#मॉब_लिंचिंग नाम तो सुना ही होगा

कैसा लगेगा जब किसी के बच्चे की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई क्योंकि उस बच्चे के परिवार ने कश्मीर में अपना घर और धर्म नही छोड़ा..उसके बेटे की हत्या कर के भाले की नोक पर लाश चौराहे पर टांग दी गई.... ये थोड़ा कम बर्बर लगा तो दूसरी घटना एक बच्चा माँ का दूध पी रहा था और उसकी दूध पीते पीते ही हत्या कर दी गई...

         #मॉब_लिंचिंग नाम तो सुना ही होगा आपने इस ऐतिहासिक शब्द का। सन 2014 तक इस शब्द से परिचित नही था मगर अचानक 2014 के बाद मीडिया और नेता माब लिंचिंग की माला जपने लगे। फिर इसके बारे में पढा तो पता चला की "यदि भीड़ किसी की सामूहिक रूप से हत्या कर दे तो उसे मॉब लिंचिंग कहते हैं।" फिर क्या भारत में 2014 के पहले माब लिंचिंग नही हुई ? अखबारों को पलटा तब समझ में आया कि भारत में मॉब लिंचिंग तब माना जाता है जब मरने वाला मुसलमान हो और हत्या की जगह भाजपा शासित राज्य हो...

मीडिया के मॉब लिंचिंग से इतर ये जो तस्वीर आप देख रहे हैं वो आजाद भारत के इतिहास में "मॉब लिंचिंग", "मॉब रेप" , "मॉब कन्वर्जन" विस्थापन और अपने ही देश में रिफ्यूजी हुए साढ़े चार लाख लोगो की पीड़ा का अमिट हस्ताक्षर है। आगे की बात से पहले नजर डालिए कश्मीर में सेकुलरिज्म के नारों पर जो हिंदुओं को कश्मीर से भगाने के लिए स्थानीय जनता द्वारा लगाए जाते थे।

हम क्या चाहते, आजादी.
आजादी का मतलब क्या,
ला इलाहा इल्लाह.
अगर कश्मीर में रहना होगा,
अल्लाहु अकबर कहना होगा.
जागो जागो, सुबह हुई, रूस ने बाजी हारी है,
हिंद पर लर्जन तारे हैं, अब कश्मीर की बारी है.
ऐ जालिमों, ऐ काफिरों, कश्मीर हमारा है.
यहां क्या चलेगा?
निजाम-ए-मुस्तफा.
रालिव, गालिव या चालिव. (हमारे साथ मिल जाओ, या मरो और भाग जाओ.)

कश्मीर में 1989-90 के कालखण्ड की जब कश्मीरी हिंदुओं को इस्लाम न स्वीकार करने के कारण कश्मीर से भगा दिया गया, बच्चियों का रेप किया गया, और छोटे छोटे बच्चों की निर्ममता से हत्या कर दी गई। जमात-ए-इस्लामी के साथ स्थानीय आबादी ने जिहाद कर दिया और अखबारों में विज्ञापन निकले और घर के दरवाजों पर नोटिस लगा दिया गया शुरू किया था "हम सब एक, तुम भागो या मरो"। हिंदुओं कश्मीर छोड़ के चले जाओ और अपनी बेटियां हमारे लिए छोड़ दो. खिलौने से खेलने की उम्र के बच्चे की हत्या करके उसकी लाश चौराहे पर भाले की नोक पर टांग दी गई । अशोक के पैर में गोली मारकर उन्हें तड़पाते हुए नारे लगाये गए फिर 5 घंटे बाद सर में गोली मार दी गई। 70 वर्षीय स्वरानंद और उसका 27 साल का बेटा बीरेन्दर...अपहरण फिर उनकी पहले आंखें निकाली गईं, नाखून नोचे गए अंगुलियां काटी गईं, चमड़ी छिली गई और फिर उनकी हत्या कर दी गई। एक हिन्दू ने माथे पर तिलक लगया था उसके तिलक लगे माथे पर कील ठोक दिया गया और तड़पा तड़पा का तीन दिन में मारा गया। एक बाप के सामने उसकी बेटी को नंगा करके गिद्धों ने नोचा फिर परिवार को गोली मार दी...किसी का कटा सर मिला तो कोई पेड़ पर लटकता मिला...

ऐसी सैकड़ो सच्ची घटनाएं हैं जो आप की आत्मा को झकझोर देंगी।मगर रुकिए ये वर्णन औरंगजेब के जमाने का नही हममें से कई के जन्म के बाद हुए घटनाओं का है। यह सब कश्मीर में 1989-90 में हुआ। करोड़ो की हवेली वाले हो या दिहाड़ी मजदूर अगर हिन्दू था तो वो मारा गया या साढे चार लाख लोगों की तरह जम्मू के शरणार्थी कैम्पों में शरण लिया क्योंकि जमाते इस्लामी का नारा पूरी कश्मीरी जनता गा रही थी कि "हम सब एक, तुम भागो या मरो...." कुछ मरे कुछ भागे और कश्मीर को हिंदू विहीन करके गंगा जमुनी सेकुलर सभ्यता के हार में एक और नगीना जोड़ा गया।  अफसोस है कि आज तक किसी लुटियन दलाल,कांग्रेसी नेता या सेकुलर लिबरल बिरादरी ने इस मॉब लिंचिंग पर दुःख नही जताया न उन परिवारों के लिए इंसाफ की बात की...

और एक अंतिम बात इस लेख को पढ़ रहे सेकुकरिज्म की दुहाई देने वाले लोगों से यदि आजकल आपको एक चोर की भीड़ द्वारा पिटाई और उसकी 4 दिन बाद हुई मौत पर बहुत दुःख हो रहा है और कलेजा मुह को आ रहा है तो एक बार अपनी अंतरात्मा से पूछो कितनी बार तुमने कश्मीर के चौराहे पर भाले की नोक पर टांगे गए बच्चे के लिए दुःख प्रकट किया या न्याय मांगा?? कितनी बार विस्थापित हुए कश्मीरी हिंदुओं के दर्द को महसूस किया,कितनी बार उस जवान बहन के लिए तुम्हारी आत्मा रोई जब उसके भाई और बाप के सामने नंगा करके उसे जेहादी गिद्धों ने नोचा..

अगर आज तक नही सोचा और एक चोर के लिए स्यापा मचाये हो तो आवश्यकता है तुम्हे अपने मूल को तलाशने की और अपने रक्त के शुद्धिकरण की...!!!??

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