दोगले सेकुलर हिन्दू लकड़बघ्घाओ के लिए कुछ खरी-खरी.

दोगले सेकुलर हिन्दू लकड़बघ्घाओ के लिए कुछ खरी-खरी.
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कुछ विषयो पे लिखना एवॉइड कर रहा था. लेकिन संसद में गृह मंत्री अमित शाह के द्वारा जम्मू-कश्मीर पर दिए गए बयान वाले पिछले लेख पर चिपकाए कमैंट्स के सन्दर्भ में कुछ बाते कहना आवश्यक हो जाता है.
पहली बात, एक रूलिंग पार्टी (ध्यान दीजिये, मैं रूलिंग पार्टी लिख रहा हूँ, न कि 2-4 सांसद वाली नाममात्र की पार्टी)  के कैंडिडेट के रूप में सार्वजनिक मंच पे आप को गाँधी जी का सम्मान करना होगा. 2 अक्टूबर एक राष्ट्रीय अवकाश है. सभी राष्ट्राध्यक्ष अपनी भारत की यात्रा गाँधी स्मारक पे पुष्प चढ़ाकर करते है. भाजपा रूलिंग पार्टी है, इस पार्टी के सदस्य नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री है और इस पार्टी के सभी सांसदों को सार्वजनिक मंच पे कुछ मर्यादा का पालन करना होगा, भले ही निजी जीवन में उनके कुछ भी विचार हो. इसी प्रधानमंत्री ने साध्वी प्रज्ञा को भाजपा के टिकट पे चुनाव लड़ने को पुरजोर तरीके से एक इंटरव्यू में डिफेंड किया था.

द्वितीय, यही मर्यादा गिरिराज सिंह पे लागू होती है. वे भाजपा के सांसद और सरकार में मंत्री है. आपको अपनी सरकार के घटक दलों के नेता पे सार्वजनिक टिप्पणी से बचना चाहिए. बल्कि, अपने व्यवहार से (जैसे होली , दुर्गा पूजा, रामनवमी, दिवाली, जन्माष्टमी, तीज इत्यादि पे अपने घर और कॉन्स्टिट्यूएंसी पे भोज का आयोजन कर सामने वाले को निरुत्तर कर सकते है.

तीसरी बात, आकाश विजयवर्गीय के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कहे गए एक-एक शब्द उचित है. MLA या MP बनने का यह अर्थ तो नहीं कि आप सरकारी कर्मचारियों या किसी भी व्यक्ति को सड़क पे मारना शुरू कर देंगे. मेरा यह मानना है कि आकाश को रिजाइन करना चाहिए और अगले चुनाव तक जनसेवा में समय व्यतीत करके अपने कुकर्मो का प्रायश्चित करे.

चतुर्थ, गौ रक्षक बनिये. लेकिन अगर इस प्रयास में किसी को जान से मार देंगे, तो सजा के लिए भी तैयार रहिये.

पांचवा, पांच करोड़ अल्पसंख्यक को छात्रवृत्ति अगले पांच साल में मिलनी है. इनमे से आधी छात्रवृत्ति कन्याओ को मिलेगी. इन अल्पसंख्यकों में जैन, सिख, भी आते है. अगर मुस्लिम समुदाय की आधी लड़किया भी शिक्षित हो गयी, तो यह अपने समाज को बदल देगी. इस समय खाड़ी के देशो से पढ़ी-लिखी लड़किया सब कुछ छोड़कर भाग रही है और भागने को तैयार है.

छठा, हजयात्रा के समय अगर कोई भक्त बीमार हो जाता है, या मर जाता है, तो उसके इलाज और मृत शरीर को भारत लाने की जिम्मेवारी भारत सरकार की है और यह कार्य हमारे टैक्स से किया जाता है. हर वर्ष कई भक्तो मृत्यु हो जाती है. अब यह कार्य बीमा के पैसे हो होगा जो हज़ समिति करवाती है. भारत सरकार कोई मुआवजा नहीं देती है (सोर्स: संसद में पूछे गए प्रश्न का लिखित उत्तर).

