बाबा साहेब और उनके गुरु ईसाई दस्युवों तथा उनके अनुयायी वामपंथियों के द्वारा प्रसारित किए गए #शूद्रों_पर_3000_के अत्याचार की पोल खोलता हुवा प्रमाण - यह सातवी शताब्दी में बनाया गया भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर है जिनके निर्माता राजशिल्पी कहलाते थे।
हमारे यहाँ शिल्प का अर्थ ही था भांति भांति के वस्तुओं की मैन्युफैक्चरिंग। आज कोई भी आर्किटेक्ट किसी बिल्डिंग की अवधि 100 -200 साल से अधिक नही बताता। लेकिन भारत मे सैकड़ो ऐसे मंदिर हैं जो हजारों वर्ष से पुराने है परंतु आज भी जीवंत हैं।
ब्रिटिश दस्युवों द्वारा रचित #फेक_न्यूज़ के आधार पर अनेक अफवाह उड़ाई गयी, जो आज भी समाजशास्त्र का हिस्सा है। उसमें सबसे मूल अफवाह थी - आर्यन अफवाह, जिसको अनेक माध्यमो से प्रमाणित किया जा रहा है कि यह पूर्णतः झूठी और निराधार अफवाह थी।
दूसरी अफवाह उसी से निकली है कि आर्यन अर्थात तथाकथित सवर्णो ने 3000 वर्षो से शूद्रों, अतिशूद्रों, द्रविड़ो को विस्थापित किया और गुलाम बनाया।
तीसरी अफवाह भी उसी से उपजी कि आर्यन सभ्यता के शुरुवात में ब्राम्हणो ने कास्ट सिस्टम को जन्म दिया, जिसको खत्म करने की कवायद बाबा साहेब और उनके चिलान्दू आज भी कर रहे हैं।
चौथी अफवाह भी वहीं से निकली कि ब्राम्हणों ने शूद्रों को शिक्षा से वंचित किया था।
इन समस्त अफवाहों का खंडन प्रमाणिकता के साथ किया जा चुका है। फिर भी एक बार पुनः उनका खण्डन करता हूँ।
बाबा भीमराव अंबेडकर किस ग्रंथ को पढ़कर इस इस निर्णय पर पहुंचे कि शूद्र निम्न हैं? क्या उनके अन्यायी बतावेंगे?
कौटिल्य तो कहते हैं कि - स्वधर्मो शूद्रस्य द्विजाति सुश्रुषा, वार्ता, कार कुशीलव कर्मम - सर्विस सेक्टर, टेक्निकल शिक्षा, गायन, वादन, नट, चारण आदि में कौशल प्राप्त करना शूद्रों का अपने अपने एप्टीट्यूड के अनुसार कर्तव्य हैं।
मनुस्मृति कहती है कि - सर्विस सेक्टर और मैन्युफैक्चरिंग शूद्रों का धर्म है। और किसी शिल्पी मैन्युफैक्चरर ( शूद्र से ) राजा कोई कर नही ले सकता।
जबकि ब्रिटिश दस्युवों से लेकर आज तक की सरकारें भिखारियों से भी टैक्स वसूल रही हैं।
दूसरी बात - धरमपाल ने आज से 50 वर्ष पूर्व प्रकाशित अपनी पुस्तक #TheBeautifulTree में प्रमाण के साथ लिखा है कि मैकाले के पूर्व 1830 तक, जब तक शिक्षा ब्रमांहनो के हाथ मे थी तो स्कूल जाने वाले छात्रों में शूद्र छात्रों की संख्या तथाकथित सवर्णो की तुलना में चार गुणै थी। जब वे स्कूल जाते थे तो इसका अर्थ यह भी है कि वे अछूत भी नहीं थे।
तो ऐसा क्या हुआ अगले सौ वर्षों में कि वे शूद्र निम्न, अशिक्षित और दरिद्र हो गए?
यह प्रश्न राजनीति और आर्थिक इतिहास में खोजा जाना चाहिए कि संस्कृत धर्मग्रंथों में ?
इन्ही 200 वर्षो में जो कुछ भारत के साथ ब्रिटिश दस्युवों ने किया उसी से यह सारी सामाजिक समस्याएं उतपन्न हुई हैं।
इन भव्य मंदिरों के निर्माता कौन थे भारत मे ?
ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र?
यदि शूद्र 3000 साल से अछूत और निम्न थे, तो इन भव्य मंदिरों को किसके श्रम और कौशल से निर्मित किया गया?
ब्रम्हानिस्म के कारण नहीं, ब्रिटिश दस्युवो के कारण इतनी भव्य सुंदर और आश्चर्यजनक मंदिरों के निर्माता राजशिल्पी आज अनुषुचित जाति कहलाते हैं।
मैंने तो प्रमाण के साथ कई बार लिखा है।
आप लोग भी अपना मत रखिये।
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