शाह फ़ैज़ल आइ ए एस टॉपर भारत की सबसे ग्लेमरस नौकरी को लात मारकर कश्मीर लौट जाता है। उसे भारत पर विश्वास नहीं है।

एक कायर कश्मीरी पंडित का आत्मालाप
हिंदुओं को बताने से वैसे तो कोई फायदा नहीं है पर यों समझ लो कि मेरा बोलने का मन कर रहा है। शाह फ़ैज़ल आइ ए एस टॉपर भारत की सबसे ग्लेमरस नौकरी को लात मारकर कश्मीर लौट जाता है। उसे भारत पर विश्वास नहीं है। यह बहुत बड़ा विमर्श है। ज़ायरा वसीम फिल्म उद्योग को लात मारकर कश्मीर लौट जाती है। दोनों इस्लाम के लिये प्रतिबद्ध हैं। तृणमूल की नुसरत जहां अत्यंत लिबरल मुस्लिम को सामने रखती है और पूरा बल देकर कहती है कि मैं मुसलमान हूं। हिंदू उसकी भारतीयता देखकर गदगद हो जाते हैं। ज़ायरा वसीम को कोसने लगते हैं। पर इतना भी नहीं समझते कि लिबरल से रैडिकल की ओर आने वाली ज़ायरा कश्मीरी युवा पीढ़ी का आदर्श है और नुसरत जहां भारत के हिंदू प्रभुत्व वाले युवावर्ग में muslim space का निर्माण करती है। हिंदू चिल्ला चिल्लाकर नुसरत जहां को आदर्श मान रहे हैं। थके हुये depressed हिंदू का अपना विमर्श कहीं नहीं है वह mild islam को किसी न किसी तरह से देखना चाहता है। यह हिंदू की असहायता और अकर्मण्यता का विमर्श है। ऊपर से मोहल्ला दर मोहल्ला पलायन करवा रहे हैं मुसलमान। बड़ा दंगा नहीं हुआ कहीं पिछले अनेक बरसों से, वह इसलिए कि बड़े क्षेत्र में बड़ी हिंदू प्रतिक्रिया भी होती है।
कश्मीर ने मुसलमानों को बहुत कुछ सिखाया है। मुसलमान पंडितों को मारते रहे और समूचा देश सेक्युलरिज्म बोलता रहा। कैराना के समय ऐसा ही हुआ। दिल्ली के सुंदर नगर और ब्रहमपुरी को लेकर हिंदू सोया हुआ है क्योंकि उसका मोहल्ला बचा हुआ है। मुसलमान सोच समझकर रणनिति बनाता है। हिंदू मन को कैसे कब्ज़े में करना है वह अच्छी तरह से जानता है। ध्यान देने की बात है की मुसलमान चोर के मरने पर उसकी विधवा के खाते में बत्तीस लाख रुपये आये जबकि जूस वाले यादवजी की हत्या पर उसकी विधवा को दो लाख रुपये दिये गये। विमर्श वही बनता है कि हिंदुओ यही तुम्हारी औक़ात है।
तो आप नुसरत जहां पर विश्वास करते रहें। कश्मीरी ज़ायरा वसीम पर विश्वास करेंगे। तब तक आपके मोहल्ले में भी कुछ न कुछ होगा ही।

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