सातवा, रैली निकालने से आप किसी को भी नहीं रोक सकते. इसके पहले, राम भक्तो, गुर्जरो, पतिदारो, जाटो ने भी रैली निकली है. जो लोग हिंदुस्तान मुर्दाबाद, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते है, वे अब सत्ता में नहीं आ सकते (लेकिन आप को मोदी सरकार पे विश्वास बनाये रखना है). उन्हें सरकार अपने तरीके से डील कर रही है. मोदी के मुख्यमंत्री काल के गुजरात में भी कुछ समय तक आतंकी हमले होते रहे थे. उन पे कण्ट्रोल करने में समय लगा था.

आठवां, दिल्ली के मंदिर पे हमला करने वालो को अरेस्ट कर लिया गया है. भीड़ के सभी लोगो को अरेस्ट नहीं किया जाता. इस भीड़ के नेताओ से अमित शाह अपने तरीके से डील कर लेंगे. क्या आपको लगता है कि केजरीवाल या सोनिया सरकार इनमे से एक को भी अरेस्ट करती?

पिछले वर्ष मैंने लिखा था कि यह तो सभी मानते है कि मोदी सरकार के समय में जम्मू-कश्मीर के बाहर आतंकवाद की एक भी प्रमुख घटना नहीं हुई. यह भी सभी मानते है विश्व के सबसे शक्तिशाली देशो में भी आतंवादी घटनाएं होती रहती है.

आखिरकार ऐसा क्या जादू हो गया कि मोदी सरकार के आने के बाद जम्मू-कश्मीर के बाहर आतंकवादी घटनाओ लगभग समाप्त हो गयी. यहाँ तक की प्रधानमंत्री मोदी खुली गाड़ी में कई जिलों में घूम चुके है जो विश्व का कोई भी नेता नहीं कर पाता.
क्या आतंकवादियों का हृदय परिवर्तन हो गया है और उन्होंने सनातन धर्म अपना लिया है?
या फिर, आतंवादियो की सलवार मोदी नाम सुनते ही गीली और पीली हो जाती है?
या फिर, मोदी सरकार के आने के बाद उनके द्वारा आतंकी घटना करने के पहले ही उनका "समूल नाश" किया जा रहा है?

याद कीजिये, पहले किसी भी आतंकवादी को मुठभेड़ में मारने के बाद सुरक्षा बल प्रेस कांफ्रेंस करता था, मरे आतंकवादियों की तथा उनके साथ फोटो रिलीज़ करता था. और, सरकार सुरक्षा बल के लिए पुरुष्कार की घोषणा करती थी.
और उसके बाद शुरू होता था राजमाता पोषित NGOs का नंगा नाच. आतंकियों के समर्थक मानवाधिकार के मुद्दे पे कोर्ट पहुंच जाते थे, सुरक्षा बलों को ससपेंड करने की मांग होती थे. मुख्य मंत्री को जेल में भेजने की मांग होती थी. न्यायिक जांच बैठा दी जाती थी. राजमाता की आँखों से आंसू निकल आते थे और उन्हें रात को नींद नहीं आती थी.

क्या अब आतंकियों को मुठभेड़ में मारा नहीं जा रहा है? क्या सुरक्षा बल अब आतंकियों को बिरयानी खिलाकर, अगर विदेशी हुए तो पासपोर्ट में भारत का वीसा लगाकर, सादर सीमा पार भेज दे रहे है? या फिर देशी आतंकियों कान उमेठ कर उनकी शिकायत उनके माता-पिता, पड़ोसियों और धर्म गुरुओं से कर देते है?

नगण्य आतंकी घटनाएं और आतंकियों को मुठभेड़ में ना मारे जाने का "सन्नाटा" कुछ कह तो नहीं रहा है?
कुछ बाते इशारो में ही समझाई जा सकती है.

मोदी जी से बड़ा राष्ट्रभक्त और कोई राजनेता नहीं है।
"ठाकुर की कलम से"

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