, जिसको ब्रिटिशर्स ने 1920 में गद्दी से उतार दिया था) इशारा कर दे, तो मैं इस नापाक हिंदुस्तान पर कभी नमाज अदा नहीं करूंगा। बाद में इसी "नापाक" शब्द का विपरीत शब्द "पाक" लेकर पाकिस्तान का निर्माण हुआ, जिसका शाब्दिक अर्थ है मुसलमानों के लिए पवित्र देश।

हिंदुस्तान के विभाजन के बाद इकबाल ने सभी इस्लामिक राष्ट्रों को श्रद्धांजलि देते हुए "तराना-ए-मिल्ली" नामक गीत लिखा और कहा कि इस्लाम में राष्ट्रवाद का समर्थन नहीं किया गया है। उन्होंने दुनिया में कहीं भी रह रहे मुसलमानों को एक ही राष्ट्र के हिस्से के रूप में मान्यता दी, जिसका नेता मोहम्मद है जोकि मुसलमानों का पैगंबर है। इस गीत के बोल थे...

"चीन औ अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा,
मुस्लिम है हम वतन हैं, सारा जहां हमारा"

अब इस सारी कहानी में समझने की बात यह है कि जब एक कश्मीरी ब्राह्मण की M-वायरस से संक्रमित होने के बाद अपने देश और अपनी मातृभूमि के बारे में सोच इतनी जहरीली हो सकती है तो आज हिंदुओं की उदासीनता और अज्ञानता के चलते जो भी धर्मपरिवर्तन हो रहे हैं, उसका परिणाम कितना भयंकर होगा..??

समय की मांग है कि अब इन मनहूस सेक्युलर लोगों के मिथक से दूर होकर छदम जिहादियों और इस्लाम का पर्दाफाश करने में हर तरह का यथासंभव प्रयास करें। ध्यान रहे, अगर धर्म नहीं रहेगा तो देश भी नहीं रहेगा, क्योंकि देश और धर्म का अटूट संबंध है। जिस तरह धर्म के लिए देश की आवश्यकता है ठीक उसी तरह देश की एकता के लिए भी धर्म की आवश्यकता होती है। जाति और क्षेत्रवाद का भेद भूल कर कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और कच्छ से लेकर असम तक सभी हिंदुओं को एक ही होना होगा। सनद रहे कि कल तक सिंधु नदी के किनारे व कंबोडिया तक परचम लहराने वाला हिन्दू, दरकते दरकते आज कँहा खड़ा है..??

धर्मो रक्षति रक्षित:

जिन्ना और मुस्लिम लीग की ‘मुसलमानों के पाकिस्तान’ से शुरू हुई यात्रा ने ‘मुसलमानों और दलितों के पाकिस्तान’ पर अपना मोड़ बदला और बाद में ‘मुसलमानों का ही पाकिस्तान’ पर विराम लिया.
पाकिस्तान में धीरे-धीरे दलित हिंदुओं पर अत्याचार होने शुरू हो गए और मंडल की अहमियत भी ख़त्म कर दी गई. दलितों की निर्ममतापूर्वक हत्याएँ, जबरन धर्म-परिवर्तन, संपत्ति पर जबरन कब्ज़ा और दलित बहन-बेटियों की आबरू लूटना, यह सब पाकिस्तान में रोज की और ‘आम बात’ हो चुकी थी.
इस पर मंडल ने मोहम्मद अली जिन्ना और अन्य नेताओं से कई बार बात भी की लेकिन नेताओं की चुप्पी ने उनको को और अधिक परेशान किया.
बँटवारे के बाद पाकिस्तान में बचे ज्यादातर दलित या तो मार दिए गए या फिर मजबूरी में उन्होंने इस्लाम अपना लिया. इस दौरान दलित अपने ही नेता और देश के कानून मंत्री के सामने मदद के लिए चीखते-चिल्लाते रहे, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी.
पाकिस्तानी सरकार ने दलित हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की सुध तक लेना जरूरी नहीं समझा.
मंडल यह सब देखकर ‘दलित-मुस्लिम राजनीतिक एकता’ के असफल प्रयोग के लिए खुद को कसूरवार समझे लगे और अपने आप को गहरे संताप व गुमनामी के आलम में झोंक दिया

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